नई दिल्ली12 मिनट पहलेलेखक: अनिरुद्ध शर्मा
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चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाले संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के को-फाउंडर और चुनाव सुधारों के प्रबल समर्थक प्रो. जगदीप एस छोकर का शुक्रवार तड़के दिल्ली में हार्ट अटैक से निधन हो गया। वे 81 साल के थे।
आईआईएम अहमदाबाद में प्रोफेसर रहे छोकर ने 1999 में एडीआर की स्थापना की और इसके जरिए चुनावी पारदर्शिता के लिए कई कानूनी लड़ाइयां लड़ीं। उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि का खुलासा व इलेक्टोरल बांड योजना रद्द कराने जैसे सुधार उनकी कोशिशों के चलते ही संभव हो सके।
उनकी इस प्रेरक यात्रा के बारे में बता रहे हैं एडीआर के प्रमुख रिटायर्ड मेजर जनरल अनिल वर्मा…
- ‘बीते दो दशक में प्रो. छोकर की अगुवाई में प्रत्याशियों का ब्योरा सामने लाना, दोषी ठहराए गए सांसदों व विधायकों की अयोग्यता, राजनीतिक दलों के आयकर रिटर्न सार्वजनिक कराना, पार्टियों को आरटीआई के दायरे में लाना, नोटा बटन और इलेक्टोरल बॉन्ड्स योजना खत्म करना… ऐसे सुधार थे, जो देश के चुनावी इतिहास में मील का पत्थर साबित हुए।
- यह बदलाव 1999 में शुरू हुआ…आईआईएम के कुछ प्रोफेसर इस बात से बेहद खफा थे कि राजनीति में आपराधिक तत्व बढ़ते जा रहे हैं। उनमें से एक थे प्रो. जगदीप छोकर। उनका मानना था कि कंपनियों की बैलेंस शीट की तरह ही नेताओं की कैरेक्टर शीट भी उजागर होनी चाहिए।
- इसी सोच पर प्रो. त्रिलोचन शास्त्री के सुझाव पर 11 प्रोफेसर व छात्रों ने मिलकर एडीआर की नींव रखी। इन संस्थापकों में सबसे सीनियर थे प्रो. जगदीप छोकर। उनका मानना था कि देश का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब मतदाता को पूरी जानकारी होगी कि उसके सामने खड़ा उम्मीदवार कौन है।
- छोकर अंतिम समय तक भारतीय राजनीति को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के मिशन में जुटे रहे। एडीआर ने दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की जिसमें यह दलील दी गई कि मतदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि उसका प्रत्याशी कौन है, उस पर आपराधिक मामला तो नहीं है, उसकी संपत्ति क्या है, देनदारियां क्या हैं, आय कैसे होती है, कितना पढ़ा लिखा है। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और ऐतिहासिक फैसला आया जिससे हर प्रत्याशी को पर्चे के साथ एफिडेविट देना अनिवार्य हुआ जिसमें उसे अपना ब्योरा देना होता है।
इन सुधारों के पीछे प्रो. छोकर थे, कभी पता नहीं चलने दिया- योगेंद्र यादव
‘जब प्रो. छोकर सहित 11 प्रोफेसर ने मिलकर एडीआर बनाया तो मुझे लगा कि प्रोफेसर लोग देश का लोकतंत्र क्या बदलेंगे और दो-चार कोर्ट केस से क्या फर्क पड़ जाएगा, पर मैं गलत साबित हुआ। एडीआर के संस्थापक और खासकर प्रो. छोकर जिस शिद्दत के साथ कोर्ट में केस लेकर गए, नतीजतन उम्मीदवारों को जानकारी सार्वजनिक करने का आदेश आया। इतना ही नहीं, जब एफिडेविट आने लगे, उसे रातोंरात जनता तक पहुंचाने का काम भी एडीआर ने किया।

