Sunday, June 7, 2026
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चित्तौड़गढ़ की मिट्टी में घुली हापुस और दशहरी की मिठास: कृषि विज्ञान केंद्र ने 2008 में शुरू किया प्रयोग, आज किसानों के लिए बन गया कमाई का नया मॉडल – Chittorgarh News




चित्तौड़गढ़ जिले में गेहूं, मक्का और सोयाबीन जैसी पारंपरिक फसलें लंबे समय से उगाई जाती रही हैं। लेकिन अब जिले के किसान खेती में नए एक्सपेरिमेंट भी कर रहे हैं। राजस्थान के गर्म मौसम वाले इस क्षेत्र में अब देश की प्रसिद्ध आम की किस्मों की भी सफल खेती हो रही है। महाराष्ट्र का हापुस, उत्तर प्रदेश का दशहरी और लंगड़ा, गुजरात का केसर समेत कई लोकप्रिय आम अब चित्तौड़गढ़ की धरती पर लहलहा रहे हैं। इसकी शुरुआत करीब 18 साल पहले बोजुंदा स्थित कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) में किए गए एक प्रयोग से हुई थी। आज यह एक्सपेरिमेंट सफल होकर किसानों के लिए अच्छी आय और नई संभावनाओं का जरिया बन गया है। एक हेक्टेयर में तैयार हुआ आम का मॉडल गार्डन कृषि विज्ञान केंद्र बोजुंदा में साल 2008 में आम की विभिन्न किस्मों का एक मॉडल गार्डन विकसित किया गया था। करीब एक हेक्टेयर क्षेत्र में लगाए गए इन पौधों ने समय के साथ साबित कर दिया कि यदि सही तकनीक अपनाई जाए तो चित्तौड़गढ़ का मौसम भी आम की अच्छी खेती के लिए उपयुक्त हो सकता है। इस बगीचे में आम्रपाली, दशहरी, लंगड़ा, मल्लिका, हापुस, हयात और केसर सहित सात प्रमुख किस्मों के पौधे लगाए गए थे। इनमें से कई पौधे आज भी अच्छी स्थिति में हैं और भरपूर उत्पादन दे रहे हैं। पिछले साल इस बगीचे से करीब 20 क्विंटल आम का उत्पादन प्राप्त हुआ था, जिससे कृषि विज्ञान केंद्र को अच्छा राजस्व भी मिला। इस साल भी आम के फलों का टेंडर करीब 37 हजार रुपए में हुआ है। मदर प्लांट बने किसानों के लिए नई उम्मीद कृषि विज्ञान केंद्र में लगे ये पौधे केवल फल उत्पादन के लिए नहीं हैं, बल्कि इन्हें मदर प्लांट के रूप में विकसित किया गया है। इन पौधों से कलम लेकर नए ग्राफ्टेड पौधे तैयार किए जाते हैं और किसानों को उपलब्ध कराए जाते हैं। यही वजह है कि यह बगीचा केवल एक प्रदर्शन प्लॉट नहीं बल्कि किसानों के लिए प्रशिक्षण और पौधा उत्पादन का जरूरी केंद्र बन गया है। यहां तैयार होने वाले पौधे मूल किस्म की सभी विशेषताओं को बनाए रखते हैं और जल्दी फल देना शुरू कर देते हैं। यही कारण है कि जिले के कई किसान अब यहां से पौधे लेकर अपने खेतों में बागवानी विकसित कर रहे हैं। जुलाई-अगस्त में होती है ग्राफ्टिंग की सबसे बड़ी तैयारी कृषि विज्ञान केंद्र के तकनीकी सहायक संजय धाकड़ ने बताया कि आम के ग्राफ्टेड पौधे तैयार करने के लिए जुलाई और अगस्त का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। बारिश के मौसम में पौधों में नई बढ़वार आने लगती है। इसी दौरान चयनित शाखाओं की पत्तियां हटाई जाती हैं और कुछ दिनों बाद तैयार हुई कलम को रूट स्टॉक पर ग्राफ्ट किया जाता है। रूट स्टॉक सामान्यतः बीज से तैयार किया गया एक साल पुराना पौधा होता है जिसकी मोटाई पेंसिल के बराबर होती है। ग्राफ्टिंग के बाद पौधों को पॉलीहाउस में रखा जाता है या फिर विशेष कवर लगाए जाते हैं ताकि उनमें नमी और तापमान बना रहे। करीब दो महीने बाद पौधा रोपण के लिए तैयार हो जाता है और किसान उसे अपने खेत में लगा सकते हैं। तीन साल में शुरू हो जाता है फल आना, पांच साल बाद मिलता है पूरा उत्पादन उन्होंने बताया कि ग्राफ्टेड पौधों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें जल्दी फल लगना शुरू हो जाता है। आमतौर पर तीसरे साल से कैरियां आने लगती हैं, हालांकि उस समय पौधा छोटा होने के कारण उत्पादन सीमित रहता है। पांच साल की आयु के बाद पौधे पूरी क्षमता से फल देने लगते हैं। एक अच्छे प्रबंधन वाले पौधे से 40 से 50 किलो तक फल आसानी से प्राप्त हो सकते हैं, जबकि बेहतर देखभाल और पर्याप्त सिंचाई होने पर उत्पादन एक से डेढ़ क्विंटल तक पहुंच सकता है। यही वजह है कि आम की बागवानी किसानों के लिए लाभकारी विकल्प बनती जा रही है। सही दूरी और देखभाल से बढ़ती है सफलता कृषि विज्ञान केंद्र के तकनीकी सहायक संजय धाकड़ ने बताया कि आम के पौधे लगाते समय खेत की तैयारी बहुत जरूरी होती है। इसके लिए लगभग एक मीटर लंबा, एक मीटर चौड़ा और एक मीटर गहरा गड्ढा तैयार किया जाना चाहिए। पौधे से पौधे की दूरी छह से आठ मीटर यानी करीब 18 से 20 फीट रखनी चाहिए ताकि भविष्य में पेड़ों को ज्यादा जगह मिल सके। ग्राफ्टेड पौधे लगाने के बाद खास ध्यान इस बात का रखना होता है कि ग्राफ्टिंग वाले हिस्से के नीचे से कोई नई फुटान विकसित न हो। अगर ऐसा होता है तो पौधे की मूल कलम कमजोर पड़ सकती है और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। किसानों की आमदनी बढ़ाने में निभा रहा अहम भूमिका कृषि विज्ञान केंद्र का यह प्रयोग अब जिले के किसानों के लिए प्रेरणा बन चुका है। कई प्रगतिशील किसान यहां से पौधे लेकर दो से तीन बीघा तक के आम के बगीचे विकसित कर चुके हैं। वहीं कई किसान अपने खेतों और घरों के आसपास सीमित संख्या में भी पौधे लगा रहे हैं। धाकड़ का कहना है कि यदि कोई किसान 100 पौधों का बगीचा विकसित करता है और प्रति पौधा औसतन 40 किलो उत्पादन भी प्राप्त करता है तो उसे पारंपरिक खेती की तुलना में कहीं ज्यादा आय मिल सकती है। यही कारण है कि जिले में धीरे-धीरे बागवानी के प्रति रुचि बढ़ रही है। 25 साल तक देता है अच्छा उत्पादन आम का पेड़ एक लंबी अवधि की फसल माना जाता है। तकनीकी सहायक संजय धाकड़ ने बताया कि अच्छी देखभाल मिलने पर एक पेड़ करीब 25 साल तक लगातार अच्छा उत्पादन देता है। कई किस्मों में एक फल का वजन 400 से 600 ग्राम तक पहुंच जाता है। विशेष रूप से लंगड़ा और अन्य उन्नत किस्मों में बड़े आकार और बेहतर गुणवत्ता के फल मिलते हैं, जिससे बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। किसानों को प्रशिक्षण के साथ मिल रही नई दिशा कृषि विज्ञान केंद्र सिर्फ पौधे उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। यहां किसानों को बागवानी, पौधारोपण, सिंचाई, पौध संरक्षण और प्रबंधन की पूरी जानकारी भी दी जाती है। समय-समय पर ट्रेनिंग प्रोग्राम आयोजित किए जाते हैं ताकि किसान वैज्ञानिक तरीके से बगीचे विकसित कर सकें। इससे उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पौधों की गुणवत्ता बनाए रखने में भी मदद मिलती है। मरुधरा में फलों के राजा की नई कहानी एक समय था जब लोगों का मानना था कि हापुस, दशहरी और केसर जैसे आम सिर्फ अपने पारंपरिक इलाकों में ही अच्छी तरह उग सकते हैं। लेकिन बोजुंदा के कृषि विज्ञान केंद्र ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है। यहां अपनाई गई ग्राफ्टिंग तकनीक और वैज्ञानिक तरीके से देखभाल के जरिए यह दिखाया गया कि चित्तौड़गढ़ जैसी गर्म जलवायु में भी आम की अच्छी और गुणवत्तापूर्ण पैदावार ली जा सकती है। इसी कारण से यह आम का बगीचा आज सिर्फ एक प्रयोग नहीं रहा, बल्कि जिले के किसानों के लिए प्रेरणा का केंद्र बन गया है। यह बगीचा किसानों को बता रहा है कि सही तकनीक, विशेषज्ञों के मार्गदर्शन और थोड़े धैर्य के साथ आम की खेती से अच्छी आय हासिल की जा सकती है। इससे जिले में बागवानी के नए अवसर भी खुल रहे हैं।



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