Wednesday, August 26, 2026
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68 साल पुराने श्रीराम मंदिर विवाद पर फैसला: इंदौर हाईकोर्ट ने भगवान श्रीराम को माना संपत्ति का मालिक, राजस्व विभाग संभालेगा प्रबंधन; रतनदास रहेंगे पुजारी – Indore News




मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने उज्जैन जिले के खाचरौद स्थित प्राचीन श्रीराम मंदिर से जुड़े करीब 68 साल पुराने विवाद पर मंगलवार को फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति विनय सराफ ने ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त करते हुए अपील आंशिक रूप से मंजूर की। अदालत ने मंदिर और उससे जुड़ी चल-अचल संपत्तियों का मालिक स्वयं भगवान श्रीराम के देवता को माना है। वहीं मंदिर का प्रबंधन राज्य के राजस्व विभाग के अधीन रहने और औकाफ विभाग को पुजारी नियुक्त करने का अधिकार स्वीकार किया है। 1954 में शुरू हुआ विवाद, 1968 में हाईकोर्ट पहुंचा मामले की शुरुआत 1954 में हुई, जब रतनदास ने खाचरौद के श्रीराम मंदिर के प्रबंधन और पूजा-अर्चना से जुड़े अधिकारों को लेकर सिविल वाद दायर किया था। ट्रायल कोर्ट ने 1968 में वाद खारिज कर दिया। इसके बाद 3 अक्टूबर 1968 को प्रथम अपील क्रमांक 59/1968 हाईकोर्ट में दाखिल हुई, जो 25 अगस्त 2026 तक लंबित रही। 1930 में औकाफ विभाग ने संभाला था प्रबंधन रिकॉर्ड के मुताबिक मंदिर के प्रबंधन को लेकर विवाद बढ़ने पर महंत मुरलीदास ने 1930 में औकाफ विभाग से मंदिर और उसकी संपत्तियों को संरक्षण में लेने का अनुरोध किया था। 15 अक्टूबर 1930 को औकाफ विभाग ने मंदिर का प्रबंधन अपने अधीन ले लिया और मुरलीदास को पुजारी नियुक्त किया। उनकी मृत्यु के बाद रतनदास ने उत्तराधिकारी के रूप में अपना दावा किया। रामानंद संप्रदाय के साधुओं द्वारा भेख समारोह के जरिए उन्हें महंत की गद्दी के लिए नामित किए जाने की बात भी सामने आई। मंदिर प्राचीन, संपत्ति के मालिक देवता हाईकोर्ट ने मंदिर को प्राचीन धार्मिक स्थल माना। यहां श्रीराम, जानकीजी, लक्ष्मणजी, हनुमानजी, लक्ष्मीनारायणजी और गोपालजी की प्रतिमाएं विराजित हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि मंदिर और उससे जुड़ी चल-अचल संपत्तियों के स्वामी देवता स्वयं हैं। फैसले के अनुसार श्रीराम मंदिर, राममोहल्ला, खाचरौद का प्रबंधन राज्य के राजस्व विभाग के अधीन रहेगा, जबकि औकाफ विभाग को पुजारी नियुक्त करने का अधिकार प्राप्त था। रतनदास को पुजारी के रूप में मान्यता अदालत ने रतनदास के उस दावे को स्वीकार किया कि वह मंदिर के पुजारी रहे हैं। मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों से उनकी नियुक्ति और मंदिर का प्रभार सौंपे जाने की पुष्टि हुई। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की उस राय को सही नहीं माना, जिसमें रतनदास का पुजारी के रूप में दावा पर्याप्त रूप से साबित नहीं होना बताया गया था। हालांकि महेश्वरी समाज के सदस्यों को अदालत ने मंदिर का श्रद्धालु माना, लेकिन उन्हें मंदिर में हस्तक्षेप से रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा जारी करने की मांग स्वीकार नहीं की। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फिर हुई सुनवाई इस मामले में हाईकोर्ट की एकलपीठ ने 10 जुलाई 1993 को रतनदास के पक्ष में फैसला सुनाया था। इसके खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी 2020 को 1993 का हाईकोर्ट फैसला निरस्त कर सभी मुद्दों पर नए सिरे से निर्णय के लिए मामला वापस भेज दिया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने मंदिर की स्थापना, संपत्ति के स्वामित्व, रतनदास की नियुक्ति, भेख समारोह, औकाफ विभाग की भूमिका और महेश्वरी समाज के अधिकारों समेत सभी प्रमुख बिंदुओं पर दोबारा सुनवाई की और अब फैसला सुनाया।



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