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Ranbhaji Kankauva Sabji Recipe: बरसात का मौसम खत्म होने को है और विंध्य-बघेलखंड के गांवों में खेतों की मेड़, खाली जमीन, नमी वाली जगहों और रास्तों के किनारे अपने आप उगने वाली रानभाजियां अब लोगों की रसोई में पहुंचने लगी हैं. इन्हीं पारंपरिक भाजियों में कनकौआ भी शामिल है. गांवों में इसे आज भी बड़े चाव से खाया जाता है. खास बात यह है कि इसे उगाने के लिए न तो खेत तैयार करना पड़ता है और न ही अलग से बीज बोने की जरूरत होती है.
प्राकृतिक रूप से बहुतायत में दिखाई देती है. बुजुर्गों के समय से ही ग्रामीण परिवार इसे सब्जी के तौर पर खाते आए हैं. पहले जब बरसात के दिनों में बाजार में हरी सब्जियों की उपलब्धता कम हो जाती थी या सब्जियां महंगी मिलती थीं, तब खेतों और आसपास से मिलने वाली ऐसी रानभाजियां घर के खाने का हिस्सा बन जाती थीं. आज भी बघेलखंड के कई ग्रामीण इलाकों में कनकौआ का स्वाद लोगों को पुराने देसी दिनों की याद दिलाता है.
लोकल 18 को जानकारी देते हुए सतना निवासी मीना द्विवेदी ने बताया कि इस समय विंध्य क्षेत्र में बारिश का मौसम समाप्ति की ओर है और ऐसे में कई तरह की भाजी प्राकृतिक रूप से उग आती हैं. चकौड़ा, चौलाई भाजी और कनकौआ जैसी भाजियां ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से खाने में इस्तेमाल होती रही हैं. इनका उपयोग केवल स्वाद के लिए ही नहीं बल्कि पारंपरिक घरेलू खानपान का हिस्सा मानकर किया जाता रहा है. दादी-नानी के समय से लोग इन्हें खेतों और आसपास की जमीन से तोड़कर घर लाते और देसी तरीके से बनाकर खाते रहे हैं.
कनकौआ की सब्जी बनाने के लिए सबसे पहले ताजी और साफ भाजी चुनना जरूरी है. चूंकि यह भाजी खेतों की मेड़, खाली जमीन, नमी वाली जगहों और रास्तों के आसपास भी उग सकती है, इसलिए इसे तोड़ते समय खास सावधानी रखें. केवल ऊपर के कोमल हिस्से को तोड़ें और बहुत मोटे या खराब हिस्से अलग कर दें. इसके बाद भाजी को अच्छी तरह छांटें और साफ पानी से धोएं. मिट्टी, धूल या दूसरी गंदगी पूरी तरह निकल जाए, इसके लिए इसे तीन से चार बार पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए. साफ होने के बाद भाजी को बारीक काटकर अलग रख लें.
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बघेलखंडी स्वाद के लिए इस सब्जी को पारंपरिक तरीके से लोहे की कड़ाही में बनाना अच्छा माना जाता है. सबसे पहले कड़ाही को गर्म करके उसमें सरसों का तेल डालें. तेल अच्छी तरह गर्म होने पर इसमें जीरा, चुटकी भर हींग, थोड़ी मेथी, बारीक कटा लहसुन, प्याज और सूखी लाल मिर्च डालकर तड़का लगाएं. प्याज और लहसुन हल्के सुनहरे होने तक इन्हें अच्छे से भूनें. ध्यान रखें कि लहसुन जले नहीं वरना सब्जी का स्वाद कड़वा हो सकता है.
अब कड़ाही में बारीक कटी हुई कनकौआ भाजी डालें और तड़के के साथ अच्छी तरह मिला दें. इसके बाद हल्दी, धनिया पाउडर, थोड़ी लाल मिर्च और स्वाद के अनुसार नमक डालकर सब्जी को अच्छी तरह चलाएं. कनकौआ की इस सब्जी की खासियत यह है कि इसमें अलग से पानी डालने की जरूरत नहीं होती. भाजी पकने के दौरान अपना प्राकृतिक पानी छोड़ती है. इसी नमी और बनने वाली भाप में इसे पकाया जाता है, इसलिए मसाला मिलाने के बाद कड़ाही को ढक दें और धीमी आंच पर भाजी को पकने दें. बीच-बीच में ढक्कन हटाकर सब्जी को चला दें ताकि नीचे चिपके नहीं और मसाला हर हिस्से में अच्छी तरह मिल जाए.
जब भाजी अच्छी तरह गल जाए और पूरी तरह पक जाए, तब कड़ाही का ढक्कन हटा दें. अब इसे मध्यम आंच पर करीब 2 से 3 मिनट तक चलाते हुए झूरें. इस दौरान सब्जी की अतिरिक्त नमी निकल जाएगी और मसाला भाजी के साथ अच्छी तरह मिल जाएगा. इसी आखिरी प्रक्रिया से कनकौआ में वह देसी सोंधापन आता है, जो इसे खास बनाता है. तैयार कनकौआ की सब्जी सूखी, मसालेदार और स्वाद में देसी होती है. इसे गरमागरम रोटी के साथ परोसा जा सकता है जबकि दाल-चावल के साथ भी इसका स्वाद खूब जमता है. बरसात के दिनों में प्राकृतिक रूप से मिलने वाली यह रानभाजी आज भी बघेलखंड के पारंपरिक खानपान और गांव की रसोई से जुड़ी एक खास पहचान बनी हुई है.

