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देश के महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह के जीवन ने हमेशा से बॉलीवुड को प्रेरित किया है, लेकिन साल 2002 में सिनेमाघरों में एक ऐसा दुर्लभ नजारा दिखा जब भगत सिंह पर आधारित तीन फिल्में एक साथ रिलीज हुईं. अजय देवगन की ‘द लेजेंड ऑफ भगत सिंह’, बॉबी देओल और सनी देओल की ’23 मार्च 1931: शहीद’ और सोनू सूद की ‘शहीद-ए-आजम’ के बीच उस वक्त बॉक्स ऑफिस पर कड़ी टक्कर देखने को मिली थी. जहां राजकुमार संतोषी के निर्देशन में बनी अजय देवगन की फिल्म ने न केवल दर्शकों का दिल जीता बल्कि इतिहास रचते हुए ब्लॉकबस्टर साबित हुई, वहीं बॉबी देओल और सनी देओल की फिल्म को दर्शकों ने पूरी तरह नकार दिया. इस हार का असर इतना गहरा था कि देओल भाइयों के करियर पर सालों तक फ्लॉप फिल्मों का साया बना रहा. आइए जानते हैं उस दिलचस्प फिल्मी जंग की पूरी कहानी जिसने अजय देवगन को नेशनल अवार्ड दिलाया और बॉबी-सनी के लिए एक बुरा सपना साबित हुई.
नई दिल्ली. भारतीय फिल्म इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है जब एक ही विषय पर दो फिल्में आमने-सामने आईं, लेकिन साल 2002 का वह दौर आज भी सिनेमाई गलियारों में चर्चा का विषय रहता है. उस साल देश के महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह के जीवन पर आधारित एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीन फिल्में महज एक हफ्ते के अंतराल में रिलीज हुई थीं. इस ऐतिहासिक टकराव ने न केवल फिल्म निर्माण की दौड़ को उजागर किया, बल्कि कई बड़े सितारों के करियर की दिशा भी तय कर दी. आज हम विस्तार से चर्चा करेंगे उन तीन फिल्मों की- ‘द लेजेंड ऑफ भगत सिंह’, ’23 मार्च 1931: शहीद’ और ‘शहीद-ए-आजम’.

सिनेमाई इतिहास का सबसे बड़ा ‘क्लैश’: जून 2002 में सिनेमाघरों में एक अजीब सा नजारा था. दर्शक जब थिएटर पहुंचते, तो उनके सामने एक ही कहानी को तीन अलग-अलग अंदाज में देखने का विकल्प था. सोनू सूद अभिनीत ‘शहीद-ए-आजम’ 31 मई 2002 को रिलीज हुई थी. वहीं, एक हफ्ते बाद 7 जून 2002 को भारतीय सिनेमा के दो दिग्गज आमने-सामने थे. एक तरफ अजय देवगन की ‘द लेजेंड ऑफ भगत सिंह’ थी और दूसरी तरफ देओल ब्रदर्स यानी सनी और बॉबी देओल की ’23 मार्च 1931: शहीद’.

यह टकराव केवल फिल्म का नहीं, बल्कि साख का भी था. राजकुमार संतोषी और सनी देओल के बीच हुए मनमुटाव के बाद दोनों ने अलग-अलग फिल्में बनाने का फैसला किया था. संतोषी ने अजय देवगन को चुना, जबकि सनी देओल ने अपने छोटे भाई बॉबी को भगत सिंह के रूप में पेश करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी.
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अजय देवगन की ‘द लेजेंड ऑफ भगत सिंह’: राजकुमार संतोषी के निर्देशन में बनी इस फिल्म को आज भी भगत सिंह पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में गिना जाता है. फिल्म की पटकथा, एआर रहमान का संगीत और अजय देवगन की आंखों में छिपी वो क्रांतिकारी आग दर्शकों के सीधे दिल में उतरी. अजय देवगन ने इस किरदार को इतनी संजीदगी से निभाया कि उन्हें इसके लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ‘नेशनल अवार्ड’ मिला.

फिल्म ने न केवल क्रिटिक्स से वाहवाही बटोरी, बल्कि यह बॉक्स ऑफिस पर भी सफल रही. आज भी जब भगत सिंह का नाम आता है, तो अजय देवगन का वह चेहरा जेहन में सबसे पहले आता है. ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ और ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ जैसे गानों ने इस फिल्म को अमर बना दिया. यह फिल्म रिलीज के साथ ही बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी.

देओल ब्रदर्स की ’23 मार्च 1931: शहीद’: दूसरी तरफ सनी देओल अपने भाई बॉबी देओल के करियर को एक नई ऊंचाई देना चाहते थे. गुड्डू धनोआ के निर्देशन में बनी इस फिल्म में बॉबी ने भगत सिंह और सनी देओल ने चंद्रशेखर आजाद की भूमिका निभाई थी. फिल्म का बजट काफी बड़ा था और प्रमोशन में भी कोई कमी नहीं छोड़ी गई थी, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर इसे दर्शकों ने सिरे से नकार दिया.

फिल्म के फ्लॉप होने की सबसे बड़ी वजह अजय देवगन की फिल्म से इसकी सीधी तुलना थी. दर्शकों को अजय देवगन की एक्टिंग और संतोषी का निर्देशन कहीं अधिक प्रभावशाली लगा. बॉबी देओल के लिए यह फिल्म उनके करियर का सबसे बुरा मोड़ साबित हुई.

करियर की तबाही और सालों का वनवास: ’23 मार्च 1931: शहीद’ की असफलता का असर सनी और बॉबी देओल के करियर पर बहुत गहरा पड़ा. इस फिल्म के बाद अगर आप दोनों भाइयों की फिल्मोग्राफी देखेंगे, तो पाएंगे कि अगले कई सालों तक उनकी झोली में केवल फ्लॉप और डिजास्टर फिल्में ही रहीं. सनी देओल की ‘जाल: द ट्रैप’, ‘खेल’, ‘लकीर’ जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर पानी मांगती नजर आईं. वहीं बॉबी देओल का चमकता सितारा पूरी तरह धुंधला हो गया और वे धीरे-धीरे इंडस्ट्री से गायब होने लगे. एक लंबे समय तक दोनों भाइयों को वह सफलता नहीं मिली जिसके लिए वे जाने जाते थे. बॉबी देओल के लिए तो यह ‘करियर का अंत’ जैसा लगने लगा था, लेकिन कहते हैं कि समय का पहिया जरूर घूमता है.

सोनू सूद की गुमनाम शुरुआत: इन दो बड़ी फिल्मों के बीच सोनू सूद की ‘शहीद-ए-आजम’ पूरी तरह दबकर रह गई. हालांकि सोनू सूद की एक्टिंग की तारीफ हुई, लेकिन कम बजट और सीमित रिलीज के कारण यह फिल्म दर्शकों तक नहीं पहुंच पाई. यह सोनू सूद के करियर की शुरुआती फिल्मों में से एक थी, जिसे आज बहुत कम लोग याद करते हैं.

धमाकेदार वापसी: सालों तक फ्लॉप फिल्मों के दौर से गुजरने के बाद, अब साल 2024-25 में देओल भाइयों ने फिर से अपनी ताकत दिखाई है. सनी देओल ने ‘गदर 2’ से इतिहास रचा, तो बॉबी देओल ने ‘एनिमल’ और अब अपकमिंग फिल्मों से ओटीटी और बड़े पर्दे पर धमाका कर दिया है. 2026 में सनी की ‘बॉर्डर 2’ का आना यह साबित करता है कि जो लेजेंड होते हैं, वे कभी खत्म नहीं होते.

2002 की वह जंग हमें सिखाती है कि दर्शकों के सामने जब विकल्प होते हैं, तो जीत हमेशा ‘कंटेंट’ और ‘इमोशन’ की होती है. अजय देवगन उस जंग के विजेता बनकर उभरे, जबकि देओल भाइयों के लिए वह हार एक लंबी सीख और संघर्ष का सफर लेकर आई.

