श्रावण महीने में पाली के प्राचीन लाखोटिया महादेव मंदिर और उससे जुड़ी कहानी चर्चा में है। मान्यता है कि करीब 976 साल पहले पाली में पेयजल संकट के दौरान पानी दरवाजा जूना मठ के संत चंदनपुरी ने लाखोटिया तालाब खुदवाया और उसकी टेकरी पर शिवलिंग स्थापित किया था। आज यही शिवलिंग लाखोटिया महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर और तालाब से जुड़ी कई दंतकथाएं आज भी लोगों के बीच प्रचलित हैं। पेयजल संकट के समय खुदवाया तालाब दंतकथाओं के अनुसार करीब 976 साल पहले पल्लीपुर यानी वर्तमान पाली में पेयजल संकट था। उस समय पानी दरवाजा स्थित जूना मठ के संत चंदनपुरी ने तालाब खुदवाने का निर्णय लिया। तालाब की खुदाई के बाद उसकी टेकरी पर शिवलिंग की स्थापना की गई। मान्यता है कि तालाब की खुदाई में एक लाख ऊंटों का इस्तेमाल किया गया था। इसी वजह से इसका नाम लाखोटिया तालाब और टेकरी पर स्थापित शिवलिंग का नाम लाखोटिया महादेव पड़ा। तालाब के किनारे स्थित जूना मठ में बाद में संत चंदनपुरी ने समाधि ली। समय के साथ लाखोटिया तालाब और मंदिर का विस्तार होता गया। खुदाई में सोने के सिक्के मिलने की मान्यता लाखोटिया तालाब से जुड़ी एक अन्य दंतकथा में कहा जाता है कि खुदाई के दौरान सोने के सिक्के निकलते थे। संत इन सिक्कों को खुदाई करने वाले मजदूरों को मेहनताना के रूप में दे देते थे। यह भी मान्यता है कि संत चंदनपुरी कमल के आकार के एक पत्थर पर बैठकर जूना मठ से लाखोटिया तालाब होते हुए टेकरी पर स्थित महादेव मंदिर तक जाते थे और शिवलिंग पर जल चढ़ाते थे। जूना मठ में आज भी कमल के आकार का यह पत्थर रखा हुआ है। इसके अलावा यहां संत से जुड़ी चिलम, छड़ी, बड़े शंख, धूणी, भाला और लकड़ी का डमरू भी मौजूद हैं। बहन का चेहरा देखने के बाद जीवित समाधि लेने की कथा संत चंदनपुरी से जुड़ी एक अन्य कथा उनकी बहन अन्नपूर्णा से जुड़ी है। मान्यता है कि संत महिलाओं का चेहरा नहीं देखते थे और जूना मठ में महिलाओं का प्रवेश भी नहीं था। एक बार उनकी बहन अन्नपूर्णा उनसे मिलने मठ पहुंचीं। संत ने उनका चेहरा देख लिया। इसके बाद उन्होंने जीवित समाधि लेने का निर्णय लिया। जब अन्नपूर्णा को इसकी जानकारी हुई तो वह भी जूना मठ पहुंचीं। दंतकथा के अनुसार दोनों भाई-बहन ने यहीं जीवित समाधि ली। जूना मठ में आज भी दोनों की समाधि मौजूद है। जूना मठ में आज भी मौजूद है प्राचीन गुफा जूना मठ के संत भोलापुरी के अनुसार मठ में आज भी एक प्राचीन गुफा मौजूद है। मान्यता है कि पाली के आसपास स्थित कुछ अन्य धार्मिक स्थलों में भी ऐसी गुफाएं हैं और प्राचीन समय में संत इन रास्तों से एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते थे। बताया जाता है कि करणी माता मंदिर, पूनागर भाकरी माता मंदिर और गाजण माता मंदिर में भी ऐसी गुफाओं के होने की मान्यता है। वर्तमान में इन गुफाओं को बंद कर दिया गया है। जूना मठ की गुफा में भी लोग पहले कई फीट अंदर तक जा चुके हैं। समय के साथ देखरेख नहीं होने के कारण अब इसका रास्ता बंद है। संत की निशानियां आज भी सुरक्षित पानी दरवाजा स्थित जूना मठ में संत चंदनपुरी से जुड़ी कई वस्तुएं आज भी रखी हैं। इनमें उनकी चिलम, छड़ी, शंख, धूणी, भाला और डमरू शामिल हैं। मठ परिसर में संत चंदनपुरी और उनकी बहन अन्नपूर्णा की समाधियां भी मौजूद हैं। वहीं कमल के आकार का वह पत्थर भी रखा है, जिसके बारे में मान्यता है कि संत इसी पर बैठकर लाखोटिया तालाब से होते हुए टेकरी पर स्थित शिवलिंग के जलाभिषेक के लिए जाते थे। लाखोटिया महादेव आज भी आस्था का केंद्र लाखोटिया तालाब और महादेव मंदिर पाली शहर की पहचान से जुड़े प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हैं। संत चंदनपुरी से जुड़ी इन कथाओं और जूना मठ में मौजूद पुरानी निशानियां इस पूरे क्षेत्र के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती हैं।
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