सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत जमानत को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद.’ अदालत ने साफ कहा कि यह सिद्धांत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 से निकलता है और किसी भी सभ्य समाज की बुनियाद ‘निर्दोषता की धारणा’ पर टिकी होती है.
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच जम्मू-कश्मीर के एक कथित नार्को-टेरर मामले में आरोपी सैयद इफ्तिखार अंदराबी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी. आरोपी करीब पांच साल से ज्यादा समय से जेल में बंद है, जबकि उसके पास से कोई प्रत्यक्ष मादक पदार्थ बरामद नहीं हुआ था.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला UAPA की धारा 43D(5) और संविधान के तहत मिलने वाली व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण सवाल उठाता है. अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कड़े कानून जमानत के सिद्धांतों को नियंत्रित कर सकते हैं, लेकिन वे व्यक्ति की स्वतंत्रता और हिरासत के बीच संवैधानिक संतुलन को खत्म नहीं कर सकते.
उमर खालिद और शरजील इमाम मामले का जिक्र
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज करने वाले अपने ही फैसले पर भी आपत्ति जताई. अदालत ने कहा कि उस फैसले में तीन जजों की बेंच द्वारा दिए गए ‘एनआईए बनाम केए नजीब’ फैसले का सही तरीके से पालन नहीं किया गया था.
कोर्ट ने कहा कि केए नजीब केस में स्पष्ट तौर पर माना गया था कि यदि ट्रायल में अत्यधिक देरी हो रही हो और आरोपी लंबे समय से जेल में बंद हो, तो यह जमानत देने का आधार बन सकता है, भले ही मामला UAPA जैसे सख्त कानून के तहत क्यों न हो.
‘छोटी बेंच बड़ी बेंच के फैसले नहीं बदल सकती’
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि छोटी बेंचें बड़ी बेंचों के फैसलों को “कमजोर, दरकिनार या नजरअंदाज” नहीं कर सकतीं. अगर किसी छोटी बेंच को बड़े फैसले पर संदेह हो, तो उसे मामला बड़ी बेंच के पास भेजना चाहिए.
अदालत ने साफ किया कि ‘KA Najeeb’ का फैसला आज भी बाध्यकारी कानून है और ट्रायल कोर्ट, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की छोटी बेंचें भी इसे नजरअंदाज नहीं कर सकतीं.
‘लंबी हिरासत खुद सजा नहीं बन सकती’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुरविंदर सिंह और ग़ुल्फ़िशा फातिमा मामलों के फैसले UAPA, TADA और NDPS जैसे कड़े कानूनों में जमानत देने को लेकर पहले तय न्यायिक सिद्धांतों से अलग दिखाई देते हैं. बेंच ने कहा कि केए नजीब फैसला इसलिए दिया गया था ताकि ट्रायल से पहले लंबी जेल हिरासत खुद सजा में न बदल जाए. कोर्ट ने दोहराया कि ‘बेल नियम है और जेल अपवाद’ संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 से निकलने वाला मूल सिद्धांत है.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘निर्दोष होने की धारणा’ कानून के शासन वाले हर सभ्य समाज की आधारशिला है. अदालत की इन टिप्पणियों को UAPA, TADA और NDPS जैसे सख्त कानूनों के मामलों में बेहद अहम माना जा रहा है.

