Thursday, April 16, 2026
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राममंदिर पर लगने वाला ध्वज कैसा होगा: पैराशूट कपड़े से बना, आंधी में भी नहीं फटेगा, सूर्य के मध्य होगा ‘ॐ’ – Uttar Pradesh News


अयोध्या में 25 नवंबर को राम मंदिर के मुख्य शिखर पर 11:58 बजे से दोपहर 1 बजे के बीच भव्य ध्वजारोहण होगा। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने बताया कि ध्वज केसरिया रंग का होगा, जिस पर सूर्य का चिह्न अंकित रहेगा। सूर्य के मध्य में ‘ॐ’ लिखा होगा। ध्वज पर कोविद

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केसरिया रंग का यह विशेष ध्वज सिर्फ धार्मिक प्रतीक नहीं, इसमें अयोध्या के इतिहास, सूर्यवंश की परंपरा और रामायण की गहराई छिपी है।

आखिर क्या है इस ध्वज की खासियत? यह इतना महत्वपूर्ण क्यों? सूर्य के मध्य ॐ का धार्मिक अर्थ क्या? कोविदार वृक्ष का रामायण और अयोध्या से क्या संबंध है? ध्वज के इन प्रतीकों का राम मंदिर से क्या आध्यात्मिक जुड़ाव है? पढ़िए इन सारे सवालों के जवाब भास्कर एक्सप्लेनर में….

25 नवंबर को राम मंदिर के शिखर पर ध्वजा फहराई जाएगी।

सवाल: मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण का महत्व क्या है? जवाब: बीएचयू के एस्ट्रोलॉजर प्रो. विनय कुमार पांडे बताते हैं- किसी मंदिर के शिखर पर ध्वज स्थापित करना सिर्फ एक औपचारिकता नहीं। इसका अपना गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। इसलिए ध्वज के बिना किसी भी मंदिर को पूरा नहीं माना जाता।

ध्वज केवल किसी कपड़े या धातु से बनी हुई कोई आकृति नहीं, किसी देव विशेष का स्थान होता है। सनातन परंपरा में ध्वज को ईश्वर की उपस्थिति, शक्ति और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है, मंदिर पर लहराता ध्वज संकेत देता है कि यहां दिव्य शक्ति सक्रिय है। भक्तों पर कृपा बनी हुई है। इसलिए ध्वजारोहण को अत्यंत शुभ, पवित्र और देवत्व से जुड़ा कर्म माना जाता है।

सवाल: राम मंदिर के लिए ध्वज कहां और किस फैब्रिक से बना है? जवाब: यह ध्वज अहमदाबाद के कारीगरों ने तैयार किया है। इसे विशेष नायलॉन पैराशूट फैब्रिक से बनाया गया है, जो काफी मजबूत और टिकाऊ होता है। पैराशूट फैब्रिक धूप, बारिश और तेज हवाओं में भी खराब नहीं होता। इसीलिए इसे मंदिर के ऊंचे शिखर पर लंबे समय तक टिके रहने के लिए चुना गया।

ध्वज पर डबल-कोटेड सिंथेटिक लेयर लगाई गई है। इससे नमी, गर्मी और तापमान में बदलाव का असर कम हो जाता है और ध्वज ज्यादा समय तक सुरक्षित रहता है। ढाई किलो वजन के ध्वज की आयु 3 साल होगी। ट्रायल में ध्वज की रस्सी टूटने के बाद उसे भी बदला गया है। नई रस्सी कानपुर से मंगाई गई है, जो स्टेनलेस स्टील कोर और सिंथेटिक नायलॉन फाइबर से बनी है। ध्वज की ऊंचाई ज्यादा होने से इसके ध्वजारोहण के लिए सेना और रक्षा मंत्रालय के विशेषज्ञों की मदद ली जा रही।

परकोटे और उसके मंदिरों का निर्माण पूरा होने के बाद उसकी भव्यता देखते ही बन रही।

परकोटे और उसके मंदिरों का निर्माण पूरा होने के बाद उसकी भव्यता देखते ही बन रही।

एक्सपर्ट के मुताबिक, जो फैब्रिक इस ध्वज के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, वो 200 किमी/घंटा की हवा झेल सकता है। हालांकि यह झेलने की क्षमता डिजाइन, पोलिंग, और स्ट्रक्चर पर भी निर्भर करता है। दरअसल, पैराशूट नायलॉन से तैयार किया जाता है। जिससे तेज हवा में भी टूटने या फटने से बच सके।

पैराशूट डिजाइन में उपयोग किए जाने वाले पैनल और कपड़े उसी तरह के तनाव झेलने के लिए बने होते हैं, जो झोंके और एयर लोड से आते हैं। राम मंदिर के शिखर पर लगने वाला ध्वज भी उसी को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।

सवाल: ध्वज पर सूर्य का चिह्न क्यों बनाया गया? जवाब: राम मंदिर के लिए खास केसरिया ध्वज पर भगवान सूर्य, ‘ॐ’ और कोविदार वृक्ष बने हैं। ये सूर्यवंश के प्रतीक माने जाते हैं। ध्वज फहरते ही मठ-मंदिरों और सनातनी घरों में घंटे-घड़ियाल की आवाज गूंजेगी।

राम मंदिर के 161 फीट ऊंचे शिखर पर 42 फीट का एक बड़ा स्तंभ लगाया गया है। इसी पर 22 फीट लंबा और 11 फीट चौड़ा केसरिया ध्वज लगाया जाएगा। यह करीब 4 किलोमीटर दूर से भी दिखाई देगा।

यह राम मंदिर के ध्वज का डिजाइन है। 25 नवंबर को ऐसा ही ध्वज फहरेगा।

यह राम मंदिर के ध्वज का डिजाइन है। 25 नवंबर को ऐसा ही ध्वज फहरेगा।

सवाल: सूर्य के मध्य ‘ॐ’ का धार्मिक अर्थ क्या है? जवाब: बीएचयू के एस्ट्रोलॉजर प्रो. विनय कुमार पांडे बताते हैं कि ‘ॐ’ को सम्पूर्ण मंत्र माना जाता है। ब्रह्मांड का सर्वशक्तिमान और सबसे पवित्र मंत्र माना जाता है। वैज्ञानिकों ने भी यह स्वीकार किया कि सूर्य से निकलने वाली ध्वनि ‘ॐ’ की तरह ही ‘ॐ’ के अनुरुप होती है। जब इसे सूर्य के साथ रखा जाता है, तो इसका अर्थ होता है- सृष्टि, ऊर्जा और दिव्यता का एक साथ मिलना।

सूर्य जीवन और प्रकाश का प्रतीक है, और ‘ॐ’ आत्मा और परमात्मा का। दोनों मिलकर जीवन, शक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का संदेश देते हैं।

सवाल: कोविदार वृक्ष का रामायण और अयोध्या से क्या संबंध है? जवाब: हरिवंश पुराण के अनुसार, कोविदार वृक्ष कभी अयोध्या के राजध्वज का हिस्सा हुआ करता था। इसी वजह से इसे भव्य राम मंदिर के ध्वज पर भी स्थान दिया गया। वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख मिलता है।

रामायण के एक प्रसंग में जब भरत श्रीराम को अयोध्या वापस लाने के लिए चित्रकूट पहुंचे थे, तब उनके रथ पर कोविदार वृक्ष अंकित ध्वज लगा था। लक्ष्मणजी ने दूर से ही इस ध्वज को देखकर पहचान लिया था कि यह अयोध्या की सेना है।

इसी आधार पर कोविदार को कभी अयोध्या का “राज वृक्ष” माना जाता था। ठीक वैसे ही जैसे आज भारत का राष्ट्रीय वृक्ष बरगद है। इसलिए राम राज्य के प्रतीक ध्वज में कोविदार को फिर से सम्मानपूर्वक शामिल किया गया है।

सवाल: कोविदार वृक्ष पर क्या कहता है साइंस? जवाब: यूरोपीय सोशल नेटवर्किंग साइट रिसर्च गेट पर भी कोविदार वृक्ष से जुड़ा रिसर्च पब्लिश है। उसमें ‘प्लांट एंड एनिमल डायवर्सिटी इन वाल्मीकि रामायण’ नाम के रिसर्च में बताया गया है कि राम के वनवास काल में कई तरह के पेड़ों का उल्लेख मिलता है। इनमें कोविदार भी शामिल है।

कोविदार वास्तव में कचनार की ही एक प्रजाति है। यह उस समय अयोध्या और आसपास के क्षेत्रों में खूब पाई जाती थी। इसकी सुंदरता और औषधीय उपयोग के कारण इसे राजवृक्ष का दर्जा भी मिला।

यह तस्वीर कोविदार वृक्ष की है। राममंदिर के ध्वज में यह पेड़ भी अंकित होगा।

यह तस्वीर कोविदार वृक्ष की है। राममंदिर के ध्वज में यह पेड़ भी अंकित होगा।

सवाल: क्या ऑटोमैटिक फ्लैग होस्टिंग से ध्वज बदलेगा? जवाब: ध्वज फहराने के लिए ऑटोमैटिक फ्लैग होस्टिंग सिस्‍टम लगाया गया है। ध्वज बदलने के लिए भी इसी सिस्टम की मदद ली जाएगी। हालांकि, ट्रस्ट ने अभी ये नहीं क्लियर किया कि कितने-कितने अंतराल के बाद ये ध्वज बदला जाएगा। हवा के बहाव के साथ ध्वज 360 डिग्री पर घूम सकेगा।

राम मंदिर में पहली बार राम-सीता विवाह उत्सव मनाया जा रहा है। इस दौरान 8 हजार लोगों के पहुंचने का अनुमान है। इनमें से ढाई हजार लोगों के रुकने के लिए तीर्थ पुरम में टेंट सिटी बसाई जा रही। 25 नवंबर को VIP मूवमेंट की वजह से आम लोग दर्शन नहीं कर सकेंगे। ट्रस्ट के अनुसार, भक्त 26 नवंबर को ही दर्शन कर सकेंगे।

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