मप्र में छात्रसंघ चुनाव कराए जाने को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। दरअसल, हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पिछले दिनों सरकार से जवाब मांगा है कि छात्रसंघ चुनाव क्यों नहीं कराए जा रहे? सरकार ने इसका जवाब देने के लिए हाईकोर्ट से वक्त मांगा है
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उसके बाद से सरकार ने अलग-अलग कारणों का हवाला देकर चुनाव नहीं कराए। मप्र में पिछले 20 साल से बीजेपी की सरकार है, बीच में 15 महीने के लिए कांग्रेस की भी सरकार थी। दोनों ही पार्टियों के छात्र संगठन एबीवीपी( अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्) और एनएसयूआई( भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन) डायरेक्ट इलेक्शन की बरसों से मांग कर रहे हैं।
मोहन-शिवराज छात्र राजनीति से ही निकले इसके बाद भी न तो बीजेपी और न ही कांग्रेस ने इसे लेकर कोई सकारात्मक पहल की। खास बात ये है कि मप्र के मौजूदा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और पूर्व सीएम शिवराज सिंह छात्र राजनीति से होकर ही इस मुकाम पर पहुंचे हैं। वहीं इस समय मोहन मंत्रिमंडल के 12 मंत्री और 19 विधायक ऐसे हैं जिन्होंने राजनीति का ककहरा छात्र जीवन में सीखा था।
छात्र राजनीति से निकलकर शीर्ष पदों पर बैठे नेता खुद ही ‘राजनीति की नर्सरी’ को फलने फूलने क्यों नही देना चाहते? आखिर इससे युवा नेताओं का कितना नुकसान हो रहा है? राजनीतिक दलों को नए नेताओं की पौध कहां से मिल रही है? इन सब सवालों को लेकर भास्कर ने छात्र संगठन के नेताओं और एक्सपर्ट से बात की।
हाईकोर्ट में क्यों लगी याचिका दरअसल, एमपी के कॉलेजों में 2017 से छात्र संघ चुनाव नहीं हो रहे हैं। हाल ही में जबलपुर प्रवास पर आए उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने कहा था कि जल्द चुनाव कराए जाएंगे, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस पर जबलपुर के गोहलपुर निवासी अदनान अंसारी ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता ने कहा कि रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय सहित प्रदेश के सभी विश्वविद्यालय लिंगदोह समिति की सिफारिशों के बावजूद चुनाव नहीं करा रहे हैं, जो संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। याचिका में मध्यप्रदेश सरकार के साथ-साथ 9 यूनिवर्सिटी को भी पार्टी बनाया है।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि एक तरफ विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव नहीं करा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ छात्रों से छात्र संघ शुल्क वसूला जा रहा है, जो पूरी तरह अवैधानिक है। राज्य सरकार ने जवाब दाखिल करने के लिए कोर्ट से समय मांगा। इस मामले में अगली सुनवाई 1 दिसंबर को होगी।

चुनाव न कराने के लिए सरकार के तीन पॉइंट्स छात्र संघ चुनाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रणाली से क्यों नहीं कराए जाते। इसे लेकर सरकार की तरफ से अक्सर तीन तर्क दिए जाते हैं।
- लॉ एंड ऑर्डर: सरकार का सबसे प्रमुख तर्क हिंसा और मारपीट का है। उसका कहना है कि चुनावों से कैंपस का माहौल खराब होता है।
- प्रोफेसर सभरवाल की हत्या: 2006 में उज्जैन में छात्रसंघ चुनाव के दौरान हुई प्रोफेसर एच.एस. सभरवाल की हत्या की घटना को आज भी एक बड़ी वजह बताया जाता है।
- शैक्षणिक कार्यों में बाधा: तर्क यह भी है कि चुनाव प्रक्रिया और उसके बाद की राजनीतिक गतिविधियों से साल भर पढ़ाई बाधित होती है और कैंपस में बाहरी तत्वों का हस्तक्षेप बढ़ता है।
छात्र राजनीति से निकले नेता, लेकिन आज वही मंच बंद मध्यप्रदेश की राजनीति में छात्रसंघ चुनावों का ऐतिहासिक महत्व रहा है। वर्तमान मुख्यमंत्री, दोनों डिप्टी सीएम, अध्यक्ष सहित 31 बड़े नेता 1975 से 1990 के बीच छात्रसंघ चुनावों से ही निकलकर आए हैं। इनमें से 19 विधायक कभी न कभी मंत्री भी रहे हैं। लेकिन आज जब वे सत्ता में हैं, तो उन्हीं के शासनकाल में छात्र राजनीति की पहली सीढ़ी युवाओं के लिए बंद कर दी गई है।
इन नेताओं की औसत उम्र 63 साल है और वे 30-40 सालों से राजनीति में सक्रिय हैं। लेकिन नई पीढ़ी के लिए नेतृत्व का रास्ता बंद है।

क्या कहते हैं छात्र संगठन नेता और एक्सपर्ट इसे लेकर भास्कर ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ( एबीवीपी) के केतन चतुर्वेदी, भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन( एनएसयूआई) के अध्यक्ष आशुतोष चौकसे और एक्सपर्ट के तौर पर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक दीपक तिवारी से बात की। सभी ने चुनाव न कराने के पीछे 4 तर्क गिनाए….
1.वंशवाद की राजनीति को बचाने का डर एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष आशुतोष चौकसे कहते हैं, ’20 साल में 15 महीने छोड़ दें तो प्रदेश में बीजेपी की ही सरकार है। शिवराज सिंह चौहान से लेकर डॉ. मोहन यादव तक, सभी छात्र राजनीति से आए हैं। लेकिन अब इन्हें डर है कि अगर चुनाव हुए तो कोई जमीनी, लोकप्रिय छात्र नेता उभर आएगा जो उनके बेटों की राजनीति को खत्म कर सकता है। यह वंशवाद को बचाने की लड़ाई है।’
वहीं एबीवीपी के छात्र नेता केतन चतुर्वेदी कहते हैं कि हमें बहुत दुख होता है एबीवीपी और छात्रसंघ राजनीति से निकले नेता मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और मंत्री के ओहदे तक जा पहुंचे। जब हमारी बारी आई तो चुनाव नहीं कराए जा रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार और माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति दीपक तिवारी कहते हैं, ‘नेतृत्व हमेशा छात्र राजनीति से ही उभरता है।



2. भ्रष्टाचार और कुनीतियों पर पर्दा डालने की कोशिश आशुतोष चौकसे का आरोप है, ‘बीजेपी चाहती है कि कैंपस में कोई दूसरा विचार न पनपे। वे युवाओं को झूठे राष्ट्रवाद और हिंदू-मुसलमान में उलझाए रखना चाहते हैं, ताकि वे व्यापम, पटवारी भर्ती और स्कॉलरशिप जैसे घोटालों पर सवाल न उठा सकें। एक निर्वाचित छात्रसंघ प्रशासन और सरकार को कटघरे में खड़ा करने की ताकत रखता है।’
एबीवीपी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘कॉलेजों की बदहाली का एक बड़ा कारण चुनाव न होना है। अगर एक निर्वाचित छात्रसंघ होता, तो वह हर छोटी-बड़ी समस्या के लिए लड़ता और प्रशासन को जवाबदेह बनाता।’ चुनाव होते तो छात्र हॉस्टल, लाइब्रेरी, फीस, कैंपस में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर शासन-प्रशासन से सवाल करते, लेकिन सरकार ने छात्रों की आवाज को दबा दिया है।
3. युवाओं के गुस्से और असंतोष का डर दीपक तिवारी का मानना है कि सरकारें सबसे ज्यादा युवाओं के गुस्से से डरती हैं। वे कहते हैं, ‘आज देश में रोजगार और शिक्षा की जो स्थिति है, उससे युवाओं में भारी असंतोष है। सरकारों को लगता है कि छात्रसंघ चुनाव इस असंतोष को एक संगठित मंच दे देंगे, जो एक चिनगारी बनकर भड़क सकता है और फिर उसे नियंत्रित करना मुश्किल होगा। देश के सभी बड़े आंदोलन छात्र आंदोलनों से ही उपजे हैं।’

4. चुनावी हार का राजनीतिक डर एनएसयूआई के प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार कहते हैं कि मध्यप्रदेश में 27 बड़ी यूनिवर्सिटी और 668 सरकारी कॉलेज हैं। हर कॉलेज में छात्रसंघ के चार पद (अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव, महासचिव) होते हैं। हर पद पर औसतन 3-4 प्रत्याशी चुनाव लड़ते हैं। यानी हर साल करीब 10 हजार युवा नेतृत्व के लिए मैदान में उतरते हैं। इनमें से 2800 छात्र चयनित होकर आते हैं।
चुनाव न होने से हर साल 10 हजार युवा नेता तैयार ही नहीं हो पा रहे। इस तरह से देखा जाए तो बीजेपी ने 20 सालों में 2 लाख छात्रों को राजनीति में आने से रोक दिया। वे कहते हैं, “बीजेपी को डर है कि अगर प्रत्यक्ष चुनाव हुए तो घोटालों से नाराज युवा एबीवीपी को बुरी तरह हरा देंगे।

छात्र संघ चुनाव नहीं तो नेता आ कहां से रहे हैं? इस सवाल का जवाब देते हुए वरिष्ठ पत्रकार दीपक तिवारी कहते हैं कि 80 और 90 के दशक तक तो छात्र संघ चुनाव ही राजनीति की नर्सरी होते थे। साल 2003 में जब बीजेपी ने सत्ता संभाली तो फिर छात्रसंघ चुनाव बंद हो गए। मप्र में पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद ग्रामीण पृष्ठभूमि से कई नेता निकलकर सामने आए।
इससे राजनीति का विकेंद्रीकरण हुआ और गांव-गांव से युवा सरपंच, जनपद और जिला पंचायत सदस्य बनकर उभरे। अब धीरे-धीरे वहां भी वंशवाद ने कब्जा कर लिया। अब नेताओं ने सुनिश्चित कर दिया कि जिला पंचायत अध्यक्ष मेरी पत्नी बने, जनपद अध्यक्ष मेरा भतीजा बने और सरपंच मेरा बेटा बने। इस तरह, नेतृत्व का वह नैसर्गिक रास्ता भी बंद कर दिया गया।”

77 विधायक जिनकी पृष्ठभूमि स्टूडेंट पॉलिटिक्स नहीं साल 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में 77 विधायक ऐसे हैं जिनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि स्टूडेंट पॉलिटिक्स नहीं रही है। भास्कर ने पहली बार चुनकर आए और 50 साल से कम उम्र के विधायकों का एनालिसिस किया तो पाया कि कांग्रेस के ऐसे विधायकों की संख्या 28 और बीजेपी के 47 विधायक हैं।
पहली बार के विधायकों में कांग्रेस विधायक पंकज उपाध्याय, बीजेपी के अभिलाष पांडे और घनश्याम चंद्रवंशी की राजनीतिक पृष्ठभूमि छात्रसंघ चुनाव है। बाकी सारे अलग-अलग पृष्ठभूमि से राजनीति में आए हैं। इनमें से 14 विधायक ऐसे हैं जिनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि पारिवारिक है। वहीं 13 विधायक पार्टी के पदाधिकारी रहे हैं।


