Wednesday, October 21, 2026
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आज सिंदूर खेला के साथ मां को विदाई: एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर रस्म निभाएंगी बंगाली समाज की महिलाएं, इंदौर में 106 साल से मना रहे उत्सव – Indore News




इंदौर में बंगाली समाज की महिलाएं बुधवार को सिंदूर खेला की रस्म के साथ मां दुर्गा को विदाई देंगी। बंगाली परंपरा में मां दुर्गा को बेटी माना जाता है, जो हर साल अपने मायके आती हैं और पांच दिन तक उत्सव के बाद विदा होती हैं। दुर्गा उत्सव के अंतिम दिन महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करेंगी। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सिंदूर खेला की परंपरा निभाएंगी। पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक आयोजनों के बाद मां की विदाई की यह बेला समाज के लिए भावुक पल होगी। सार्वजनिक रूप से 98वीं बार आयोजन इंदौर में बंगाली समाज 106 वर्षों से दुर्गा उत्सव मना रहा है। सार्वजनिक रूप से यह उत्सव 98वीं बार आयोजित किए जाने की जानकारी है। पांच दिन तक चलने वाले इस आयोजन में पूजा-पाठ के साथ सांस्कृतिक और पारंपरिक कार्यक्रम होते हैं। सिंदूर खेला उत्सव का प्रमुख आकर्षण है, जिसमें महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करने के बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। यह रस्म मां को बेटी के रूप में विदाई देने की परंपरा से जुड़ी है। सिंदूर खेला से जुड़ी है विदाई की परंपरा बंगाली समाज में मां दुर्गा को विवाहित बेटी के रूप में देखा जाता है, जो अपने मायके आती हैं। पांच दिन तक पूजा और उत्सव के बाद उनकी विदाई होती है। अंतिम दिन महिलाएं मां दुर्गा के चरणों में सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर शुभकामनाएं देती हैं। इसके बाद प्रतिमा विसर्जन के साथ उत्सव का समापन होता है। 1830 के दशक में इंदौर आए थे बंगाली परिवार इंदौर में बंगाली समाज की मौजूदगी का इतिहास करीब दो शताब्दी पुराना है। 1830 के दशक की शुरुआत में पश्चिम बंगाल के चंदन नगर से गणेश चंद्र दास और भगवान चंद्र दत्त इंदौर आए और यहीं बस गए। उस समय इंदौर में सूती कपड़ा उद्योग तेजी से विकसित हो रहा था। कपड़ा मिलों और उनसे जुड़े व्यवसायों में काम करने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां आए। होलकर रियासत के दौर में बाहरी लोगों के बसने के अनुकूल माहौल ने भी बंगाली परिवारों को यहां बसने का अवसर दिया। 1918 में शुरू हुआ था दुर्गा उत्सव बंगाली परिवारों की संख्या बढ़ने के साथ इंदौर में दुर्गा पूजा की परंपरा भी शुरू हुई। वर्ष 1918 में बंगाली परिवारों ने अपने स्तर पर नवदुर्गा उत्सव मनाना शुरू किया। इसके बाद 1928 में बंगाली क्लब के बैनर तले सार्वजनिक रूप से शारदीय दुर्गा उत्सव आयोजित करने की परंपरा शुरू हुई। उस समय शहर में 125 से अधिक बंगाली परिवार रहते थे। पहले सार्वजनिक आयोजन के लिए वर्तमान सरवटे बस स्टैंड के सामने स्थित सेठ टीकमचंद मूलचंद की धर्मशाला वाले स्थान को चुना गया था। उस समय यहां खुला मैदान था। दूसरे समाजों के प्रतिष्ठित लोगों ने भी आयोजन में सहयोग दिया। तब से बंगाली समाज दुर्गा उत्सव के जरिए अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ा रहा है।



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