Monday, May 11, 2026
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वेस्ट एशिया की जंग भारत की मेहनत पर फेरेगी पानी! 25 लाख लोग गरीबी के मुहाने पर


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भारत ने पिछले कुछ वर्षों में करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का दावा किया है, लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव इस पूरी आर्थिक कहानी को झटका दे सकता है. कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, महंगाई और बढ़ते ट्रांसपोर्ट खर्च का असर सबसे ज्यादा उन परिवारों पर पड़ सकता है जो अभी हाल ही में गरीबी रेखा से ऊपर आए हैं. अगर हालात लंबे समय तक बिगड़े रहे तो लाखों लोग फिर आर्थिक संकट में फंस सकते हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान और इजरायल के बीच तनाव केवल भू राजनीति का मामला नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर भारत की जेब, रोजगार और विकास योजनाओं पर पड़ सकता है. 

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भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है. (AI)

नई दिल्ली. भारत पिछले कुछ वर्षों से दुनिया के सामने खुद को तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था के तौर पर पेश कर रहा है. नीति आयोग (NITI Aayog) के मुताबिक बीते करीब 9 साल में 25 करोड़ से ज्यादा लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले हैं. गांवों में बिजली, मुफ्त राशन, बेहतर सड़कें और डिजिटल योजनाओं ने करोड़ों परिवारों की जिंदगी बदली है. लेकिन अब पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव इस पूरी कहानी को बड़ा झटका दे सकता है. ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते संघर्ष ने दुनिया भर के बाजारों को चिंता में डाल दिया है. सबसे बड़ा डर कच्चे तेल की कीमतों को लेकर है. अगर ब्रेंट क्रूड 100 से 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचता है तो भारत जैसे तेल आयात पर निर्भर देश के लिए मुश्किलें तेजी से बढ़ सकती हैं. इसका असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाने पीने की चीजों से लेकर रोजगार तक हर क्षेत्र प्रभावित हो सकता है.

भारत में बड़ी संख्या ऐसे परिवारों की है जो हाल के वर्षों में गरीबी रेखा से थोड़ा ऊपर पहुंचे हैं. उनकी आमदनी अभी भी बहुत मजबूत नहीं मानी जाती. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी यूएनडीपी (UNDP) पहले ने चेतावनी दी है कि गरीबी दर में मामूली बढ़ोतरी भी लाखों लोगों को फिर संकट में धकेल सकती है. UNDP के मुताबिक, अगर हालात नहीं सुधरे तो भारत में गरीबी दर 23.9% से बढ़कर 24.2% हो सकती है. इसका मतलब है कि करीब 25 लाख और लोग गरीबी रेखा के नीचे आ सकते हैं. इससे देश में कुल गरीबों की संख्या 35.4 करोड़ तक पहुंच सकती है. अगर महंगाई तेजी से बढ़ती है तो सबसे पहले असर इन्हीं परिवारों पर पड़ता है. रसोई गैस, दूध, सब्जी, ट्रांसपोर्ट और किराए का खर्च बढ़ते ही उनका पूरा बजट बिगड़ जाता है. यानी जिन परिवारों ने अभी हाल में आर्थिक राहत महसूस की थी, वे दोबारा मुश्किल हालात में पहुंच सकते हैं.

तेल महंगा हुआ तो हर चीज होगी महंगी

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है. ऐसे में पश्चिम एशिया में कोई भी बड़ा संकट सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डालता है. अगर तेल महंगा होता है तो ट्रक, ट्रेन और शिपिंग का खर्च बढ़ता है. इसका असर नमक, आटा, दाल, सब्जी, सीमेंट और कपड़ों तक हर चीज पर दिखाई देता है. विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कीमतों में लगातार उछाल सरकार के लिए भी बड़ा सिरदर्द बन सकता है. सरकार को गरीबों के लिए राशन और सब्सिडी पर ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ सकता है. इससे इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास परियोजनाओं के लिए उपलब्ध बजट पर दबाव बढ़ेगा.

इंडस्ट्रियल हब में बढ़ सकता है तनाव

नोएडा, मानेसर, तिरुपुर और सूरत जैसे इंडस्ट्रियल इलाकों में पहले से लागत बढ़ने का दबाव महसूस किया जा रहा है. कंपनियां महंगे कच्चे माल और कमजोर डिमांड के बीच खर्च घटाने की कोशिश कर रही हैं. कई जगह ओवरटाइम कम किए जा रहे हैं और बोनस रोकने की चर्चा है. ऐसे हालात लंबे समय तक बने रहे तो श्रमिक असंतोष बढ़ सकता है. इससे उत्पादन और सप्लाई चेन पर असर पड़ेगा. भारत की मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ के लिए यह बड़ा खतरा माना जा रहा है.

आम आदमी की जेब पर डबल मार

महंगाई का सबसे बड़ा असर आम आदमी की खरीद क्षमता पर पड़ता है. जो पैसा पहले लोग मोबाइल, कपड़े, बाइक या बाहर खाने पर खर्च करते थे, वह अब पेट्रोल और जरूरी सामान में चला जाता है. इससे बाजार में मांग घटती है. जब मांग कम होती है तो फैक्ट्रियां उत्पादन घटाती हैं. उत्पादन घटने पर रोजगार पर असर पड़ता है. यही स्थिति धीरे-धीरे आर्थिक दुष्चक्र का रूप ले सकती है, जहां कमाई और खर्च दोनों कमजोर होने लगते हैं.

भारत के लिए सिर्फ विदेश नीति का मामला नहीं

पश्चिम एशिया का संकट अब सिर्फ भू राजनीति या कूटनीति का मुद्दा नहीं रह गया है. भारत के लिए यह सीधा आर्थिक और सामाजिक चुनौती बनता जा रहा है. सरकार ने पिछले कई सालों में गरीबी कम करने, मिडिल क्लास बढ़ाने और खपत मजबूत करने पर बड़ा जोर दिया है. लेकिन अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं और वैश्विक तनाव बढ़ता है, तो इसका असर भारत की विकास दर, रोजगार और गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति पर साफ दिखाई दे सकता है.

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जय ठाकुरSenior-Sub Editor

मैं जय ठाकुर, न्यूज18 हिंदी में सीनियर सब-एडिटर के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहा हूं. मेरा मुख्य काम बिजनेस की पेचीदा खबरों को आसान भाषा में लोगों तक पहुंचाना है. फिर चाहे वह शेयर बाजार की हलचल हो, देश की इकोनॉमी क…और पढ़ें



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