Thursday, May 28, 2026
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सिर्फ़ स्वाद नहीं, प्रेरणा भी परोसते हैं सोनी जी! रायगढ़ में हिम्मत की मिसाल


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Raigarh sony ji ki kahani: हादसे में एक हाथ खो देने के बावजूद सोनी जी ने हिम्मत नहीं हारी. पिछले 24–25 वर्षों से वे नटवर स्कूल के सामने चटपटा ठेला लगाकर मुर्रा, भेल और फल्ली बेचते हैं. रोज़ाना 700–800 रुपये कमाकर वे अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं. उनकी कहानी संघर्ष, जज़्बे और आत्मनिर्भरता की प्रेरक मिसाल है.

रायगढ़. कहते हैं कि जीवन में कठिनाइयां इंसान को तोड़ देती हैं या फिर वही कठिनाइयां उसे गढ़ देती हैं, ऐसा ही कुछ शहर के नटवर स्कूल के सामने हर शाम लगने वाले सोनी जी के चटपटा ठेले की कहानी में दिखाई देता है. लगभग 24–25 वर्ष पहले गन्ना रस निकालते समय मशीन में हाथ फँस जाने से उनका एक हाथ का अगला हिस्सा कट गया था. यह हादसा किसी के लिए भी जीवन की गति थाम देने वाला हो सकता था, परंतु सोनी जी ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि हिम्मत और आत्मविश्वास को अपना साथी बनाकर नई शुरुआत की. नटवर स्कूल के सामने लगा यह चटपटा ठेला सिर्फ स्वाद का ठिकाना नहीं, बल्कि हिम्मत, संघर्ष और आत्मनिर्भरता की कहानी सुनाने वाली एक अनोखी मिसाल भी है.

दिव्यांगता को दरकिनार कर पाल रहे परिवार
दिव्यांगता के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी.  उन्होंने ठेले पर मुर्रा, भेल, फल्ली दाना और अन्य चटपटी चीजें बनाकर बेचने का काम शुरू किया. धीरे-धीरे उनके हाथ की बनी चटपटे स्वाद की चीजें लोगों की पसंद बन गईं. आज भी जैसे ही शाम होती है, नटवर स्कूल के सामने उनके ठेले पर भीड़ उमड़ पड़ती है.  बच्चों से लेकर युवाओं और बुजुर्गों तक, सभी उनके ठेले पर मिलने वाले स्वाद का आनंद लेने पहुंचते हैं.

दूसरों पर बोझ नहीं

अपनी लगन और मेहनत के बल पर सोनी जी रोज़ाना 700–800 रुपये कमाकर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं. आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने कभी किसी पर बोझ बनने का विचार नहीं किया. अपने एक हाथ से ही वे ठेला चलाते हैं, सामग्री तैयार करते हैं और ग्राहकों की सेवा करते हैं. उनकी कार्यशैली देखकर किसी को भी अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि उन्होंने जीवन में इतनी बड़ी चोट झेली होगी.

सोनी जी की कहानी सिर्फ संघर्ष की नहीं, बल्कि प्रेरणा की भी है. उन्होंने यह साबित कर दिया कि शारीरिक कमी जीवन की रफ़्तार नहीं रोक सकती, यदि मन में हिम्मत और जज्बा हो. कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए भी मुस्कुराकर लोगों की सेवा करना और अपने परिवार का सहारा बनना—यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है.

Amit Singh

7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें

7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह… और पढ़ें

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