Friday, April 10, 2026
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पाकिस्तानी बमबारी में पैर खोया, एक पैर से लगा रहा हूं दफ्तरों के चक्कर, जमीन की मेरी फाइल अफसरों को ही नहीं मिल रही – Bikaner News



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80 साल को हो गया हूं। ये जो कटा पैर देख रहे हैं, वो भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 में हुए का नतीजा है। पाकिस्तानी फाइटर प्लेन की बमबारी में हुए ब्लास्ट में ऐसा हुआ। आज सबकुछ ठीक है, लेकिन कुछ शिकायत है उन अफसरों से जो योद्धाओं के बेटल कैज्युलटी के मिलने वाले लाभों में अड़चनें डाल रहे हैं। मैं बुढ़ापे में एक पैर से सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहा हूं, सहायता में मिलने वाली जमीन की फाइल अफसरों को नहीं मिल रही!

हम जयपुर से करीब 30 किमी दूर रामपुरा में फौजी नानूराम गुर्जर के घर पर हैं। बैसाखियों के सहारे जिंदगी बसर कर रहे इस जाबांज फौजी को इस बात का गर्व है कि वे उस फौज का हिस्सा रहे जिन्होंने पाकिस्तानी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था।

वे अतीत में खोते हैं- तब पंजाब के डेराबाबा नानग से लाहौर सेक्टर एरिया में उनकी तैनातगी थी। युद्ध छिड़ चुका था। 9 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी फाइटर प्लैन ने बमबारी शुरु की। हमने जवाबी हमला किया, लेकिन इसी दौरान फटे बम ने उनके पैर को उड़ा दिया। ब्लास्ट ने सबकुछ बदल कर रख दिया। वे खून से लथपथ थे। बचे कैसे उन्हें खुद ही पता नहीं। साथी जवान उन्हें अमृतसर, पुणे आर्मी हॉस्पिटल ले गए, लेकिन सिवाय पैर को काटने के डाक्टरों के पास कोई चारा नहीं बचा था।

नानूराम सिर्फ साक्षर हैं। उस दौरान 75 रुपए महीने के वेतन पर फौज में भर्ती हुए थे। 1984 में रिटायरमेंट के बाद वे अपने घर पर ही हैं। बताते हैं-युद्ध के बाद ही उन्हें सरकार की ओर से 72 में 12 बीघा जमीन तो दे दी गई, लेकिन बाकी 13 बीघा जमीन के लिए वे एक पैर पर सरकारी दफ्तरों में भटक रहे हैं। कलेक्ट्रेट में बाबूओं ने कहा अब आपकी फाइल ही नहीं मिल पा रही है। बीकानेर, सैनिक कल्याण विभाग में भी कई चक्कर काटने के बाद अब हार मान ली है।

जिंदगी के आखिरी दौर को मैं मजे के साथ जीना चाहता हूं। उन्हें इस बात की खुशी है कि इंडियन आर्मी का हिस्सा रहे है। आज भी आर्मी उनका पूरा ख्याल रखती है। राज्य सरकार से उनकी दरख्वास्त है कि ऐसी कोई नीति बने कि समय-समय पर देश के ऐसे घायल फौजियों का हालचाल जान लिया जाए।

17 नवंबर 2025; रामपुरा में रहते हैं। जमीन की फाइल गुम होने की बात बताते हुए बेहद निराश नजर आए नानूराम।

योद्धाओं के घर पहुंचा भास्कर

देश के लिए युद्ध लड़ने का गर्व है, आर्मी भी ध्यान रखती है …सिस्टम से हार मान ली मैंने

1971; पाकिस्तान से युद्ध के दौरान लाहौर सेक्टर एरिया में तैनात थे



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