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टाटा समूह के भीतर बड़े प्रशासनिक और रणनीतिक बदलावों की सुगबुगाहट तेज हो गई है. मई में होने वाली टाटा ट्रस्ट्स की बैठकें इस लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनमें चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के भविष्य और टाटा संस की शेयर बाजार में लिस्टिंग पर कड़े फैसले लिए जा सकते हैं. ट्रस्टियों के बीच बढ़ते मतभेद और नोएल टाटा की नई शर्तों ने मामले को दिलचस्प बना दिया है.
एन. चंद्रशेखरन, नोएल टाटा.
टाटा समूह (Tata Group) के भीतर इन दिनों काफी बड़ी हलचल देखने को मिल रही है. खबर है कि समूह की दो सबसे ताकतवर संस्थाओं, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (Sir Dorabji Tata Trust) और सर रतन टाटा ट्रस्ट (Sir Ratan Tata Trust) की अगले महीने मई में बेहद खास बैठकें होने वाली हैं. जानकारों की मानें तो यह बैठकें 8 मई और 12 मई को तय की गई हैं. यह समय इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके ठीक बाद जून में टाटा संस (Tata Sons) के बोर्ड की मीटिंग होनी है. इस पूरी प्रक्रिया को टाटा ग्रुप के भविष्य के लिए एक बड़े मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें नेतृत्व और कंपनी के ढांचे को लेकर बड़े फैसले हो सकते हैं.
मनीकंट्रोल की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, इस बैठक में दो मुख्य मुद्दे रहने की संभावना है. पहला मुद्दा टाटा संस (Tata Sons) के मौजूदा चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन (N. Chandrasekaran) के कार्यकाल को लेकर है. उनका अगला 5 साल का कार्यकाल आगे बढ़ाया जाए या नहीं, इस पर ट्रस्ट के सदस्यों के बीच चर्चा हो सकती है. दूसरा और सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला मुद्दा है लिस्टिंग (Listing). इसका मतलब यह है कि क्या टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट किया जाना चाहिए? हालांकि, आधिकारिक एजेंडे में अभी इन्हें रुटीन बताया गया है, लेकिन ग्रुप के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि मौजूदा स्थितियों को देखते हुए इन गंभीर विषयों पर चर्चा टालना नामुमकिन है.
पुराने समझौतों में आती दरारें
पिछले साल जुलाई में टाटा ट्रस्ट्स ने एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें सभी ट्रस्टियों ने एकजुट होकर यह तय किया था कि वे अहम मुद्दों पर एक साथ वोट करेंगे. उस समय यह भी तय हुआ था कि टाटा संस को फिलहाल शेयर बाजार में लिस्ट नहीं किया जाएगा और एन. चंद्रशेखरन को एक और कार्यकाल दिया जाएगा. लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि वह एकता धीरे-धीरे कम हो रही है. ट्रस्टी वेणु श्रीनिवासन (Venu Srinivasan) और विजय सिंह (Vijay Singh) ने अब लिस्टिंग के पक्ष में बोलना शुरू कर दिया है, जो उनके पुराने स्टैंड से बिल्कुल अलग है. इस बदलाव ने समूह के भीतर एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि क्या पुराने फैसले अब भी लागू रहेंगे या उनमें बदलाव की जरूरत है.
नोएल टाटा की भूमिका
इस पूरी स्थिति में टाटा ट्रस्ट्स (Tata Trusts) के चेयरमैन नोएल टाटा (Noel Tata) की भूमिका सबसे अहम हो गई है. फरवरी 2026 में हुई एक मीटिंग के दौरान उन्होंने एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर तुरंत मुहर नहीं लगाई थी. उन्होंने स्पष्ट रूप से चेयरमैन से आने वाले समय का पूरा बिजनेस प्लान मांगा और यह भी चाहा कि टाटा संस को लिस्ट न करने का भरोसा दिया जाए. टाटा ग्रुप के नियमों के मुताबिक, किसी भी बड़े फैसले के लिए उन डायरेक्टर्स की सहमति जरूरी है जिन्हें ट्रस्ट ने चुना है. ऐसे में नोएल टाटा का वोट इस पूरी गुत्थी को सुलझाने या उलझाने में सबसे बड़ी ताकत रखता है.
क्या होगा टाटा साम्राज्य पर इसका असर?
टाटा ट्रस्ट्स असल में टाटा ग्रुप की रीढ़ की हड्डी है, क्योंकि इसी के पास ग्रुप के रणनीतिक फैसलों की कमान होती है. अगर ट्रस्टियों के बीच मतभेद गहराते हैं, तो इसका असर ग्रुप के निवेश और भविष्य की रणनीतियों पर पड़ सकता है. मई की इन बैठकों में यह साफ हो जाएगा कि क्या पिछला जुलाई 2025 वाला प्रस्ताव अब भी कानूनी रूप से मान्य है या ट्रस्टी अपनी बदली हुई राय के साथ आगे बढ़ेंगे. जानकारों का कहना है कि अगर कोई ट्रस्टी पुराने समझौते से अलग हटकर फैसला लेता है, तो इसके कानूनी परिणाम भी हो सकते हैं. कुल मिलाकर, मई और जून के ये दो महीने टाटा साम्राज्य की नई दिशा तय करने वाले साबित होंगे.
मनीकंट्रोल ने लिखा है खबर प्रकाशित होने के समय तक टाटा ट्रस्ट्स की तरफ से ईमेल का जवाब नहीं मिला था.

