Sunday, November 8, 2026
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इंदिरा की हत्या के बाद से दहशत में रहीं सोनिया: बोलीं- हमेशा डर लगा रहता कि अगला नंबर राजीव का होगा; 1991 में हत्या हुई थी


नई दिल्ली1 घंटे पहले

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सोनिया गांधी ने 8 नवंबर को X पर एक पोस्ट कर दिवाली की यादें शेयर कीं।

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इंदिरा की हत्या के बाद घर किला बन गया। कमांडो बच्चों के बेडरूम में तैनात थे। राहुल-प्रियंका को स्कूल से निकाल लिया गया। डर बहुत था, अक्सर ख्याल आता कि अगला नंबर राजीव का ही होगा, वो मारे जाएंगे। 1991 में यही डर सच साबित हुआ। लिट्टे के आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की हत्या हो गई।

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सोनिया गांधी ने गार्जियन को दिए इंटरव्यू में यह बात कही। उन्होंने अपनी आने वाली किताब ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ पर राजीव की हत्या समेत निजी और राजनैतिक मुद्दों पर अपने विचार और अनुभव शेयर किए हैं।

सोनिया बताती हैं- ‘राजीव को मौत की धमकियां मिल रही थीं। भारतीय खुफिया एजेंसियों यह बात जानती थीं, लेकिन नई सरकार ने इसे नजरअंदाज कर दिया। उनकी सिक्योरिटी हटा ली गई। मुझे नहीं लगता कि अब हमें कभी सच का पता चल सकेगा।’

इसी इंटरव्यू में सोनिया ने अपनी और राजीव की लवस्टोरी पर भी बात की है। उन्होंने बताया कि उस वक्त उन्हें नहीं पता था कि राजीव भारत के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार के वारिस हैं।

सोनिया ने इन मुद्दों पर बात की…

इंदिरा गांधी – घर में मां, बाहर आयरन लेडी: 1968 में भारत आने पर सोनिया और राजीव, इंदिरा गांधी के साथ ही रहने लगे। बाहर से इंदिरा सख्त ‘आयरन लेडी’ दिखती थीं, लेकिन सोनिया कहती हैं घर में वो बिल्कुल आम मां थीं। अखबारों में उन्हें सख्त या कठोर दिखाया जाता था, लेकिन घर में वो किसी भी दूसरी मां जैसी थीं।

सोनिया के मुताबिक इंदिरा गुस्सा भी खूब करती थीं। किताब में एक किस्सा है जिसके मुताबिक इदिरा ने फैमिली डिनर में गुस्से में अपनी थाली टेबल के पार फेंक दी थी। सोनिया के मुताबिक इंदिरा ने एक बार उन्हें बताया था कि पहली बार प्रधानमंत्री बनने पर डरी हुई थीं।

इमरजेंसी को लेकर परिवार में मतभेद थे: 1975 में इमरजेंसी के फैसले पर परिवार बंटा हुआ था। राजीव इसके खिलाफ थे। उन्होंने मां से कहा था कि अगले चुनाव का इंतजार करो। लेकिन संजय गांधी इमरजेंसी के पक्ष में थे। एक फैमिली डिनर में संजय ने कहा था – “विपक्ष मां को बर्बाद कर देगा, उन्हें रोका जाना चाहिए।”

सोनिया किताब में लिखती हैं, “संजय को काबू में रखने से बाद में हुए बहुत से नुकसान को रोका जा सकता था।” सोनिया कहती हैं इमरजेंसी लगाना गलती थी और इंदिरा गांधी भी बाद में यही महसूस करती थीं। “मुझे हमेशा लगता है कि श्रीमती गांधी दिल से लोकतांत्रिक थीं। मुझे पता है कि कई लोग इस पर हंसेंगे, लेकिन मेरा मानना है कि इमरजेंसी के दौरान वो कभी सहज नहीं थीं। ये बात उन पर भारी पड़ रही थी।”

31 अक्टूबर 1984 – वो खून से लथपथ शरीर: सोनिया उस दिन घर पर थीं जब पटाखों जैसी आवाज सुनाई दी। बगल के ऑफिस में दौड़कर गईं तो इंदिरा गांधी का गोलियों से छलनी शरीर जमीन पर पड़ा था। उन्हें उनके ही सिख बॉडीगार्ड्स ने गोल्डन टेंपल पर ऑपरेशन का बदला लेने के लिए गोली मारी थी।

अस्पताल तक की ड्राइव के बारे में सोनिया कहती हैं, “घर से अस्पताल तक की ड्राइव असहनीय थी। ट्रैफिक ज्यादा नहीं था, लेकिन वो बहुत धीमी लगी। मैं ये भी जानती थी कि क्योंकि वो बोल नहीं रही हैं, तो सब खत्म हो चुका है।”

इंदिरा की मौत के बाद राजीव से जब प्रधानमंत्री बनने को कहा गया तो सोनिया ने उन्हें राजनीति से दूर रहने की भीख मांगी थी।

बाबरी विध्वंस – टीवी देखकर रोईं: दिसंबर 1992 में जब अयोध्या में मस्जिद गिराई गई, तो सोनिया ने उसे टीवी पर देखा और रो पड़ीं। उन्होंने कहा, “तब मुझे पता चला कि हमें उस धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए लंबी लड़ाई लड़नी होगी, जिसे महात्मा गांधी, नेहरू और उनके साथियों ने बनाने की कोशिश की थी।”

वो ये भी मानती हैं कि कांग्रेस की आत्मसंतुष्टि ने BJP और उसके कट्टर हिंदुत्व की राजनीति के उदय में मदद की। वे कहती हैं- मुझे लगता है हम कई मायनों में बहुत आत्मसंतुष्ट हो गए थे। एक तरह का लापरवाह रवैया था। ——————————

यह खबर भी पढ़ें… सोनिया ने बताया, 2004 में क्यों ठुकराया था PM पद:बोलीं- राहुल और प्रियंका भी नहीं चाहते थे कि मैं प्रधानमंत्री बनूं

2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकराने का फैसला सोनिया गांधी की जिंदगी के सबसे चर्चित राजनीतिक फैसलों में से एक रहा है। अपनी किताब ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ में उन्होंने बताया है कि राहुल और प्रियंका भी नहीं चाहते थे कि वे प्रधानमंत्री बनें। पूरी खबर पढ़ें…



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