Wednesday, September 16, 2026
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औरंगाबाद में तिल प्रोसेसिंग फैक्ट्रियां बनी रोजगार का बड़ा केंद्र: बिहार-झारखंड बॉर्डर पर यूपी से आ रहा कच्चा माल, पटना तक हो रही सप्लाई; करोड़ों का कारोबार – Aurangabad (Bihar) News


औरंगाबाद में बिहार-झारखंड की सीमा से सटे ग्रामीण इलाकों में तिल प्रोसेसिंग फैक्ट्रियों का नेटवर्क तेजी से फैल रहा है। दर्जनों छोटी-बड़ी यूनिट यहां संचालित हो रही है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। इन फैक्ट्रियों में तिल की सफा

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संचालकों के अनुसार प्रोसेसिंग के लिए आवश्यक कच्चा माल उत्तर प्रदेश के कानपुर, फतेहपुर और आसपास के जिलों से ट्रकों के माध्यम से लाया जाता है। यहां पहुंचने पर तिल को पहले मशीनों से साफ किया जाता है, फिर आधुनिक ड्रम वॉशर से धुलाई और भट्ठियों के जरिए सुखाने की प्रक्रिया पूरी की जाती है। इसके बाद इसे बोरी में पैक कर पटना, गया, नवादा, नालंदा सहित कई जिलों में बड़ी मात्रा में सप्लाई किया जाता है। सर्दियों के मौसम में तिल की डिमांड ज्यादा है। बाजार में तिल के लड्डू, चिक्की और अन्य उत्पादों की खपत बढ़ जाती है।

तिल फैक्ट्री में काम कर रहीं महिला मजदूर।

पूरे साल अगर काम मिलेगा को बाहर नहीं जाना पड़ेगा

सिमरी गांव के मजदूर संदीप कुमार ने बताया कि उन्हें यहां काम के साथ रहने की सुविधा भी मिलती है। जिसके कारण महीनों तक फैक्ट्रियों में ही रहकर काम करते हैं। प्रति फैक्ट्री औसतन 20-30 मजदूर कार्यरत रहते हैं, जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं की भी है। जो पैकिंग, छंटाई और तिल सुखाने के कार्य में योगदान दे रही हैं। अगर उन्हें सालों भर यहां काम मिले तो जीविकोपार्जन के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा।

ग्रामीण इलाकों में रोजगार के नए अवसर

वहीं, फैक्ट्री संचालक रवि कुमार का कहना है कि सफाई और धुलाई की प्रक्रिया मशीन से की जाती है। इसके बावजूद पैकिंग, लोडिंग और ट्रांसपोर्टेशन में मानव श्रम की अहम भूमिका बनी हुई है। इससे आसपास के गांवों में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। स्थानीय बाजारों में नकदी प्रवाह बढ़ा है। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले युवाओं और महिलाओं के लिए यह क्षेत्र आय का स्थिर स्रोत बनकर उभरा है।

मशीन से किल की धुलाई की जाती है।

मशीन से किल की धुलाई की जाती है।

रोजगार का मजबूत सहारा

हालांकि, कुछ इकाइयां अब भी बिना औद्योगिक पंजीकरण के संचालित हो रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन फैक्ट्रियों को औपचारिक उद्योग संरचना से जोड़ा जाए, तो न केवल रोजगार और बढ़ेगा बल्कि सरकार को राजस्व का लाभ भी मिलेगा। इसके बावजूद सीमावर्ती इलाकों में चल रही ये तिल प्रोसेसिंग फैक्ट्रियां ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई जान फूंक रही हैं और लोगों के लिए रोजगार का मजबूत सहारा बन चुकी हैं



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