अलम का जुलूस निकालते कुरैश नगर के लोग व अखाड़े के जुलूस में करतब दिखता बच्चा
झांसी में मोहर्रम की सात तारीख को शहर के कई इलाकों में अखाड़ों ने करतब दिखाए। इसमें सबसे ज़्यादा हैरतअंगेज करतब मासूम बच्चों ने किए, जिन्होंने आग से अखाड़ा खेलते हुए सबको हैरत में डाल दिया। वहीं, लाठी और तलवार से भी युवाओं ने अखाड़ा खेला। वहीं, कई इलाकों
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अखाड़े में तलवार से करतब दिखाता बच्चा
बता दें कि इस्लामिक नए साल के पहले महीने मोहर्रम की शुरूआत और कर्बला की जंग का पहला दिन एक साथ होता है। वहीं, कर्बला की जंग के दसवें दिन हजरत इमाम हुसैन की शहादत के दिन को यौम-ए-आशूरा कहते हैं। इमाम हुसैन की शहादत के बाद से लेकर आजतक उनके चाहने वाले अपने-अपने तरीके से उनकी शहादत को याद करते हैं। इसी कड़ी में झांसी में भी ताजियादारों ने इमामबाड़े पर ताजिया रख दिये हैं। वहीं, मोहर्रम की 7 तारीख को झांसी में अलम का जुलूस और अखाड़ों का जुलूस निकाला गया है।

कुरैश नगर में दिन में निकला अलम, रात में अखाड़ा
कुरैश नगर में अलम का जुलूस लेकर चल रहे अकीदतमंदों ने हुसैन जिंदाबाद की सदाओं से इमाम हुसैन की शहादत को याद किया। वहीं, शहर के सीपरी बाजार, सैंयर गेट, कसाई मंडी, मेवतीपुरा, पुलिया नंबर नौ, एबट मार्किट समेत अन्य इलाकों में अखाड़ों के जुलूस निकाले गए। इन अखाड़ों में खास बात ये रही कि इसमें 10 से 12 साल के बच्चों ने आग से हैरतअंगेज करतब दिखाए। जिसने भी इन मासूम बच्चों के करतब देखे उसने दांतों तले उंगलियां दबा लीं।

तलबार से कलाबाजी दिखता युवक
लंगर और शर्बत वितरण करते रहे
कर्बला में भूख और प्यास की शिद्दत में भी हक़ के लिए बातिल (गैर सिद्धांतवादी) से लड़ते हुए शहीद हुए अल्लाह के पैगम्बर मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन की याद झांसी में उनके चाहने वालों ने राहगीर और जरूरतमंद को खाना और शर्बत वितरण किया। पूरा दिन चले इस कार्यक्रम के दौरान हजारों लोगों ने शर्बत पिया।
इमाम की याद में गम से चूर हुए शिया मुसलमान
एक तरफ मातमी ढोल और अखाड़ों के साथ अखाड़ा और अलम का जुलूस निकाला जा रहा था तो दूसरी तरफ हजरत इमाम हुसैन और उनके कुनबे की कर्बला में शहादत को याद कर शिया मुसलमान गम से निढाल थे। कर्बला की कहानी सुन आदमी, औरतें और बच्चे दहाड़े मार मारकर रो दिए। सभी के मुंह से हाय हुसैन, हुसैन बेखता, यज़ीद पर लानत बे शुमार जैसे जुमले निकल रहे थे। शिया मुसलमानों के घरों में शुरू हुई हुसैनी मजलिस देर रात तक चलती रहीं।

