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हिमाचल आपदा स्टोरी : हिमाचल प्रदेश की वादियों में बसे देवी-देवता और ऋषि-मुनियों के पावन स्थल आज असंतुलन की मार झेल रहे हैं. बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप, अंधाधुंध विकास और देवनीति में राजनीति की घुसपैठ ने यहां की प्…और पढ़ें
मंडी. हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के इतिहासकार और देवनीति से गहराई से जुड़े स्थानीय निवासी आकाश शर्मा का मानना है कि मंडी और कुल्लू जैसे क्षेत्रों में प्राचीन समय से ही ऋषि-मुनियों और देवताओं के पावन स्थल मौजूद हैं. ये स्थल न केवल श्रद्धा के केंद्र रहे हैं, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं से लोगों की रक्षा करने का भी विश्वास जगाते आए हैं. लेकिन इंसान द्वारा की जा रही गलत गतिविधियां- जैसे पवित्र भूमि पर अनुचित निर्माण और अंधाधुंध शोषण-देवताओं को रुष्ट कर रही हैं. यही कारण है कि अब वे प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में पीछे हटते प्रतीत हो रहे हैं.
देवनीति में राजनीति की घुसपैठ
आकाश शर्मा ने बताया कि जो देवनीति पहले पूरी तरह पवित्र और लोकहितकारी हुआ करती थी, उसमें अब राजनीति का असर दिखने लगा है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण बिजली महादेव में रोपवे निर्माण को लेकर उभरे विवाद हैं, जहां देवनीति की अवहेलना कर राजनीतिक दबाव के चलते फैसले लिए गए. शर्मा का कहना है कि जब से देवनीति पर राजनीति हावी हुई है, तब से देवताओं की नाराज़गी और प्राकृतिक असंतुलन दोनों ही बढ़े हैं.
प्रकृति से छेड़छाड़ और विकास की अंधी दौड़
स्थानीय लोगों का कहना है कि देवता हमेशा प्रकृति से प्रेम करते हैं. लेकिन विकास की अंधी दौड़ में पहाड़ों को खोखला किया जा रहा है. पहाड़ों पर हो रही अंधाधुंध पेड़ों की कटाई, खनन और अतिक्रमण, असंवेदनशील पर्यटन परियोजनाएं, इन सबने पर्यावरण और पारिस्थितिकी में गहरा असंतुलन पैदा कर दिया है. इसके नतीजे स्वरूप न केवल प्राकृतिक आपदाएं बढ़ रही हैं बल्कि स्थानीय संस्कृति और आस्था भी चोटिल हो रही है.
चिंता और चेतावनी
इतिहासकारों और स्थानीय निवासियों की राय में यदि इंसान ने अपनी हरकतों पर लगाम नहीं लगाई तो देवताओं का आशीर्वाद मिलना कठिन हो जाएगा. यह न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से बल्कि पर्यावरणीय और सामाजिक दृष्टि से भी बेहद चिंताजनक स्थिति है. देवताओं की आस्था से जुड़े इन पावन स्थलों की रक्षा करना और प्रकृति का सम्मान करना अब सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है.

