Thursday, January 15, 2026
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‘जवानी में हिंदू-मुस्लिम एकता के पैरोकार’ थरूर ने सावरकर पर क्या लिखा है, पढ़िए


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Shashi Tharoor On Veer Savarkar: कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने विनायक दामोदर सावरकर के नाम पर दिए जाने वाले पुरस्कार को ठुकरा दिया है. ऐसे में यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर सावरकर को लेकर थरूर की असली राय क्या है? शशि थरूर ने अपनी किताबों और लेखों में सावरकर के व्यक्तित्व के उन पहलुओं को उजागर किया है, जो आज की राजनीति में अक्सर चर्चा से गायब रहते हैं. एक जगह उन्होंने सावरकर के उस दौर का जिक्र किया है जब वे हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करते थे और 1857 की क्रांति को मुगलों के झंडे के नीचे लड़ी गई लड़ाई बताते थे. वहीं, उन्होंने सावरकर के ‘हिंदुत्व’ के सिद्धांत का भी गहरा विश्लेषण किया है, जो धर्म से ज्यादा राजनीति और भूगोल पर आधारित था. पढ़‍िए, शशि थरूर ने वीर सावरकर के बारे में क्या-क्या लिखा है. (All Photos : PTI)

हालिया विवाद तब शुरू हुआ जब ‘हाई रेंज रूरल डेवलपमेंट सोसाइटी (HRDS)-इंडिया’ ने शशि थरूर को ‘वीर सावरकर इंटरनेशनल इम्पैक्ट अवार्ड 2025’ देने की घोषणा की. जैसे ही यह खबर आई, कांग्रेस के भीतर ही हलचल मच गई. केरल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के. मुरलीधरन ने थरूर को सार्वजनिक रूप से नसीहत दे डाली. उन्होंने कहा, ‘सावरकर अंग्रेजों के सामने झुक गए थे, इसलिए उनके नाम का पुरस्कार लेना कांग्रेस का अपमान होगा.’ दबाव और विवाद के बीच थरूर ने स्थिति साफ कर दी. उन्होंने कहा, ‘पुरस्कार के स्वरूप या इसे देने वाली संस्था के बारे में स्पष्टीकरण के अभाव में, मैं यह पुरस्कार स्वीकार नहीं करूंगा और न ही उस कार्यक्रम में शामिल हूंगा.’ उन्होंने यह भी कहा कि आयोजकों ने उनकी सहमति के बिना ही उनके नाम का ऐलान कर दिया, जो गैर-जिम्मेदाराना है. हालांकि, आयोजक अजी कृष्णन का दावा है कि थरूर को पहले ही बता दिया गया था और शायद अब वे पार्टी के दबाव में पीछे हट रहे हैं. लेकिन यह घटनाक्रम तो सिर्फ सतह पर है. असली कहानी यह है कि एक इतिहासकार और लेखक के रूप में थरूर सावरकर को कैसे देखते हैं?

शशि थरूर ने 26 जून 2022 को लिखे अपने एक लेख में सावरकर के युवावस्था के विचारों का जिक्र किया था. यह वह दौर था जब सावरकर एक क्रांतिकारी थे और सेलुलर जेल की काल कोठरी में ‘हिंदुत्व’ की अवधारणा गढ़ने से काफी दूर थे. थरूर लिखते हैं कि अपनी जवानी के दिनों में विनायक दामोदर सावरकर हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे. सावरकर ने 1857 के विद्रोह को ‘भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ घोषित किया था. थरूर याद दिलाते हैं कि सावरकर ने इस बात पर जोर दिया था कि 1857 की लड़ाई में धर्म, क्षेत्र, जाति और भाषा की दीवारों को तोड़कर सभी भारतीय एकजुट हुए थे. और सबसे बड़ी बात यह थी कि यह पूरी लड़ाई ‘मुगल बादशाह (बहादुर शाह जफर) के झंडे के नीचे लड़ी गई थी.’ यह एक ऐतिहासिक विरोधाभास है जिसे थरूर रेखांकित करते हैं. आज की राजनीति में जहां मुगलों को विदेशी आक्रांता और दुश्मन के रूप में पेश किया जाता है, वहीं हिंदुत्व के पितामह माने जाने वाले सावरकर ने कभी उसी मुगल नेतृत्व को भारत की आजादी की पहली लड़ाई का केंद्र माना था.

अपनी बहुचर्चित किताब ‘वाय आई एम अ हिंदू’ (Why I Am A Hindu) में शशि थरूर ने सावरकर की विचारधारा का विस्तार से विश्लेषण किया है. थरूर बताते हैं कि सावरकर ने ही ‘हिंदुत्व’ शब्द को लोकप्रिय बनाया, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘हिंदूपन’ है. थरूर के अनुसार, सावरकर के लिए ‘हिंदुत्व’ केवल एक धर्म नहीं, बल्कि एक जातीय, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान थी. सावरकर ने 1923 में अपनी किताब ‘Essentials of Hindutva’ में तर्क दिया कि हिंदू वह है जो भारत को तीन रूपों में देखता है: 1- मातृभूमि (Matrbhumi): जहां उसका जन्म हुआ. 2- पितृभूमि (Pitrbhumi): जहां उसके पूर्वज रहे. 3- पुण्यभूमि (Punyabhumi): जहां उसके धर्म की उत्पत्ति हुई.

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थरूर विश्लेषण करते हैं कि सावरकर की इस परिभाषा के तहत सिख, बौद्ध और जैन तो ‘हिंदू’ की व्यापक परिभाषा में आ जाते हैं क्योंकि उनकी पुण्यभूमि भारत में ही है. लेकिन यहीं से विभाजन की रेखा खिंचती है. सावरकर के अनुसार, मुसलमान और ईसाई, भले ही वे भारत में पैदा हुए हों और इसे अपनी मातृभूमि मानते हों, लेकिन उनकी ‘पुण्यभूमि’ (मक्का या जेरूसलम) भारत के बाहर है. इसलिए, सावरकर की नजर में वे पूर्ण रूप से राष्ट्र के वफादार नहीं हो सकते. थरूर लिखते हैं, ‘सावरकर ने तर्क दिया कि हिंदुत्व और हिंदू धर्म के बीच अंतर न कर पाने के कारण ही बहुत गलतफहमी पैदा हुई है. उनके लिए हिंदू धर्म, हिंदुत्व का केवल एक अंश था. हिंदुत्व एक राजनीतिक और सांस्कृतिक विचार था, न कि केवल पूजा-पाठ की पद्धति.’

थरूर बताते हैं कि सावरकर भारत को एक ‘भौगोलिक अभिव्यक्ति’ मानने वाले ब्रिटिश नजरिए (जैसे चर्चिल का कथन) को खारिज करते थे. सावरकर के लिए भारत प्राचीन काल से ही एक राष्ट्र था. थरूर लिखते हैं कि सावरकर का सपना एक ‘हिंदू राष्ट्र’ का था जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैला हो, सिंधु नदी से लेकर समुद्र तक. थरूर की लेखनी यह साफ करती है कि सावरकर ‘जाति’ (Race) की अवधारणा में विश्वास करते थे. सावरकर का मानना था कि हिंदुओं की नसों में एक ही खून दौड़ता है. थरूर लिखते हैं, ‘सावरकर का हिंदुत्व का विचार इतना व्यापक था कि वह हर उस चीज को कवर करता था जिसे आज हम ‘इंडिक’ (भारतीय) कहते हैं. लेकिन परिभाषा के अनुसार, इसमें उन लोगों को बाहर कर दिया गया जिनकी आस्था की जड़ें भारत के बाहर थीं.’

थरूर अपनी किताब में 1939 की एक घटना का भी जिक्र करते हैं, जो सावरकर की विचारधारा के उग्र रूप को दिखाती है. सावरकर ने यूरोपीय मूल की हिंदू प्रचारक और नाजी समर्थक सावित्री देवी की किताब ‘A Warning to the Hindus’ की प्रस्तावना लिखी थी. सावित्री देवी का मानना था कि हिंदू धर्म ही भारत का राष्ट्रीय धर्म है. थरूर बताते हैं कि सावरकर और सावित्री देवी, दोनों ही इस बात पर सहमत थे कि हिंदुओं को अब ‘मोक्ष’ या अध्यात्म की नहीं, बल्कि ‘राजनीतिक शक्ति’ की जरूरत है. सावरकर का मानना था कि सदियों की गुलामी का कारण यही था कि हिंदू अध्यात्म में खोए रहे और शक्ति अर्जित नहीं की. थरूर लिखते हैं, ‘सावरकर अद्वैत वेदांत के गूढ़ तत्वमीमांसा में रुचि नहीं रखते थे; उन्हें और सावित्री देवी को दिलचस्पी थी तो बस राजनीतिक शक्ति में, यहीं और अभी.’

अपने 2022 के लेख में थरूर ने इतिहास के राजनीतिक इस्तेमाल पर भी चिंता जताई थी. उन्होंने इतिहासकार एरिक हॉब्सबॉम का हवाला देते हुए लिखा था कि राष्ट्रवाद के लिए इतिहास वैसा ही है जैसा अफीमची के लिए हेरोइन. अतीत का इस्तेमाल अक्सर वर्तमान के घावों को कुरेदने के लिए किया जाता है. थरूर ने यूगोस्लाविया के गृहयुद्ध का उदाहरण देते हुए बताया था कि कैसे वहां के लोग 1389 और 1448 की लड़ाइयों का जिक्र ऐसे करते थे जैसे वे कल ही हुई हों. ठीक वैसे ही, भारत में भी अतीत की कड़वाहटों – आक्रमणों, मंदिर विध्वंस और धर्म परिवर्तन – को वर्तमान राजनीति के केंद्र में लाया जा रहा है. थरूर का कहना है कि यह ‘नकारात्मक ऐतिहासिक स्मृति’ राष्ट्र को जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम करती है.

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