Sunday, August 30, 2026
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आगरा में पेठा के साथ अब इस खास मिठाई की बढ़ी डिमांड, दुनियाभर में मचा रखी धूम


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आगरा में पेठा के साथ अब इस खास मिठाई की बढ़ी डिमांड, दुनियाभर में मचा रखी धूम

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आगरा में पेठा ही नहीं, अब घेवर भी त्योहारों की खास पहचान बन चुका है. सावन, रक्षाबंधन और तीज जैसे त्योहारों पर इसकी मांग बढ़ जाती है. यह गोल, जालीदार और मीठा घेवर आगरा के लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है. आइए जानते हैं कि आखिर घेवर तैयार कैसे होता है.

ताज नगरी आगरा अपनी ऐतिहासिक इमारतों के साथ-साथ खानपान के लिए भी प्रसिद्ध है. आगरा की सबसे बड़ी मिठाई पहचान पेठा है, जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने भी जिले के पारंपरिक उत्पाद के रूप में विशेष पहचान दी है. वहीं सावन, रक्षाबंधन और तीज जैसे त्योहारों के दौरान घेवर की मांग बाजारों में काफी बढ़ जाती है और यह स्वाद सितंबर व अक्टूबर तक बाजारों में रहता है. गोल आकार, जालीदार बनावट और मीठे स्वाद वाला घेवर आगरा के लोगों के बीच भी बेहद लोकप्रिय है.

घेवर को मुख्य रूप से राजस्थान की पारंपरिक और प्रसिद्ध मिठाई माना जाता है. माना जाता है कि शुष्क और गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में उपलब्ध सामग्री से इस खास मिठाई को विकसित किया गया. समय के साथ घेवर राजस्थान से निकलकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश और विशेष रूप से आगरा जैसे शहरों तक पहुंचा. आज यह सिर्फ एक क्षेत्रीय मिठाई नहीं, बल्कि उत्तर भारत के प्रमुख त्योहारों की खास पहचान बन चुका है.

घेवर बनाने की शुरुआत मैदा, शुद्ध घी और बर्फ जैसे ठंडे पानी से की जाती है. सबसे पहले घी को अच्छी तरह फेंटकर उसमें धीरे-धीरे मैदा और ठंडा पानी मिलाया जाता है. इसका घोल न ज्यादा गाढ़ा और न बहुत पतला होना चाहिए. घेवर की जालीदार बनावट पूरी तरह घोल की सही कंसिस्टेंसी और गर्म घी या तेल में डालने की तकनीक पर निर्भर करती है.

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घेवर बनाने के लिए गहरे और गोल बर्तन में पर्याप्त मात्रा में घी या तेल गर्म किया जाता है. इसके बाद पतले घोल को ऊंचाई से धीरे-धीरे बीच में डाला जाता है. गर्म तेल में गिरते ही घोल फैलता है और उसमें छोटे-छोटे छेद बनने लगते हैं. यही प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है, जिससे घेवर की प्रसिद्ध जालीदार संरचना तैयार होती है. इसके बीच में खाली जगह छोड़ना भी जरूरी होता है.

घेवर बनने के बाद उसे चीनी की तैयार चाशनी में डुबोया जाता है या ऊपर से चाशनी डाली जाती है. इसके बाद इसे कुछ समय तक रखा जाता है, ताकि मिठास अच्छी तरह अंदर तक पहुंच सके. ऊपर से बादाम, पिस्ता और केसर डालकर सजाया जाता है. यह पारंपरिक सादा घेवर कहलाता है और आज भी त्योहारों के दौरान इसकी बिक्री सबसे अधिक देखने को मिलती है.

समय के साथ घेवर के कई नए स्वाद तैयार किए जाने लगे हैं. कारीगर ने बताया कि मलाई घेवर में ऊपर से मलाई और मीठा मिश्रण लगाया जाता है, जबकि रबड़ी घेवर में गाढ़ी रबड़ी की परत इसे और अधिक स्वादिष्ट बनाती है. इसके अलावा मावा घेवर, केसर घेवर और ड्राई फ्रूट घेवर भी लोगों की पसंद बन चुके हैं. मलाई और रबड़ी वाले घेवर खासतौर पर युवाओं और मिठाई प्रेमियों के बीच काफी लोकप्रिय हैं.

उत्तर भारत में घेवर का संबंध विशेष रूप से हरियाली तीज, रक्षाबंधन और सावन के मौसम से माना जाता है. कई परिवारों में तीज के अवसर पर बेटियों और बहनों को घेवर भेजने की परंपरा भी रही है. बारिश और त्योहारों के मौसम में बाजारों में घेवर की खुशबू और अलग-अलग वैरायटी लोगों को आकर्षित करती हैं. यही कारण है कि सावन आते ही मिठाई की दुकानों पर घेवर की बिक्री तेजी से बढ़ जाती है.

आज घेवर सिर्फ पारंपरिक मिठाई नहीं रहा, बल्कि इसमें आधुनिक प्रयोग भी किए जा रहे हैं. घेवर कारीगर सचिन ने कहा कि चॉकलेट घेवर, पनीर घेवर और अलग-अलग ड्राई फ्रूट टॉपिंग वाले घेवर बाजार में उपलब्ध हैं. हालांकि पारंपरिक सादा और मलाई घेवर की लोकप्रियता आज भी बरकरार है. आगरा में पेठा शहर की सबसे बड़ी मिठाई पहचान है, लेकिन त्योहारों के मौसम में घेवर भी लोगों की खास पसंद बन जाता है और स्थानीय मिठाई बाजारों में अपनी अलग जगह बनाए हुए है.

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