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सुनील दत्त जब तक जिंदा रहे, तब तक गरीबों के मसीहा बनकर रहे. उन्होंने मुंबई के बांद्रा के गरीब नगर को मिटने नहीं दिया, मगर अब उस पर बुलडोजर चला, तो पुराने बाशिंदों को सुनील दत्त जैसी शख्सियत की कमी महसूस हुई. उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में गरीबों के हक और झुग्गियों की सुरक्षा के लिए कई बार कानूनी और सामाजिक लड़ाइयां लड़ी थीं. ताजा कार्रवाई में बेघर हो रहे लोगों का मानना है कि यदि सुनील दत्त आज जीवित होते, तो वे ढाल बनकर खड़े रहते. हालांकि, उन पर अतिक्रमण को बढ़ावा देने के आरोप भी लगे, जिससे मिडिल क्लास उनसे नाराज हुए. आज जब बुलडोजर चल रहे हैं, तो लोग खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं.
नई दिल्ली: मुंबई के बांद्रा में मौजूद झुग्गी बस्ती पर बुलडोजर कार्रवाई ने सुनील दत्त की यादें ताजा कर दी हैं. बांद्रा ईस्ट के गरीब नगर में रेलवे की जमीन पर बनी झुग्गियों को ढहाया गया, तो लोगों को किसी मौजूदा नेता की नहीं, बल्कि सुनील दत्त की याद आई. दत्त साहब को गुजरे लगभग दो दशक हो चुके हैं, लेकिन बांद्रा के गरीबों के लिए वह आज भी एक मसीहा के रूप में जिंदा हैं. उनकी कमी आज उन लोगों को सबसे ज्यादा खल रही है, जो मुंबई में प्रशासन की कार्रवाई से बेघर हो रहे हैं. (फोटो साभार: Instagram@bombaybasanti)

सुनील दत्त की इमेज केवल एक फिल्मी सितारे की नहीं थी, बल्कि वह एक ऐसे राजनेता थे जो मुंबई के सबसे कमजोर तबके के लिए ढाल बनकर खड़े रहते थे. हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘न्यूज19 इंग्लिश’ की रिपोर्ट के अनुसार, सुनील दत्त ने साल 1984 में राजनीति में कदम रखा था, जिसके बाद वे पांच बार सांसद बने. उन्होंने हमेशा झुग्गीवासियों के हक की लड़ाई लड़ी, भले ही इसके लिए उन्हें मिडिल क्लास और टैक्स भरने वाले नागरिकों की नाराजगी झेलनी पड़ी. उनके समय में झुग्गी सुरक्षा की कट-ऑफ डेट बढ़वाने का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है, जिससे लाखों लोगों को छत की कानूनी गारंटी मिली थी.
(फोटो साभार: Instagram@vintage.bollywood.x)

सुनील दत्त की संवेदनशीलता की सबसे बड़ी मिसाल ‘नरगिस दत्त नगर’ है. उन्होंने साल 1981 में अपनी पत्नी के निधन के बाद बांद्रा रिक्लेमेशन के पास एक झुग्गी बस्ती का नाम उनके नाम पर रख दिया था. शुरू में यह एक छोटा सा इलाका था, लेकिन धीरे-धीरे यह मुंबई के सबसे बड़े और संवेदनशील वोट बैंक में तब्दील हो गया. हालांकि, यह इलाका विवादों से भी घिरा रहा. आलोचकों का कहना था कि भावनाओं के नाम पर यहां अवैध अतिक्रमण को बढ़ावा मिला, जिससे शहर की सरकारी जमीनें कम होती गईं. (फोटो साभार: Instagram@vintage.bollywood.x)
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सुनील दत्त को राजनीति में अपनी इसी ‘गरीबों के मसीहा’ इमेज के कारण नुकसान भी उठाना पड़ा. साल 2004 के चुनाव में उनकी जीत का अंतर काफी घट गया था. बांद्रा और खार के जागरूक नागरिकों का मानना था कि दत्त साहब ने सिर्फ झुग्गीवासियों पर ध्यान दिया और टैक्स भरने वाले लोगों की समस्याओं जैसे फुटपाथ पर कब्जा और ट्रैफिक को नजरअंदाज किया. लोकल रेजिडेंट्स एसोसिएशनों का आरोप था कि उनके कार्यकर्ताओं की मिलीभगत से अवैध निर्माण बढ़ रहे थे, जिसने बांद्रा की सूरत बिगाड़ दी थी.
(फोटो साभार: IMDb)

इस हफ्ते बांद्रा ईस्ट रेलवे स्टेशन के पास ‘गरीब नगर’ में वेस्टर्न रेलवे ने कोर्ट के आदेश पर बड़ी तोड़फोड़ शुरू की है. यह जमीन सांताक्रूज-मुंबई सेंट्रल कॉरिडोर की नई रेलवे लाइन बिछाने के लिए बेहद जरूरी है. इस प्रोजेक्ट से मुंबई में 50 नई ट्रेनें शुरू होने की उम्मीद है. प्रशासन का कहना है कि वे केवल उन्हीं लोगों को हटा रहे हैं जो सर्वे में ‘अवैध’ पाए गए हैं, जबकि योग्य परिवारों को घर दिए जा रहे हैं. (फोटो साभार: Instagram@golden_bollywood_days)

गरीब नगर के निवासियों में इस कार्रवाई को लेकर भारी गुस्सा है. सालों से यहां रह रहे लोगों का कहना है कि जब चुनाव आते हैं, तो नेता वोट मांगने के लिए इन्हीं झुग्गियों के चक्कर काटते हैं. उस समय उनके आधार कार्ड और वोटर आईडी उन्हें ‘वैध’ नागरिक बना देते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही वे अचानक ‘अवैध’ हो जाते हैं. निवासियों का आरोप है कि उन्हें बिना किसी सही सर्वे के निकाला जा रहा है और उनके पास अब सिर छिपाने की जगह नहीं बची है. (फोटो साभार: Instagram@golden_bollywood_days)

सुनील दत्त के दौर में हालात अलग थे. लोग याद करते हैं कि कैसे उन्होंने सोनिया गांधी के जरिए तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख तक को बुलडोजर रुकवाने के लिए मना लिया था. जब कभी एयरपोर्ट के पास की झुग्गियों पर संकट आता, तो दत्त साहब खुद सड़कों पर मार्च निकालते थे. आज के निवासियों को मलाल है कि मौजूदा विधायक और नेता सिर्फ सोशल मीडिया पर दिखते हैं, लेकिन जब सच में घर टूट रहे हैं, तो कोई भी उनकी ढाल बनने को तैयार नहीं है. (फोटो साभार: IMDb)

सुनील दत्त की विरासत आज भी बांद्रा में दो हिस्सों में बंटी है. एक वर्ग उन्हें अतिक्रमण को बढ़ावा देने वाला मानता है, तो दूसरा उन्हें अपना एकमात्र संरक्षक. लेकिन हकीकत यही है कि उनके निधन के 20 साल बाद भी बांद्रा की सियासत और वहां के भूगोल में उनका असर साफ दिखता है. गरीब नगर में मलबे के बीच खड़ा हर शख्स आज बस यही कह रहा है कि अगर ‘दत्त साहब’ होते, तो शायद बुलडोजर की हिम्मत नहीं होती. (फोटो साभार: Instagram@kishore.pandey.5)

