Friday, April 17, 2026
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जब ‘खून की कमी’ से जूझ रही थी लगभग हर महिला, तब ‘प्रकट’ हुईं थी ये देवी


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अब से करीब 35 साल पहले तक संतोषी माता का बहुत जोर था. बहुत सी महिलाएं शुक्रवार को संतोषी माता का व्रत करती थीं. जय संतोषी माता फिल्म भी आज ही के दिन 30 मई को 50 साल पहले रिलीज हुई थी और बंपर कमाई की. संतोषी मात…और पढ़ें

30 मई 1975 को कुछ लाख के खर्च से बनाई गई फिल्म जय संतोषी माता ने करोड़ों की कमाई की थी.

हाइलाइट्स

  • शुक्रवार का दिन संतोषी माता व्रत का दिन था
  • महिलाएं श्रद्धा के साथ व्रत करती, गुड़ चना प्रसाद चढ़ातीं
  • धीरे धीरे प्रचार कम हुआ और शुक्रवार वैभव लक्ष्मी का दिन बन गया

अस्सी के दशक तक शुक्रवार का दिन खास होता था. अब तो शुक्रवार को देवी लक्ष्मी का दिन माना जाता है. उस दौर में हिंदू श्रद्धालु महिलाओं के लिए यह दिन संतोषी माता का होता था. नई पीढ़ी के युवाओं और बच्चों को शायद भूल गया हो, लेकिन नब्बे से पहले के दौर में होश संभाल चुके लोगों को संतोषी माता खूब याद होंगी. बहुत से लोगों ने जय संतोषी माता फिल्म भी देखी होगी. यह वैष्णो देवी के प्रचार-प्रसार से भी पहले का दौर था. शुक्रवार को महिलाएं व्रत करती थीं, संतोषी माता की कथा करती थीं, गुड़ चना का प्रसाद चढ़ाया जाता था. महिलाएं व्रत का पारण करने से पहले उसे प्रसाद के रूप में बहुत श्रद्धा से ग्रहण करतीं. घर में उस दिन कोई भी सदस्य खटाई नहीं खाता था. इसका पालन पूरी श्रद्धा और सख्ती से होता था.

अगर हिंदू देवी-देवताओं की बात की जाए तो संतोषी माता का किसी पुराण में जिक्र नहीं आता. वेदों में तो होने का सवाल ही नहीं है. वहां तो गिने चुने देवता ही आते हैं. लेकिन साल 1960 के दूसरे हिस्से में इनका प्रचार-प्रसार शुरू हुआ. हो सकता है कि भारत के हिंदी प्रदेशों में किसी स्थानीय देवी से प्रेरित रहा हो. कुछ लोग यह भी कहते थे कि इनका प्रचार पश्चिम बंगाल से हुआ हो. हालांकि बंगाली व्यंजनों का स्वरूप देखते हुए गुड़ चना जैसा सस्ता प्रसाद देवी को चढ़ाने की बात थोड़ी कम जंचती है. वहां के देवी-देवताओं को रसयुक्त और भव्य किस्म के व्यंजन का ही भोग चढ़ाया जाता. सूखा गुड़ चना क्यों? लेकिन धार्मिक विश्वास की बातों को तर्क और विज्ञान का मुलम्मा चढ़ाने के हामी लोग इसे भी एक खासियत के तौर पर पेश करते हैं.

ऐसे लोगों की दलील है कि देश में औसत महिला के खून में आयरन की कमी एक नेचुरल बात देखी और मानी जाती रही है. उस दौर में तो और भी हालत बुरी थी. आम परिवारों की महिलाएं पूरे परिवार को खिलाने के बाद ही खाने में अपने जीवन को धन्य मानती थीं. धर्म और विज्ञान को जोड़ने वाले दलील देते हैं- आयरन को बढ़ाने के लिए आज भी गुड़ और चना से बेहतर कोई नेचुरल उपाय नहीं है. इसी लिहाज से संतोषी माता का प्रचार बढ़ा.

हालांकि हम उस देश के बासी हैं जहां देवता को मानने के लिए किसी भी तर्क होना बिल्कुल गैरजरूरी है. बस लोगों को पता भर चल जाए कि किसी जगह मूर्ति दूध पी रही है, देश भर में आजमा लिया जाएगा. सभी बताने लगेंगे कि उन्होंने भी मूर्ति को दूध पिलाया. इसे हम सभी देख भी चुके हैं.

बहरहाल, देश भर में संतोषी माता का प्रचार खूब हुआ. आज से ठीक 50 साल पहले 30 मई 1975 को फिल्म रिलीज हुई थी. नेट बाबा से पता करने पर मिलता है कि फिल्म बनाने में 5 से 12 लाख रुपये तक खर्च हुए थे. इस फिल्म ने बंपर कमाई की. नेट पर मौजूद अलग-अलग आंकड़े बताते हैं कि फिल्म ने 5 से 25 करोड़ रुपये तक की कमाई की. बहरहाल, उस दौर में इससे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म शोले ही रही.

धर्म के जानकार वरिष्ठ पत्रकार इष्टदेव सांकृत्यायन का मानना है कि हो सकता है कि किसी स्थानीय देवी के प्रभाव में संतोषी माता का उद्भव हुआ हो. लेकिन यह ध्यान रखने वाली बात है कि उनका प्रचार-प्रसार कम होने के बाद शुक्रवार वैभव लक्ष्मी का दिन बन गया. उनका स्वरूप और उनकी पूजा-पद्धति भी करीब-करीब वैसी ही है जैसी संतोषी माता की है. वे कहते हैं, “संतोष आने से ही वैभव आ सकता है. जब तक संतोष न आए दरिद्रता ही रहेगी. इसलिए यह भी हो सकता है कि संतोष का उपदेश करने के लिए ही इस प्रकार की देवी का प्रचार हुआ हो.” हालांकि आज भी देश की बहुत सी जगहों पर संतोषी माता के मंदिर हैं और उनमें पूजा-अर्चना होती है.

बहरहाल, साल 1984 में दूरदर्शन के देश भर में फैलना शुरू होने के बाद से धीरे-धीरे संतोषी माता का प्रचार कम होता गया. वही समय था जब संचार और आने-जाने के साधन बढ़ने के साथ वैष्णो माता का प्रचार बढ़ने लगा. साथ ही टी-सीरीज के मालिक गुलशन कुमार ने वैष्णो देवी के खूब सारे वीडियो कैसेट निकाले. फिल्मों में भी वैष्णो माता का खूब प्रचार हुआ और श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं माता पूरी करने लगीं.

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राजकुमार पांडेय

करीब ढाई दशक से सक्रिय पत्रकारिता. नेटवर्क18 में आने से पहले राजकुमार पांडेय सहारा टीवी नेटवर्क से जुड़े रहे. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद वहीं हिंदी दैनिक आज और जनमोर्चा में रिपोर्टिंग की. दिल…और पढ़ें

करीब ढाई दशक से सक्रिय पत्रकारिता. नेटवर्क18 में आने से पहले राजकुमार पांडेय सहारा टीवी नेटवर्क से जुड़े रहे. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद वहीं हिंदी दैनिक आज और जनमोर्चा में रिपोर्टिंग की. दिल… और पढ़ें

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