बीना दास: निडर बंगाल की क्रांतिकारी बेटी
बीना की साहसिकता का अंदाजा एक घटना से लगाया जा सकता है. जब वायसरॉय की पत्नी के स्वागत में छात्रों को फूल बिछाने को कहा गया, तो बीना ने इसे अपमानजनक मानकर बहिष्कार कर दिया. उसी क्षण उन्होंने संकल्प लिया कि वे भारत की स्वतंत्रता के लिए प्राण न्यौछावर करेंगी.
बीना को 9 साल के कठोर कारावास की सजा हुई. जेल में अमानवीय यातनाओं के बावजूद उन्होंने अपने साथियों का नाम नहीं बताया. जेल से बाहर आने के बाद भी वे आंदोलन में सक्रिय रहीं और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी गिरफ्तार हुईं. उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 1960 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. 1986 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी गाथा आज भी जीवित है.
राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के खेड़ में हुआ. बचपन से ही वे मेधावी और राष्ट्रवादी विचारों से ओतप्रोत थे. संस्कृत में निपुण और पहलवानी में माहिर राजगुरु ने 16 साल की उम्र में घर छोड़कर आजादी की लड़ाई को अपना जीवन समर्पित कर दिया.
राजगुरु ने भगत सिंह और सुखदेव के साथ मिलकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए सांडर्स की हत्या की. असेंबली बमकांड हो या क्रांतिकारी गतिविधियां, वे हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहे. 23 मार्च 1931 को भगत सिंह और सुखदेव के साथ उन्हें भी फांसी दी गई.
बीना दास और राजगुरु की कहानियां बताती हैं कि आजादी केवल एक राजनीतिक बदलाव नहीं थी, बल्कि करोड़ों लोगों के बलिदान और त्याग का परिणाम थी. बीना का ‘करेंगे या मरेंगे’ और राजगुरु का ‘मेरी मौत से हजारों राजगुरु उठ खड़े होंगे’ जैसे शब्द आज भी युवाओं को प्रेरित करते हैं.

