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Neera Cafe Hyderabad: हैदराबाद के नेकलेस रोड पर स्थित 13 करोड़ की लागत वाला ‘नीरा कैफे’ पारंपरिक ग्रामीण ताड़ के पेय ‘नीरा’ को आधुनिक रूप दे रहा है. कोल्ड-चेन टेक्नोलॉजी का उपयोग करके, इसे ताज़ा और नॉन-अल्कोहलिक बनाए रखा जाता है. यह पहल न केवल स्वास्थ्य के प्रति जागरूक युवाओं को प्राकृतिक विकल्प दे रही है, बल्कि ताड़ निकालने वाले गौड़ा समुदाय के लिए रोजगार और सम्मान के नए अवसर भी खोल रही है. यह भारत की सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक बाजार में सफलतापूर्वक स्थापित करने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है.
हैदराबाद: आधुनिकता की चकाचौंध के बीच जहां पारंपरिक देसी पेय हाशिए पर जा रहे हैं वहीं तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में एक अनोखा प्रयोग देश का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है. हैदराबाद के प्रसिद्ध हुसैन सागर झील के किनारे, नेकलेस रोड पर बना नीरा कैफे आज के शहरी युवाओं के लिए एक नया हॉटस्पॉट बन चुका है. करीब 13 करोड़ रुपए की लागत से तैयार यह कैफे किसी इंटरनेशनल आउटलेट को टक्कर देता है लेकिन यहां मिलने वाला मेन्यू पूरी तरह से स्वदेशी है.
यह कैफे सिर्फ एक फूड आउटलेट नहीं है बल्कि यह पारंपरिक गौड़ा समुदाय के रोजगार को बचाने और एक प्राकृतिक हेल्थ ड्रिंक को ग्लोबल पहचान दिलाने का एक सफल सामाजिक-आर्थिक मॉडल है. ताड़ और खजूर के पेड़ों से निकलने वाला नीरा औषधीय गुणों से भरपूर और पूरी तरह से नॉन-अल्कोहलिक पेय है. हालांकि इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि सूर्योदय के बाद तापमान बढ़ते ही यह फर्मेंट होकर नशीली ताड़ी में बदल जाता है.
कोल्ड-चेन तकनीक और स्वच्छता का संगम
इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने कोल्ड-चेन टेक्नोलॉजी का सहारा लिया है. गांवों के कलेक्शन सेंटरों से नीरा को निकालते ही उसे तुरंत 4°C तापमान पर स्टोर कर सीधे कैफे तक पहुंचाया जाता है. कैफे में ग्राहकों को बिल्कुल हाइजीनिक, चिल्ड और आधुनिक पैकेजिंग में शुद्ध नीरा परोसा जाता है जिसकी कीमत करीब 50 रुपए प्रति ग्लास रखी गई है. वहीं दूसरी तरफ, बाजारों में पारंपरिक ताड़ी का दाम 30 से 40 रुपए प्रति लीटर के आसपास होता है. कम कीमत और सही रखरखाव न होने के कारण ताड़ी निकालने वाले कारीगरों को पहले बहुत कम मुनाफा मिलता था लेकिन नीरा कैफे मॉडल ने इस प्राकृतिक पेय की ब्रांड वैल्यू को कई गुना बढ़ा दिया है.
ग्रामीण हुनर को मिली कॉर्पोरेट पहचान
तेलंगाना सरकार की अनूठी नीरा पॉलिसी के तहत इस पेय को बेचने का विशेष अधिकार केवल इसी समुदाय के पास है. 300 से 500 लोगों की बैठने की क्षमता वाले इस आधुनिक कैफे ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही मार्केटिंग और सरकारी संरक्षण मिले, तो भारत के ग्रामीण हुनर को एक हाई-एंड कॉर्पोरेट ब्रांड में बदला जा सकता है. यह प्रयोग न केवल स्वास्थ्य के प्रति जागरूक युवाओं को एक प्राकृतिक विकल्प दे रहा है, बल्कि ताड़ निकालने वाले गौड़ा समुदाय के लिए रोजगार और सम्मान के नए रास्ते भी खोल रहा है. रोजगार और संस्कृति को सहेजता यह प्रयोग वाकई देश में अपनी तरह का इकलौता और प्रेरणादायक मॉडल है जो भविष्य में अन्य राज्यों के लिए एक बेहतर उदाहरण साबित होगा.
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Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with News18 Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें

