नई दिल्ली. भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने अभिनय को सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समाज का आईना बना दिया. बलराज साहनी उन्हीं चुनिंदा कलाकारों में शामिल थे. जब देश आजादी के बाद अपनी नई पहचान गढ़ रहा था, उसी दौर में हिंदी सिनेमा को एक ऐसा अभिनेता मिला, जिसने आम आदमी के संघर्ष, उसकी पीड़ा और सामाजिक असमानता को पर्दे पर उतारा. उनके किरदारों में इतनी सच्चाई थी कि दर्शक सिर्फ फिल्म नहीं देखते थे, बल्कि उन किरदारों को जीने लगते थे.
1 मई 2026 को बलराज साहनी की बर्थ एनिवर्सरी है. बलराज साहनी सिर्फ अभिनेता नहीं थे, बल्कि विचारशील इंसान भी थे. उनके लिए सिनेमा समाज को समझने और बदलने का माध्यम था. यही वजह थी कि उन्होंने अपने करियर में ऐसी फिल्मों को चुना, जो मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक यथार्थ को भी सामने लाती थीं.
पैरलल सिनेमा का बने दूसरा नाम
‘धरती के लाल’, ‘दो बीघा जमीन’, ‘काबुलीवाला’ और ‘गर्म हवा’ जैसी फिल्मों में उन्होंने समाज के दबे-कुचले और संवेदनशील चेहरों को जीवंत किया. वहीं ‘वक़्त’, ‘अनुराधा’, ‘संघर्ष’ और ‘एक फूल दो माली’ जैसी फिल्मों से उन्होंने यह भी साबित किया कि वह कमर्शियल सिनेमा में भी उतने ही प्रभावशाली हैं.
बलराज साहनी ने कायम किया इतिहास
उनकी सबसे यादगार फिल्मों में से एक रही ‘दो बीघा जमीन’, जिसने भारतीय सिनेमा में नई मिसाल कायम की. इस फिल्म में बलराज साहनी ने शंभू महतो का किरदार निभाया था. एक ऐसा गरीब किसान, जो परिस्थितियों से परेशान होकर रिक्शा चलाने पर मजबूर हो जाता है. लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि इस भूमिका तक पहुंचना उनके लिए आसान नहीं था.
बिमल रॉय ने कर दिया था रिजेक्ट
निर्देशक बिमल रॉय इस किरदार के लिए ऐसे अभिनेता की तलाश में थे, जो गरीबी, संघर्ष और बेबसी को पूरी सच्चाई से जी सके. शुरुआत में इस भूमिका के लिए कई बड़े नामों पर विचार किया गया, लेकिन बात नहीं बनी. इसी दौरान बिमल रॉय ने फिल्म ‘हम लोग’ में बलराज साहनी के अभिनय को देखा और उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें मिलने बुलाया.
सूट-बूट की वजह से फिसली फिल्म
जब बलराज साहनी निर्देशक से मिलने पहुंचे, तो वह बेहद सलीकेदार काले सूट-बूट में थे. उनका व्यक्तित्व इतना आकर्षक और प्रभावशाली था कि बिमल रॉय पहली नजर में असमंजस में पड़ गए. उन्हें लगा कि यह शख्स एक गरीब, टूटा हुआ किसान कैसे बन पाएगा? उनका मानना था कि बलराज की शख्सियत इस किरदार से मेल नहीं खाती. लेकिन बलराज साहनी ने हार नहीं मानी. उन्होंने बिमल रॉय से उनकी पिछली फिल्म ‘धरती के लाल’ देखने का आग्रह किया, जिसमें उन्होंने एक संघर्षशील और दुखी युवक की भूमिका निभाई थी.
फिल्म देखने के बाद बिमल रॉय की राय पूरी तरह बदल गई. उन्हें एहसास हुआ कि असली अभिनेता वही होता है, जो अपने व्यक्तित्व से नहीं, अपने अभिनय से किरदार में ढलता है. इसके बाद बलराज साहनी को ‘दो बीघा जमीन’ मिली और उन्होंने अपने अद्भुत समर्पण से इस किरदार को अमर बना दिया.

