Thursday, January 15, 2026
Homeराज्यबिहार29 कांग्रेसी विधायकों को मंत्री बनाकर राबड़ी को CM बनवाया: सजा...

29 कांग्रेसी विधायकों को मंत्री बनाकर राबड़ी को CM बनवाया: सजा हुई तो छोटे बेटे को डिप्टी CM बनवाया; बोले-बेटा चुनाव नहीं लड़ेगा, तो क्या भैंस चराएगा – Bihar News


चुनावी माहौल में दैनिक भास्कर लाया है ऐसे सियासी परिवारों की कहानी, जिनका दशकों से बिहार की राजनीति में दबदबा है। इलेक्शन सीरीज ‘कुनबा’ के पहले एपिसोड में आज कहानी लालू यादव परिवार की…

.

24 जुलाई 1997 की शाम। पटना हाईकोर्ट ने चारा घोटाला केस में लालू यादव की जमानत याचिका खारिज कर दी। गिरफ्तारी तय थी। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे की मांग उठ रही थी। सीएम आवास में लालू अपने मंत्रियों और समर्थकों के साथ बैठे थे। उनके माथे पर पसीना था। लगातार फोन बज रहा था और वे बार-बार रिसीवर उठाकर पटक दे रहे थे।

लालू को खबर मिल गई थी कि राष्ट्रपति शासन लगने वाला है। सुरक्षाबल के जवानों ने मुख्यमंत्री आवास को घेरना शुरू कर दिया था। सियासी गलियारों में लालू के उत्तराधिकारी की चर्चा होने लगी थी। जगदानंद सिंह, जाबिर हुसैन और रघुवंश प्रसाद जैसे नेता मुख्यमंत्री की रेस में थे। रंजन यादव तो लालू यादव के दाहिना हाथ माने जाते थे।

रात 10 बजे लालू बेडरूम में आए। पत्नी राबड़ी देवी से कहा, ‘कल सुबह आपको सीएम का ओथ लेना है।’ ये सुनकर राबड़ी और उनके बच्चे रोने लगे।

सीनियर जर्नलिस्ट अनुरंजन झा अपनी किताब ‘गांधी मैदान: ब्लफ ऑफ सोशल जस्टिस’ में लिखते हैं, उस रात लालू ने कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को फोन किया, पर बात नहीं हुई। कुछ देर बाद केसरी ने रिटर्न कॉल किया। लालू ने कहा- ‘केसरी जी! हम राबड़ी जी को मुख्यमंत्री बना रहे हैं, आप समर्थन देंगे? इसके बदले जो कहिए सब मंजूर होगा।’

इधर, विधायकों को साधने की कवायद भी तेजी से चल रही थी। राबड़ी के भाई और बाहुबली साधु यादव ने उन नेताओं को शांत करा दिया जिनकी नजर सीएम की कुर्सी पर थी। अगले दिन यानी 25 जुलाई को दोपहर 2.30 बजे लालू के घर विधायकों की बैठक हुई। लालू ने हॉल में आते ही पूछा- ‘सब लोग आ गए।’ आवाज आई- ‘जी, जी, सब आ गए।’

खड़े-खड़े लालू ने कहा, ‘हम इस्तीफा दे रहे हैं। आप लोग अब अपना नेता चुन लीजिए।’ इतना कहकर लालू हॉल से बाहर आ गए। थोड़ी देर बाद साधु यादव और अनवर अहमद के साथ राबड़ी देवी बैठक में पहुंचीं।

सीनियर जर्नलिस्ट संकर्षण ठाकुर अपनी किताब ‘द ब्रदर्स बिहारी’ में लिखते हैं- ऊर्जा मंत्री श्याम रजक ने राबड़ी देवी को विधायक दल का नेता चुनने का प्रस्ताव रखा। फिर सभी विधायकों को एक कागज पर दस्तखत करने के लिए कहा गया। पांच मिनट बाद हॉल में नारा लगने लगा- ‘लालू यादव जिंदाबाद! राबड़ी देवी जिंदाबाद!’

शाम 6 बजे राबड़ी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस दौरान वो तीन बार लड़खड़ाईं। ठहाके लगे तो लालू ने अपने प्रशंसकों से कहा, ‘कल से तन-तन बोली।’ राबड़ी को सीएम बनवाने के लिए लालू ने कांग्रेस के सभी 29 विधायकों को मंत्री बनवा दिया।

लालू परिवार में कुल 20 लोग हैं। इनमें से 8 लोग राजनीति में हैं। लालू दो बार तो राबड़ी तीन बार सीएम रह चुकी हैं। तेजस्वी यादव दो बार डिप्टी सीएम रह चुके हैं। तेज प्रताप दो-दो बार मंत्री रह चुके हैं। बेटी मीसा पहले राज्यसभा सांसद और अब लोकसभा सांसद हैं। करीब 30 साल से आरजेडी का मुखिया लालू कुनबे से ही रहा है।

इस कुनबे की शुरुआत होती है लालू यादव से…

लालू यादव का जन्म आजादी के एक साल बाद 11 जून 1948 को गोपालगंज जिले के फुलवरिया गांव में हुआ था। वे 8 भाई-बहनों में छठे नंबर पर थे। जब लालू का जन्म हुआ तो उनके पिता के पास मुश्किल से 2 बीघा जमीन थी। परिवार झोपड़ी में रहता था।

लालू के बड़े भाई महावीर राय वेटरनरी कॉलेज में नौकरी करते थे। लालू यादव को पढ़ाने के लिए वे अपने साथ पटना ले आए। बाद में पटना यूनिवर्सिटी से लालू ने छात्रसंघ की राजनीति की शुरुआत की। 1970 में वे पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव और 1973 में अध्यक्ष बन गए।

अगले साल यानी 1974 में लालू, जेपी आंदोलन में कूद पड़े। इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए चुनाव में 29 साल के लालू जनता पार्टी के टिकट पर पहली बार छपरा से सांसद बने। इसके बाद 1980 और 1985 में विधायक बने।

1980 के दशक से ही बिहार में अगड़े-पिछड़े की राजनीति जोर पकड़ने लगी थी। साल 1988 में विधायक दल के नेता कर्पूरी ठाकुर का निधन हो गया। इसके बाद पिछड़ों की राजनीति का नेतृत्व खाली हो गया, जिसे लालू ने अपने पक्ष में मोड़ लिया। तब नीतीश कुमार और रंजन यादव की मदद से लालू यादव विधायक दल के नेता चुने गए। यहीं से उनके राजनीतिक करियर में उभार आया।

खुद को मुख्यमंत्री बनाने के लिए चंद्रशेखर को फोन लगाया 8 मार्च 1990, पटना में गंगा किनारे ब्रज किशोर हॉल में जनता दल की बैठक चल रही थी। यहीं बिहार का नया मुख्यमंत्री चुना जाना था। 324 सीटों वाली बिहार विधानसभा में 122 विधायकों के साथ जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। जनता दल की ओर से मुख्यमंत्री पद के 2 प्रमुख दावेदार थे- पूर्व सीएम रामसुंदर दास और लालू प्रसाद यादव।

लालू यादव की बायोग्राफी ‘गोपालगंज टू रायसीना: माय पॉलिटिकल जर्नी’ के मुताबिक लालू ने चंद्रशेखर से कहा, ‘बाबू साहब आपने कुछ नहीं किया तो वीपी सिंह का आदमी बिहार में CM की गद्दी पर बैठ जाएगा।’

चंद्रशेखर उस वक्त वीपी सिंह से बेहद खफा थे। 3 महीने पहले ही वीपी सिंह ने चंद्रशेखर को धोखे में रखकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पाई थी। लालू इसी नाराजगी का फायदा उठाना चाहते थे।

चंद्रशेखर ने लालू का फोन रखते ही अपने भरोसेमंद रघुनाथ झा को फोन घुमाया। अगली सुबह रघुनाथ ने भी अपनी दावेदारी ठोक दी। इस तरह चुनाव त्रिकोणीय हो गया। वोटिंग कराने का फैसला लिया गया। कुल 127 विधायकों ने वोट किया। लालू को 59, राम सुंदर दास को 56 और 12 वोट रघुनाथ झा को मिले। इस तरह 42 साल की उम्र में लालू विधायक दल के नेता चुन लिए गए।

राज्यपाल मोहम्मद यूनुस सलीम ने पटना के गांधी मैदान में लालू यादव को बिहार के 25वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ दिलाई।

राज्यपाल मोहम्मद यूनुस सलीम ने पटना के गांधी मैदान में लालू यादव को बिहार के 25वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ दिलाई।

CBI जांच रोकने के लिए समर्थन देकर गुजराल को पीएम बनवाया बिहार में राम रथयात्रा रोकने और लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद जनता दल में लालू प्रसाद यादव का कद काफी बढ़ चुका था। 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी जनता दल को जीत मिली और इस बार भी लालू प्रसाद मुख्यमंत्री बने।

उस वक्त लालू जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी थे। 1 जून 1996 को जनता दल के एच.डी. देवगौड़ा कांग्रेस की मदद से प्रधानमंत्री बने। पूर्व PM इंद्र कुमार गुजराल अपनी बायोग्राफी ‘मैटर्स ऑफ डिसक्रिएशन’ में लिखते हैं, ‘देवगौड़ा और लालू यादव की आपस में नहीं बनती थी। देवगौड़ा ने CBI को लालू के खिलाफ चारा घोटाले की जांच आगे बढ़ाने की इजाजत दे दी।’

अप्रैल 1997 में कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और देवगौड़ा सरकार गिर गई। 21 अप्रैल को इंद्र कुमार गुजराल भारत के 12वें प्रधानमंत्री बने। गुजराल को लालू यादव का भी समर्थन था। कुछ दिनों बाद फिर से CBI ने लालू के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने की बात कही। इस पर लालू ने PM गुजराल से कहा, ‘ये सब क्या हो रहा है? एक को हटाकर आप को PM बनवाया, आप भी यही सब कर रहे हैं।’

इसी दिन लालू ने शरद यादव, ज्योति बसु, चंद्रबाबू नायडू जैसे नेताओं को फोन किया। सभी ने कहा कि CBI चार्जशीट दाखिल करती है तो आपको CM पद से इस्तीफा देना ही होगा।

अध्यक्ष पद हाथ से जाता देख लालू ने नई पार्टी बनाई 17 जून 1997 को राज्यपाल एआर किदवई ने CBI को लालू यादव के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने की इजाजत दे दी। शरद यादव, रामविलास पासवान ने लालू यादव से इस्तीफे की मांग कर दी। इसी बीच जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद का चुनाव आ गया। शरद यादव ने लालू यादव को चुनौती दे दी।

लालू समझ गए कि अध्यक्ष पद गया तो सीएम कुर्सी भी नहीं बचेगी। 5 जुलाई 1997 को लालू ने नई पार्टी का ऐलान कर दिया। नाम रखा राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद और खुद बन गए राष्ट्रीय अध्यक्ष। तब बिहार में जनता दल के 22 सांसद थे, उसमें से 16 सांसद लालू के खेमे में आ गए।

मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार अपने गांव फुलवरिया गए लालू प्रसाद यादव की तस्वीर। (फोटो - राजीव कांत)

मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार अपने गांव फुलवरिया गए लालू प्रसाद यादव की तस्वीर। (फोटो – राजीव कांत)

जेल जाने की नौबत आई, तो पत्नी को मुख्यमंत्री बनवा दिया

23 जून, 1997 को लालू समेत 55 लोगों के खिलाफ CBI ने चारा घोटाला मामले में चार्जशीट दाखिल की। उनके खिलाफ 63 केस दर्ज किए गए। लालू समझ गए थे कि गिरफ्तारी तय है। 25 जुलाई 1997 की शाम उन्होंने इस्तीफे का ऐलान किया और पत्नी राबड़ी देवी को सीएम बनवाया।

बाद में एक बार जब लालू से वंशवाद पर पूछा गया, तो उन्होंने कहा था, ‘मैं राजनीति में शक्ति अर्जित करने के लिए आया हूं और मैं उसे सिर्फ इसलिए नहीं त्याग दूंगा, क्योंकि किसी ने मेरे ऊपर आरोप लगाए हैं। अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाकर मैंने क्या गलती कर दी? क्या मैं अपनी सत्ता अपने राजनीतिक विरोधियों के हाथों में सौंप देता?’

पत्नी को CM बनाने के बाद 30 जुलाई, 1997 को लालू यादव ने चारा घोटाला मामले में सरेंडर किया और दिसंबर 1997 तक जेल में रहे। हालांकि लालू यादव RJD के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहे।

अक्टूबर 1998 में चारा घोटाले से जुड़े मामले में पटना की अदालत में पेश होने के लिए लालू यादव रिक्शे से पहुंचे।

अक्टूबर 1998 में चारा घोटाले से जुड़े मामले में पटना की अदालत में पेश होने के लिए लालू यादव रिक्शे से पहुंचे।

दीदी-जीजा की सत्ता में था साले साधु यादव का दबदबा 3 जुलाई 1999 की रात 8.30 बजे। पटना के गांधी मैदान थाने की पुलिस फ्रेजर रोड के क्वार्टर नंबर 12 में पहुंचीं। ये राबड़ी देवी के भाई साधु यादव का बंगला था। इस बंगले के पास पुलिस को एक गैराज से एक सफेद जेन कार में दो शव मिले। ये गौतम और शिल्पी के थे।

पोस्टमॉर्टम शुरू भी नहीं हुआ, इधर पुलिस ने दोनों मौत को आत्महत्या बता दिया। जिस गाड़ी में लाश मिली, उसे चलाकर थाने ले जाया गया, जिससे उस गाड़ी के सारे फिंगर प्रिंट्स बदल गए। रात में ही दोनों का पोस्टमॉर्टम कर दिया गया। पुलिस इतनी हड़बड़ी में थी कि उसने रात में ही गौतम का अंतिम संस्कार भी कर दिया।

परिजनों का दावा था कि पटना में शिल्पी जैन नाम की लड़की रिक्शे से अपने इंस्टीट्यूट पढ़ने जा रही थी। उसे रास्ते में अपने प्रेमी गौतम सिंह का दोस्त मिला। शिल्पी उसकी बाइक पर बैठ गई। इंस्टीट्यूट ले जाने की बजाय वो लड़का शिल्पी को फुलवारी शरीफ के एक गेस्ट हाउस में ले गया।

गौतम को कहीं से ये खबर मिली तो वह गेस्ट हाउस पहुंचा। वहां शिल्पी के साथ कई लोग छेड़छाड़ कर रहे थे। गौतम ने रोकने की कोशिश की तो उसे गला दबाकर मार दिया और शिल्पी का गैंगरेप करके हत्या कर दी गई। दोनों घर नहीं पहुंचे तो परिजनों ने FIR करवाई।

लालू यादव के साले साधू यादव की तस्वीर। पुलिस पर आरोप लगा कि शिल्पी हत्याकांड में साधू यादव को बचाने की कोशिश कर रही है।

लालू यादव के साले साधू यादव की तस्वीर। पुलिस पर आरोप लगा कि शिल्पी हत्याकांड में साधू यादव को बचाने की कोशिश कर रही है।

उस वक्त के सिटी SP भाटिया पर आरोप लगा कि वह मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के भाई साधु यादव को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। इसको लेकर विपक्ष ने हंगामा कर दिया। प्रदर्शन शुरू हो गए। दबाव बढ़ता देख राबड़ी ने सितंबर 1999 में ये केस CBI को ट्रांसफर कर दिया।

साधु यादव ने CBI को DNA और ब्लड सैंपल देने से इनकार कर दिया। साधु ने CBI के सामने बयान भी नहीं दर्ज करवाए। आखिर में 1 अगस्त 2003 को CBI ने खुदकुशी का मामला बताकर इस केस को बंद कर दिया। साधु पर बाढ़ राहत घोटाला और JNU छात्र हमले के भी आरोप लगे।

फरवरी 2005 के चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया। इस बीच लालू और साधु यादव के बीच खटास पड़ने लगी। मीसा, रोहिणी और हेमा पिता के आसपास रहने लगी थीं।

सीनियर जर्नलिस्ट संतोष सिंह अपनी किताब ‘कितना राज, कितना काज’ में लिखते हैं, ‘लालू के बच्चे पार्टी में मामा की दखल नहीं चाहते थे। अक्टूबर 2005 में साधु ने अपनी पत्नी के लिए गोपालगंज से टिकट मांगा, लेकिन लालू ने इनकार कर दिया। इसके बाद साधु यादव बागी हो गए।’

चुनाव लड़ने पर रोक लगी तो पत्नी और बेटी को उतारा अक्टूबर 2013 में चारा घोटाला मामले में लालू यादव को पांच साल की सजा सुनाई गई। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के मुताबिक लालू पर सजा के दौरान और उसके बाद 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लग गई। यहां से लालू के उत्तराधिकारी की चर्चा जोर पकड़ने लगी।

तब रघुवंश प्रसाद, अब्दुलबारी सिद्दीकी, जगदानंद सिंह और राम कृपाल यादव जैसे नेताओं की राजद में अच्छी-खासी पैठ थी। ये लोग लालू के इर्द-गिर्द ही रहते थे।

कुछ ही महीने बाद 2014 में लोकसभा चुनाव हुआ। सारण की सीट पर लालू ने अपनी जगह राबड़ी देवी को उतार दिया। वहीं पाटलीपुत्र लोकसभा सीट पर लालू ने बेटी मीसा भारती को टिकट दे दिया। ये राम कृपाल यादव की पारंपरिक सीट थी। नाराज राम कृपाल यादव बीजेपी में चले गए।

2019 लोकसभा चुनाव में नामांकन दाखिल करतीं मीसा भारती, साथ में लालू प्रसाद की तस्वीर लिए बैठीं राबड़ी देवी।

2019 लोकसभा चुनाव में नामांकन दाखिल करतीं मीसा भारती, साथ में लालू प्रसाद की तस्वीर लिए बैठीं राबड़ी देवी।

मोदी लहर में राजद महज 4 सीटों पर सिमट गई। राबड़ी देवी सारण से और मीसा भारती पाटलीपुत्र से चुनाव हार गईं। दो साल बाद यानी 2016 में राजद ने मीसा भारती को राज्यसभा भेज दिया।

2019 में एक बार फिर से वो पाटलिपुत्र सीट से चुनाव लड़ीं। इस बार भी हार गईं, लेकिन 2022 में उन्हें दोबारा राज्यसभा भेज दिया गया। 2024 में मीसा ने तीसरी बार पाटलीपुत्र सीट से चुनाव लड़ा। इस बार उन्होंने बीजेपी के राम कृपाल यादव को हरा दिया।

छोटे बेटे तेजस्वी को 26 साल की उम्र में डिप्टी सीएम बनवाया लालू के छोटे बेटे तेजस्वी यादव क्रिकेटर बनना चाहते थे। 2008 से 2012 तक IPL के चार सीजन के लिए दिल्ली डेयरडेविल टीम में वे रहे। ज्यादातर मैच में वो एक्स्ट्रा खिलाड़ी की भूमिका में नजर आए। लालू यादव ने तेजस्वी का बचाव करते हुए एक बार कहा था कि अभी पानी और तौलिया ले जा रहा है, बाद में बैटिंग भी करेगा।

लेकिन 2009 आते-आते तेजस्वी यादव लालू यादव की रैलियों में हिस्सा लेने लगे। 2010 के विधानसभा चुनाव में वे कई मौकों पर लालू के साथ दिखे। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान तेजस्वी की भूमिका सीमित ही रही।

एक साल बाद 2015 में बिहार में विधानसभा चुनाव हुए। इस बार लालू ने बड़े बेटे तेज प्रताप यादव और छोटे बेटे तेजस्वी यादव दोनों को चुनावी मैदान में उतार दिया। तब लालू पर परिवारवाद के आरोप लगे तो उन्होंने कहा था- ‘हम अपने लड़का को चुनाव नहीं लड़ाएंगे तो क्या भैंस चरवाएंगे।’

तेज प्रताप वैशाली जिले के महुआ और तेजस्वी राघोपुर से चुनाव में उतरे। इस बार महागठबंधन अलायंस में राजद, जदयू और कांग्रेस साथ मिलकर चुनाव लड़ रही थी। नतीजे महागठबंधन के पक्ष में आए।

सीएम के रूप में नीतीश का नाम पहले से ही तय था। राजद के हिस्से डिप्टी सीएम और कैबिनेट में अहम पोर्ट फोलियो शामिल था। सबकी निगाहें इस बात पर थीं कि राजद से किसका नाम आगे किया जाता है। अब्दुल बारी सिद्दीकी, जगदानंद सिंह, चंद्रिका राय जैसे नेता रेस में थे।

20 नवंबर 2015 को नई सरकार का शपथ ग्रहण कार्यक्रम था। सबसे पहले नीतीश ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके बाद शपथ ग्रहण के लिए नाम पुकारा गया- तेजस्वी यादव। फिर बड़े बेटे तेज प्रताप यादव का। तेजस्वी डिप्टी सीएम बने और तेज प्रताप स्वास्थ्य मंत्री। पार्टी के बाकी सीनियर नेताओं ने इसके बाद शपथ ली। तब तेजस्वी महज 26 साल के थे।

20 नवंबर 2015 को डिप्टी सीएम पद की शपथ लेते हुए तेजस्वी यादव।

20 नवंबर 2015 को डिप्टी सीएम पद की शपथ लेते हुए तेजस्वी यादव।

2017 में नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग होकर एनडीएम में शामिल हो गए। राजद मुख्य विपक्षी पार्टी बनी। अब बारी थी नेता प्रतिपक्ष चुनने की। राबड़ी देवी एमएलसी थीं, लेकिन नेता प्रतिपक्ष बने तेजस्वी यादव। ये जाहिर तौर पर सियासी मैसेज था कि लालू ने अपनी राजनीतिक विरासत छोटे बेटे तेजस्वी को सौंप दी है।

2019 के लोकसभा चुनाव में तेजस्वी राजद का चेहरा थे। 2020 के चुनाव में तो आधिकारिक तौर पर तेजस्वी राजद और महागठबंधन की तरफ से सीएम फेस थे। हालांकि बहुमत एनडीए को मिल गया। 2022 में नीतीश एक बार फिर से महागठबंधन में शामिल हो गए। इस बार भी तेजस्वी डिप्टी सीएम बने और तेज प्रताप हेल्थ मिनिस्टर।

अप्रैल 2022 में जेल से बाहर आने के बाद लालू यादव ने कहा था- ‘तेजस्वी यादव हमसे भी बहुत आगे निकल चुके हैं, किसी के बनाने से कोई नहीं बनता है, खुद बन जाता है।’

11 अक्टूबर 2022 को दिल्ली में RJD का दो दिवसीय सम्मेलन हुआ। इसमें दो अहम प्रस्ताव पास हुए, पहला- RJD के नीतिगत और महत्वपूर्ण मामलों में सिर्फ तेजस्वी यादव ही बोलेंगे। दूसरा- भविष्य में पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और टिकट बंटवारे पर अहम फैसले सिर्फ लालू यादव और तेजस्वी ही लेंगे।

इन दो फैसलों से साफ हो गया कि लालू ने पार्टी की कमान और अपनी राजनीतिक विरासत तेजस्वी को सौंप दी है। आज बिहार में तेजस्वी ही राजद का चेहरा हैं और उन्हीं के नेतृत्व में पार्टी चुनाव लड़ती है।

‘लैंड फॉर जॉब’ केस में लालू परिवार के 6 लोगों पर आरोप 2004 से 2009 के बीच रेल मंत्री रहते हुए लालू यादव पर जमीन के बदले नौकरी देने के आरोप लगे। कहा गया कि लालू ने रेलवे में ग्रुप-डी नौकरियां देने के बदले बिहार और झारखंड के कई लोगों से सस्ते दामों पर जमीनें लीं। ये जमीनें राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव, मीसा भारती, हेमा यादव और उनकी कंपनी एके इंफो सिस्टम के नाम पर ट्रांसफर हुईं।

2008 में मामला थोड़ा उछला, फिर ठंडा पड़ गया। 18 मई 2022 को सीबीआई ने आधिकारिक रूप से एफआईआर दर्ज की। इसके बाद चार्जशीट में लालू यादव समेत परिवार के 6 सदस्यों को आरोपी बनाया।

2023 में ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग का केस जोड़ा। ईडी के मुताबिक इस घोटाले से जुड़े लेन-देन और बेनामी संपत्तियों की कीमत करीब ₹600 करोड़ तक पहुंच सकती है। अब तक कई संपत्तियां जब्त की जा चुकी हैं। सितंबर 2025 को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने 13 अक्टूबर 2025 से रोजाना सुनवाई का आदेश दिया है।

2024 में दोनों बेटियों मीसा और रोहिणी को चुनाव में उतारा 2024 के लोकसभा चुनाव में लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती तीसरी बार पाटलीपुत्र लोकसभा सीट से चुनाव लड़ीं और छोटी बेटी रोहिणी सारण लोकसभा सीट से। मीसा जीत गईं, लेकिन रोहिणी हार गईं। लालू की तबीयत खराब होने पर रोहिणी ने ही पिता को किडनी दी थी।

चुनाव से पहले तेज प्रताप की निजी तस्वीरें वायरल हुईं 24 मई 2025 को तेज प्रताप के सोशल मीडिया अकाउंट से फोटो पोस्ट हुईं। इसमें तेज प्रताप के साथ एक लड़की नजर आ रही थी। कैप्शन लिखा गया कि, ‘मैं 12 साल से अनुष्का यादव के साथ रिलेशनशिप में हूं।’

तेजप्रताप यादव ने अनुष्का यादव के साथ सोशल मीडिया पर फोटो शेयर की थी।

तेजप्रताप यादव ने अनुष्का यादव के साथ सोशल मीडिया पर फोटो शेयर की थी।

कुछ देर बाद पोस्ट डिलीट हो गया। पांच घंटे बाद तेज प्रताप के अकाउंट से फिर एक पोस्ट हुआ। इसमें लिखा गया कि मेरा अकाउंट हैक हो गया है। ये फर्जी पोस्ट है और फोटो एडिट की गई है।

जब विवाद बढ़ने लगा तो लालू यादव ने तेज प्रताप को पार्टी और परिवार से निकाल दिया। फिलहाल तेज प्रताप परिवार से दूर अकेले रहते हैं। उन्होंने जनशक्ति जनता दल नाम से नई पार्टी भी बना ली है और महुआ से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। कई मुद्दों पर वे तेजस्वी और राजद का विरोध करते नजर आते हैं।

सीनियर पत्रकार कन्हैया भेलारी के मुताबिक लालू प्रसाद और राबड़ी देवी ने अब पूरी तरह पार्टी की कमान तेजस्वी यादव को सौंप दी है। आरजेडी में सभी रणनीतिक फैसले उन्हीं के नेतृत्व में लिए जा रहे हैं। तेजस्वी पार्टी की पारिवारिक छवि को बदलने और संगठन को कैडर आधारित बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। यही कारण है कि परिवार के भीतर असहमति भी उभर रही है। भाई तेजप्रताप यादव के साथ बहन रोहिणी आचार्य भी कई मुद्दों पर उनके खिलाफ खड़ी दिखाई देती हैं।

कन्हैया भेलारी का आकलन है कि इस बार तेजस्वी संभवत: अपने परिवार से किसी को टिकट न दें। पिछली विधानसभा में उनके नेतृत्व में आरजेडी 75 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, लेकिन टिकट वितरण को लेकर पार्टी को कुछ जगह नुकसान उठाना पड़ा था। इस अनुभव के आधार पर तेजस्वी ने संगठन में अनुशासन और स्पष्टता लाने की कोशिश की है। उनका जोर मजबूत और जीतने वाले उम्मीदवारों को टिकट देने पर है, न कि केवल परिवार के सदस्यों को प्राथमिकता देने पर। विशेषज्ञों का मानना है कि इस रणनीति से आगामी चुनाव में आरजेडी की सीटों में बढ़ोतरी की संभावना है।

कल कुनबा के दूसरे एपिसोड में पढ़िए रामविलास परिवार की कहानी…



Source link

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments