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RBI Untold Story : आजादी और बंटवारे से जुड़ी वैसे तो तमाम कहानियां आपको पता होंगी, लेकिन आज हम रिजर्व बैंक से जुड़ी एक ऐसी दास्तां बताते हैं, जिसने भारत की उदारता और सहयोग की अनूठी मिसाल पेश की है. साल 1947 में आजादी के बाद आरबीआई ने पाकिस्तान के बैंक के तौर पर काम किया. यही वजह रही कि भारत को अपना केंद्रीय बैंक 2 साल बाद मिला.
आजादी के बाद भारतीय करेंसी ही पाकिस्तान में भी चलती थी.
नई दिल्ली. वैसे तो पाकिस्तान और भारत की आजादी के बीच सिर्फ एक रात का फर्क है. दोनों देश पहले एक हुआ करते थे और आजादी के बाद का बंटवारा तो आज तक दोनों देशों के लिए किसी बड़े जख्म की तरह बना हुआ है. दो मुल्क बनने के बाद दोनों ने अपनी-अपनी सरकारें बनाई और तमाम संस्थाओं को भी जन्म दिया, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक आजादी के 11 महीने बाद तक पाकिस्तान का भी केंद्रीय बैंक बना रहा था. इस दौरान आरबीआई ने पाकिस्तान की बैंकिंग और करेंसी से जुड़े सभी कामकाज भी संभाले थे.
दरअसल, आरबीआई की स्थापना तो आजादी के 12 साल पहले ही 1935 में हो गई थी. साल 1947 तक इसके पास पूरे उपमहाद्वीप में करेंसी का सर्कुलेशन बनाए रखने के लिए ऑफिस, कर्मचारी और बैंकिंग संबंधी सभी अधिकार मौजूद थे. इसके नेटवर्क में कराची और लाहौर के करेंसी ऑफिस भी आते थे, लेकिन बंटवारे के बाद यह पाकिस्तान का हिस्सा बन गए. यही वजह रही बंटवारे के तत्काल बाद पाकिस्तान के पास अपना बैंकिंग इन्फ्रा नहीं था. तब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने पाकिस्तान के सेंट्रल बैंक के तौर पर काम किया. उसने पाकिस्तान की सरकार से जुड़े बैंकिंग और करेंसी से जुड़े इंतजाम संभाले, जबकि नया देश अपना खुद का संस्थान बना रहा था.
आरबीआई ने छापे थे पाकिस्तान के नोट
रिजर्व बैंक के अनोखे उत्तरदायित्व का सबूत उस समय के बैंक नोटों से भी मिलता है. आरबीआई ने ही तब पाकिस्तान के लिए पहली करेंसी छपवाई थी. भारत में छपे इन नोटों पर ‘गवर्नमेंट ऑफ पाकिस्तान’ लिखा है. पाकिस्तान ने जब तक अपना केंद्रीय बैंक बनाया और जरूरी कानून लागू करने के साथ कर्मचारियों की भर्ती की, तब तक सारा बैंकिंग कामकाज आरबीआई की देखरेख में ही चलता रहा. इसकी वजह यही थी कि पाकिस्तान के अलग मुल्क बनने के बाद भी उसके सरकारी कामकाज और करेंसी की सप्लाई को रोका नहीं जा सकता था. लिहाजा आरबीआई ने यह जिम्मेदारी 11 महीने तक निभाई.
तब तक नहीं हुआ आरबीआई का राष्ट्रीयकरण
रिवर्ज बैंक के इतिहास की यह सबसे अनोखी बात है कि आजादी के 2 साल तक आरबीआई का राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया. दरअसल, पाकिस्तान के केंद्रगीय बैंक के तौर पर काम करने के लिए साल 1947 में पाकिस्तान (मौद्रिक प्रणाली और रिजर्व बैंक) आदेश, 1947 के तहत एक अंतरिम व्यवस्था लागू की गई. इस दौरान आरबीआई ने पाकिस्तान सरकार के बैंकर के तौर पर काम करना जारी रखा और उसकी मुद्रा प्रणाली को सहयोग दिया. आरबीआई ने जून 1948 तक पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के तौर पर काम किया. इस समय तक आरबीआई शेयरहोल्डर्स के मालिकाना हक वाली संस्था थी, क्योंकि उसे पाकिस्तान के लिए भी काम करना था तो इसका राष्ट्रीयकरण साल 1949 में किया गया. जब पाकिस्तान में इसकी भूमिका खत्म हो गई.
पाकिस्तान में चलती थी भारतीय करेंसी
आजादी के समय पाकिस्तान ने नए डिजाइन वाले नोट नहीं छापे थे. वहां शुरुआत में भारतीय करेंसी ही चलन में रही. बाद में पाकिस्तान में इस्तेमाल के लिए मौजूदा नोटों में बदलाव किए गए. स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के अनुसार, उसने पहली बार 1 रुपये, 2 रुपये, 5 रुपये, 10 रुपये और 100 रुपये के नोट छापे थे. इन नोटों पर ऊपर की तरफ अंग्रेजी में ‘Government of Pakistan’ छपा था, जबकि वॉटरमार्क वाले हिस्से पर उर्दू में ‘Hakumat-e-Pakistan’ लिखा था. नोट का मूल डिजाइन भारतीय ही रहा. इन अतिरिक्त शब्दों की वजह से पाकिस्तान को नोटों पर अपनी सरकार का नाम छापने के लिए करेंसी की पूरी तरह से नई सीरीज के डिजाइन, प्रिंटिंग और वितरण का इंतजार नहीं करना पड़ा.
कब खुला पाकिस्तान का केंद्रीय बैंक
आजादी के बाद पाकिस्तान का केंद्रीय बैंक स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान 1 जुलाई, 1948 को कराची में खुला और जाहिद हुसैन इसके पहले गवर्नर बने. इसके उद्घाटन के समय मुहम्मद अली जिन्ना ने इस संस्थान को आर्थिक आजादी का प्रतीक बताया था. ‘बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स’ के अनुसार उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान के स्टेट बैंक का खुलना वित्तीय क्षेत्र में हमारे देश की संप्रभुता का प्रतीक है. इसके बाद आरबीआई ने पाकिस्तान में अपना कामकाज बंद किया और फिर उसका राष्ट्रीयकरण किया गया. लिहाजा देखा जाए तो आजादी के बाद भारत को अपना केंद्रीय बैंक पाकिस्तान के भी करीब एक साल बाद मिला, जबकि आरबीआई पहले से ही भारतीय बैंकिंग सिस्टम के लिए काम कर रहा था.
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प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्वेस्टमेंट टिप्स, टैक्स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि…
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