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Indian railway : भारतीय रेलवे ने महाराष्ट्र के सात रेलेव स्टेशनों पर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम लगाने की मंजूरी दी है. अभी यहां सिग्नल बदलने के लिए मैकेनिकल लीवर या रिले-आधारित सिस्टम का इस्तेमाल हो रहा है. इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम ट्रेन हादसे रोकने में बहुत कारगर है.
इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग एक कंप्यूटर-आधारित आधुनिक सिग्नलिंग व्यवस्था है.
नई दिल्ली. भारतीय रेलवे ने रेल यात्रा को ‘जीरो एक्सीडेंट’ के स्तर पर ले जाने और सिग्नलिंग व्यवस्था को हाईटेक बनाने के लिए बड़ा कदम उठाया है. रेलवे ने महाराष्ट्र में सेंट्रल रेलवे के सोलापुर डिवीजन के 7 प्रमुख स्टेशनों पर अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग (EI) सिस्टम लगाने का फैसला किया है. इस पर ₹209 करोड़ रुपये खर्च होंगे. ये सभी स्टेशन भारतीय रेलवे के ‘हाई डेंसिटी नेटवर्क (HDN-7)’ रूट पर स्थित हैं, जहां ट्रेनों की आवाजाही बहुत ज्यादा रहती है. इस रूट पर सेंट्रल ट्रैफिक कंट्रोल (CTC) और ऑटोमैटिक ब्लॉक सिग्नलिंग (ABS) के काम को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है. यह तकनीक मानवीय भूलों की गुंजाइश को खत्म कर देती है, जिससे दो ट्रेनों की आमने-सामने की टक्कर, गलत ट्रैक पर गाड़ी जाना और सिग्नल जंपिंग (SPAD) जैसे गंभीर हादसों पर पूरी तरह लगाम लग सकेगी.
सरल शब्दों में कहें तो इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग एक कंप्यूटर-आधारित आधुनिक सिग्नलिंग व्यवस्था है. अभी रेलवे ट्रैक बदलने और सिग्नल देने के लिए मैकेनिकल लीवर या रिले-आधारित सिस्टम का इस्तेमाल ही ज्यादा करता है. जिसमें इंसानी चूक या तकनीकी खराबी का खतरा बना रहता है. इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग इन पुरानी प्रणालियों की जगह ले लेती है. यह माइक्रोप्रोसेसर और डिजिटल सॉफ्टवेयर के जरिए काम करती है. यह सिस्टम पटरियों के पॉइंट्स और सिग्नलों के बीच एक ऐसा डिजिटल तालमेल बैठाता है कि जब तक ट्रैक पूरी तरह सुरक्षित और खाली न हो, सिग्नल हरा (ग्रीन) हो ही नहीं सकता. अगर किसी सिग्नल या ट्रैक पर कोई खामी आती है, तो यह कंप्यूटर खुद-ब-खुद उसका पता लगा लेता है और तुरंत सिस्टम को अलर्ट कर देता है.

