Wednesday, January 14, 2026
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जर्मन चांसलर को छोड़ मैसुरु में राहुल की जी-हुजूरी! प्रोटोकॉल ही भूली कांग्रेस


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कर्नाटक में जर्मन चांसलर की मेजबानी छोड़ मुख्यमंत्री सिद्धरमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार का मैसुरु में राहुल गांधी का स्वागत करना विवादों में है. विपक्ष ने इसे राज्य के हितों की अनदेखी और ‘हाई कमान’ की जी-हुजूरी करार दिया है. हालांकि मुख्यमंत्री ने इसे केवल शिष्टाचार भेंट बताते हुए नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को खारिज किया है. उन्होंने कहा कि पार्टी आला कमान का फैसला ही अंतिम होगा और सरकार में कोई भ्रम नहीं है.

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जर्मन चांसलर के स्वागत को कर्नाटक सरकार का कोई बड़ा नुमाइंदा नहीं पहुंचा. जबकि राहुल गांधी की अगवानी को खुद सीएम और डिप्टी सीएम आए.

नई दिल्ली: कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की प्राथमिकताओं पर बीजेपी ने सवाल उठाए हैं. मंगलवार को दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं में से एक, जर्मनी के चांसलर कर्नाटक के दौरे पर आए थे. राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार बेंगलुरु में उनकी मेजबानी करने के बजाय मैसुरु में राहुल गांधी का स्वागत करने पहुंच गए. विपक्ष ने इसे कर्नाटक के हितों की अनदेखी और ‘हाई कमान’ को खुश करने वाली राजनीति करार दिया है. नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक ने कांग्रेस सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि राज्य की प्रगति से ज्यादा पार्टी वफादारी को महत्व दिया जा रहा है. सिद्धारमैया ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे केवल एक शिष्टाचार मुलाकात बताया है. हालांकि, इस घटनाक्रम ने राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को एक बार फिर हवा दे दी है.

क्या कर्नाटक के आर्थिक विकास से ज्यादा जरूरी ‘आला कमान’ की चापलूसी है?

जर्मन चांसलर का कर्नाटक दौरा राज्य के लिए कूटनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण था. बेंगलुरु को ग्लोबल इन्वेस्टमेंट हब माना जाता है. ऐसे में चांसलर का स्वागत करना मुख्यमंत्री की बड़ी जिम्मेदारी थी. लेकिन सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ने मैसुरु जाना चुना. राहुल गांधी वहां से केवल तमिलनाडु के ऊटी की ओर जा रहे थे. विपक्ष का कहना है कि मुख्यमंत्री ने निवेश और रोजगार के बड़े अवसर को निजी राजनीति के चक्कर में गवा दिया. एक जिम्मेदार नेतृत्व को हमेशा राज्य के हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए. लेकिन कांग्रेस सरकार ने प्रोटोकॉल को दरकिनार कर दिया. इसने कर्नाटक की वैश्विक छवि पर नकारात्मक असर डाला है.

जर्मन चांसलर के बेंगलुरु आगमन पर आखिर प्रोटोकॉल की धज्जियां क्यों उड़ीं?

जब किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष राज्य में आता है, तो प्रोटोकॉल के तहत मुख्यमंत्री को उनकी अगवानी करनी होती है. आर. अशोक ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है. उन्होंने कहा कि सिद्धारमैया ने राज्य की गरिमा को ताक पर रख दिया. जर्मन चांसलर का बेंगलुरु उतरना विकास और उद्योग के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता था. लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. राजनीतिक वफादारी को राज्य के सम्मान से ऊपर रखा गया. यह न केवल खराब राजनीति है, बल्कि कर्नाटक के लोगों के साथ धोखा भी है. जनता अब सरकार की इन प्राथमिकताओं पर सवाल उठा रही है.



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