सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) को हरियाणा की महिला सुमित्रा को नौकरी नहीं देने के मामले में 12 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ महिला होने के आधार पर नौकरी से इनकार करना नारीत्व का अपमान है। दरअसल, यह मामला 38 साल पुराना है। IOC ने सुमित्रा को नौकरी के लिए चुना था। बाद में सिर्फ यह कहकर नियुक्ति से इनकार कर दिया कि महिला सिलेंडर नहीं उठा पाएगी। सुमित्रा अब रिटायरमेंट की उम्र तक पहुंच चुकी हैं। इसलिए कोर्ट ने नौकरी देने के बजाय मुआवजा देने का आदेश दिया। सुमित्रा ने ही सुप्रीम कोर्ट में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अक्टूबर 2025 के फैसले को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने निचली अदालत का वह फैसला पलट दिया था, जिसमें IOC को सुमित्रा को मजदूर के अलावा किसी अन्य पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था। सुमित्रा ने इंटरव्यू दिया था, लेकिन नौकरी नहीं मिली… जानें पूरा मामला सुमित्रा हरियाणा के गुढ़ा गांव की रहने वाली हैं। साल 1988 में उनका नाम उन 49 लोगों की सूची में शामिल था, जिनकी सिफारिश डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली समिति ने आईओसी के LPG बॉटलिंग प्लांट के लिए की थी। सुमित्रा ने खलासी, चपरासी या रीफिलिंग हेल्पर के पद के लिए इंटरव्यू दिया था। उन्हें नौकरी नहीं मिली, जबकि अन्य लोगों को अपॉइंटमेंट लेटर दे दिए गए थे। इसके बाद महिला ने नौकरी नहीं दिए जाने के फैसले के खिलाफ ट्रायल कोर्ट का रुख किया। ट्रायल कोर्ट ने माना कि महिला नौकरी के लिए तय योग्यता पूरी करती थीं। कोर्ट ने एक गवाह के बयान का भी हवाला दिया, जिससे यह बात सामने आई कि उन्हें सिर्फ इसलिए नौकरी नहीं दी गई, क्योंकि वह महिला थीं। हालांकि, ट्रायल कोर्ट के फैसले के बाद आईओसी ने अपील की और 6 अगस्त 1993 को प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया। इसके बाद मामला हरियाणा हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। ‘क्या महिलाएं घरों में गैस सिलेंडर नहीं उठातीं’ इंडियन ऑयल के वकील ने दलील दी थी कि इस काम में भारी LPG सिलेंडर उठाने पड़ते हैं और रात की शिफ्ट होती है, इसलिए शायद अधिकारियों ने महिला को उपयुक्त नहीं माना। इस पर कोर्ट ने वकील से सवाल किया- क्या महिलाएं घरों में गैस सिलेंडर नहीं उठातीं? कोर्ट ने कहा- हम भारत में रहते हैं और हर दिन महिलाओं के सम्मान की बात करते हैं। हम कहते हैं कि महिला देवी के समान है। ऐसे में भारत सरकार की एक कंपनी की ओर से यह महिला गरिमा का अपमान है। ———— ये खबर भी पढ़ें… सुप्रीम कोर्ट बोला- महिलाएं होममेकर नहीं, राष्ट्र निर्माता हैं:सड़क दुर्घटना केस में कहा- उनके श्रम की कीमत ₹30 हजार महीना सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ऐतिहासिक फैसला में कहा, ‘सड़क हादसे में गृहिणियों की मौत होने पर उनके द्वारा की जाने वाली परिवार की देखभाल और घरेलू काम की कीमत कम से कम ₹30 हजार प्रति महीना (₹3.6 लाख सालाना) मानी जाएगी।’ पूरी खबर पढ़ें…
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