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Turkey Farming: बिहार के सीतामढ़ी जिले में किसान अब पारंपरिक पशुपालन के साथ नए और इनोवेटिव बिजनेस मॉडल अपना रहे हैं. डुमरा प्रखंड के शिवहर गांव के किसान राजेश कुमार ने बकरी पालन के साथ टर्की फार्मिंग शुरू की है, जिससे उन्हें कम समय में बेहतर मुनाफे की उम्मीद है. खास बात यह है कि टर्की मुर्गा सिर्फ 6 महीने में 10 से 13 किलो तक वजन का हो जाता है और इसकी बाजार में डिमांड भी तेजी से बढ़ रही है. कम बीमारी, कम लागत और ज्यादा कमाई की वजह से टर्की पालन अब ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार का नया विकल्प बनता जा रहा है.
सीतामढ़ी के किसान अब खेती-बाड़ी के साथ-साथ नए-नए आइडियाज पर काम कर रहे हैं. इसी कड़ी में अब ‘टर्की पालन’ यानी टर्की फार्मिंग का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है. अक्सर लोग मीट के लिए बकरी पालते हैं, जिसे तैयार होने में काफी वक्त और मेहनत लगता है, लेकिन टर्की मुर्गा सिर्फ 6 महीने में बकरी के बराबर वजन का हो जाता है. सीतामढ़ी जिले के डुमरा प्रखंड के शिवहर गांव के रहने वाले राजेश कुमार ने एक जबरदस्त पहल की है.

राजेश वैसे तो मुख्य तौर पर बकरी पालन करते हैं, लेकिन उन्होंने एक्सपेरिमेंट के तौर पर 10 टर्की मुर्गे पालना शुरू किया है. उनका कहना है कि यह विदेशी प्रजाति का पक्षी लोकल मार्केट में कमाई का एक शानदार जरिया बन सकता है.

टर्की पालन की सबसे बड़ी खासियत इसकी ग्रोथ रेट है. जहां नॉर्मल मुर्गे बहुत छोटे रह जाते हैं, वहीं एक टर्की का वजन 10 से 13 किलो तक आराम से चला जाता है. इसका सबसे बड़ा प्लस पॉइंट यह है कि इसमें बीमारियां बहुत कम लगती हैं, जिससे रिस्क फैक्टर काफी कम हो जाता है.
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इसे तैयार होने में महज 6 महीने का समय लगता है. राजेश कुमार जैसे किसानों के लिए यह एक शॉर्टकट बिजनेस मॉडल की तरह है. कम जगह में भी इसे आसानी से मैनेज किया जा सकता है. अगर आप कम मेहनत में ज्यादा मुनाफा कमाना चाहते हैं, तो टर्की फार्मिंग एक स्मार्ट चॉइस साबित हो सकती है.

बिहार के मार्केट में टर्की की डिमांड अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी है. अगर हम कीमत यानी प्राइस की बात करें, तो एक जिंदा टर्की मुर्गा ₹4000 से लेकर ₹6000 के आसपास बिकता है. वहीं, इसके मीट की कीमत ₹500 से ₹600 प्रति किलो तक रहती है.

टर्की का मीट काफी हेल्दी माना जाता है क्योंकि इसमें कोलेस्ट्रॉल बहुत कम और प्रोटीन की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. आजकल हेल्थ कॉन्शियस लोग और जिम जाने वाले युवा इसके मीट को काफी पसंद कर रहे हैं. बड़े शहरों के रेस्टोरेंट्स में भी इसकी अच्छी-खासी डिमांड है, जिससे किसानों को लोकल लेवल पर ही अच्छे कस्टमर्स मिल जाते हैं.

टर्की पालन सिर्फ एक बिजनेस नहीं बल्कि ग्रामीण इलाकों में सेल्फ एम्प्लॉयमेंट का एक बेहतरीन मौका है. यह पक्षी हरी घास, पत्तियां और नॉर्मल दाना खाकर भी सर्वाइव कर लेता है, जिससे फीडिंग कॉस्ट काफी कम आती है. शिवहर गांव में राजेश कुमार का यह छोटा सा स्टार्टअप दिखाता है कि अगर सही तरीके से प्लानिंग की जाए, तो किसान अपनी इनकम को आसानी से डबल कर सकते हैं. आज के दौर में जब लोग नौकरी के पीछे भाग रहे हैं, ऐसे में टर्की फार्मिंग जैसा इनोवेटिव आइडिया युवाओं के लिए मोटी कमाई का जरिया बन सकता है.

