Wednesday, April 22, 2026
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Explainer: हर बार जनगणना के बाद क्यों परिसीमन, क्या इससे बढ़ती हैं संसद सीटें


भारत में जनगणना 2026 की शुरुआत हो चुकी है. ये काम दो चरणों में अगले साल तक चलेगा. जनगणना के बाद परिसीमन होता है. इसकी वजह ये बताई जाती है कि इससे हर वोटर के वोट की वैल्यू बनी रहती है. साथ ही जनसंख्या के बदलते हालात के अनुसार लोकसभा और विधानसभा सीटों का न्यायपूर्ण बंटवारा हो सके. परिसीमन का मतलब होता है निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से ठीक करना. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना भी होता है कि हर निर्वाचन क्षेत्र में लोगों की संख्या करीब बराबर रहे.

भारत में जनगणना का पहला चरण आधिकारिक तौर पर 1 अप्रैल 2026 से शुरू हो चुका है. ये 30 सितंबर 2026 तक चलेगा. पूरे देश के लिए इसकी एक सामान्य समय-सीमा तय की गई है, लेकिन अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फील्ड वर्क के लिए अलग-अलग 30-दिवसीय स्लॉट दिए गए हैं.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत हर जनगणना के बाद संसद से परिसीमन अधिनियम बनाया जाता है. एक परिसीमन आयोग गठित होता है. जनगणना ही ऐसा आधिकारिक, विस्तृत और विश्वसनीय डेटा होता है जो यह बताता है कि हर राज्य, ज़िले और ब्लॉक में आबादी कितनी बढ़ी या घटी, इसी डेटा के आधार पर सीटों की संख्या और सीमाएं तय होती हैं. आइए जानते हैं इस बारे में सारी बातें सवाल और जवाब के फारमेट में

परिसीमन क्या होता है?

– परिसीमन का सीधा अर्थ है चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करना. भारत में लोकसभा और विधानसभा की सीटें भौगोलिक क्षेत्रों में बंटी होती हैं. समय के साथ उनकी जनसंख्या बदलती है, कहीं तेजी से बढ़ती है, कहीं धीमी. ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि हर सांसद या विधायक लगभग बराबर संख्या के लोगों का प्रतिनिधित्व करे. इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए परिसीमन किया जाता है. भारत में यह काम एक स्वतंत्र संस्था भारतीय परिसीमन आयोग यानि डिलिमिटेशन कमीशन ऑफ इंडिया करती है.

परिसीमन जनगणना के बाद ही क्यों होता है?

परिसीमन का आधार जनसंख्या है. जनसंख्या का सबसे विश्वसनीय आंकड़ा जनगणना से मिलता है. भारत में हर 10 साल में जनगणना होती है, जो बताती है कि किस क्षेत्र में कितने लोग रहते हैं. अगर बिना नए आंकड़ों के परिसीमन किया जाए, तो प्रतिनिधित्व असमान हो जाएगा. उदाहरण के तौर पर किसी शहर में जनसंख्या तेजी से बढ़ गई हो जबकि किसी ग्रामीण क्षेत्र में स्थिर या कम हो गई हो. ऐसी स्थिति में पुराने निर्वाचन क्षेत्र न्यायसंगत नहीं रह जाते. इसलिए जनगणना के बाद परिसीमन एक तरह से “लोकतांत्रिक रीसेट” होता है.

क्या हर जनगणना के बाद सीटों की संख्या भी बढ़ती है?

– यह एक आम भ्रम है. हर बार सीटों की संख्या नहीं बढ़ती बल्कि अधिकतर मामलों में केवल सीमाएं बदली जाती हैं. भारत में संसद की कुल सीटें बढ़ाने या घटाने का अधिकार केवल संसद को है, ये संविधान संशोधन से होता है. हालांकि शुरुआती दशकों में 1950 से 1970 के बीच जनसंख्या वृद्धि के अनुसार लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाई गई थी लेकिन बाद में इस पर रोक लगा दी गई.

सीटों की संख्या बढ़ाने पर रोक क्यों लगी?

1970 के दशक में एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक सवाल उठा. दक्षिण भारत के कई राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई, जबकि उत्तर भारत के राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी. अगर केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ाई जातीं, तो उत्तर भारत के राज्यों की राजनीतिक ताकत बहुत बढ़ जाती
और दक्षिण भारत के राज्यों को “सजा” मिलती, जबकि उन्होंने परिवार नियोजन अपनाया था. इसी असंतुलन को रोकने के लिए 1976 में भारतीय संसद ने एक बड़ा फैसला लिया – लोकसभा सीटों की संख्या को “फ्रीज” कर दिया गया.

यह “फ्रीज” कब तक के लिए था?

शुरुआत में ये फ्रीज 2001 तक के लिए था. बाद में इसे बढ़ाकर 2026 तक कर दिया गया. इसका मतलब ये है कि 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों की संख्या तय रही लेकिन परिसीमन 2001 और 2011 के आंकड़ों के आधार पर किया गया. यानी सीटों की संख्या वही रखते हुए बस निर्वाचन क्षेत्रों की अंदर की सीमाएं बदली गईं.

परिसीमन से सीटें बढ़ती हैं – यह धारणा कहां से आती है?

– ये धारणा इसलिए बनती है क्योंकि लोग परिसीमन और सीटों की संख्या बढ़ाने को एक ही चीज मान लेते हैं. असल में दो अलग बातें हैं – परिसीमन केवल सीमाएं बदलता है. सीटों की संख्या बढ़ाने का काम संविधान संशोधन से होता है. हालांकि 2026 के बाद जब फ्रीज खत्म होगा, तब सीटों की संख्या बढ़ सकती है. इसी संभावना के कारण यह धारणा मजबूत हुई है.

2026 के बाद क्या बदल सकता है?

दरअसल 2026 एक ऐसा मोड़ है, जिसके बाद नई जनगणना यानि मौजूदा जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या फिर से तय की जा सकती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पूरी तरह जनसंख्या के अनुपात पर सीटें बढ़ाई गईं, तो उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की सीटें काफी बढ़ सकती हैं जबकि तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों की हिस्सेदारी घट सकती है. ये एक बड़ा राजनीतिक विवाद भी बन सकता है.

परिसीमन कैसे किया जाता है? इसकी प्रक्रिया क्या है?

परिसीमन की प्रक्रिया काफी तकनीकी और संवेदनशील होती है. इन आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव हो सकता है.
– हर सीट पर लगभग बराबर जनसंख्या हो
– भौगोलिक निरंतरता बनी रहे
– प्रशासनिक सीमाओं का सम्मान हो
– अनुसूचित जाति औऱ जनजाति के लिए आरक्षित सीटों का सही निर्धारण रहे
इस आयोग का फैसला अंतिम होता है, इसे अदालत में चुनौती भी नहीं दी जा सकती.

क्या परिसीमन का राजनीति पर असर पड़ता है?

– बिलकुल. इसका बहुत गहरा असर पड़ता है. परिसीमन के बाद कई नेताओं के पारंपरिक सुरक्षित क्षेत्र बदल जाते हैं, नए क्षेत्र बनते हैं, जहां नई राजनीतिक संभावनाएं पैदा होती हैं. जातीय और सामाजिक समीकरण बदल जाते हैं. इसीलिए राजनीतिक दल परिसीमन को बहुत गंभीरता से लेते हैं.

क्या भारत के संविधान में परिसीमन का प्रावधान है?

– हां परिसीमन का स्पष्ट प्रावधान संविधान में किया गया है. संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत हर जनगणना के बाद परिसीमन का प्रावधान है. संसद को ये अधिकार है कि वह इसके लिए कानून बनाए. इसी के तहत समय-समय पर परिसीमन आयोग गठित किए जाते हैं.

भारत में अब तक कितनी बार परिसीमन हुआ है?

भारत में अब तक चार प्रमुख परिसीमन हो चुके हैं. ये 1952, 1963, 1973 और 2002 (जिसके आधार पर 2008 में लागू हुआ) हो चुके हैं.

क्या भविष्य में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ेगी?

– संभावना बहुत मजबूत है. आज भारत की जनसंख्या 140 करोड़ के पार है, लेकिन लोकसभा में केवल 543 निर्वाचित सदस्य हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में लोकसभा की सीटें 700 – 850 तक बढ़ सकती हैं. इसके लिए संसद भवन का नया ढांचा भी इसी संभावना को ध्यान में रखकर बनाया गया है.

क्या परिसीमन केवल संसद के लिए होता है?

– नहीं, परिसीमन लोकसभा के साथ-साथ राज्य विधानसभाओं के लिए भी होता है. हर राज्य में विधानसभा सीटों की सीमाएं भी इसी प्रक्रिया के तहत तय की जाती हैं. इससे राज्य स्तर पर भी समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है.



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