Wednesday, September 16, 2026
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26 बीघा जमीन 6.95 करोड़ में बिक्री, सिर्फ 72 लाख पेमेंट, द‍िल्‍ली HC का फैसला


दिल्ली के नजफगढ़ की 26 बीघा जमीन. चार महिलाएं इसकी बराबर की हिस्सेदार थीं. जमीन बिकी तो कीमत लगी 6.95 करोड़ रुपये. लेकिन चार हिस्सों में से एक हिस्सेदार को उसके हिस्से की पूरी रकम नहीं मिली. उसके खाते में करीब 72 लाख रुपये पहुंचे. बाकी करीब 1.01 करोड़ रुपये कहां गए, यही सवाल कई साल तक चलता रहा और आखिरकार दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुंच गया. अब कोर्ट ने जीजा को 1,01,78,074 रुपये और उस पर 8 फीसदी सालाना ब्याज देने का आदेश दिया है.

मामला करीब चार दशक पुराना है. टाइम्‍स ऑफ इंड‍िया की र‍िपोर्ट के मुताबिक, 29 मार्च 1985 को एक महिला ने अपनी तीन जेठानियों या देवरानियों के साथ मिलकर नजफगढ़ में 26 बीघा जमीन खरीदी थी. रजिस्टर्ड सेल डीड में चारों महिलाओं का नाम था और सभी की जमीन में एक-चौथाई हिस्सेदारी थी. यानी जमीन पर किसी एक का पूरा मालिकाना हक नहीं था. चारों का हिस्सा बराबर था. बाद में जमीन का म्यूटेशन भी हुआ और संबंधित महिला के नाम एक-चौथाई अविभाजित हिस्सा दर्ज किया गया.

इसी दिन एक और दस्तावेज तैयार हुआ, जिसने आगे चलकर इस पूरे विवाद में सबसे अहम भूमिका निभाई. संबंधित महिला उस समय पश्चिम बंगाल में रहती थीं, जबकि उनके भाई-इन-लॉ यानी जीजा दिल्ली में रहते थे. इसलिए उन्होंने अपने जीजा के नाम एक जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी यानी GPA कर दी. इसका मतलब था कि जीजा उनकी ओर से जमीन की देखरेख और उससे जुड़े काम कर सकते थे. GPA में जमीन को बेचने, ट्रांसफर करने और गिफ्ट करने जैसी शक्तियां भी दी गई थीं.

GPA का इस्‍तेमाल हुआ

कई साल बाद 2011 में इसी GPA का इस्तेमाल हुआ. चारों हिस्सेदारों की जमीन एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी को बेच दी गई. 11 अप्रैल 2011 को रजिस्टर्ड सेल डीड हुई और पूरी 26 बीघा जमीन की कीमत 6.95 करोड़ रुपये तय हुई. तीन महिला मालिकों ने अपने स्तर पर दस्तावेजों पर कार्रवाई की, जबकि चौथी महिला की तरफ से उनके जीजा ने GPA धारक के रूप में सौदा किया. यहीं से विवाद की शुरुआत हुई.

गणित बिल्कुल सीधा था. जमीन में महिला की हिस्सेदारी 25 फीसदी थी. 6.95 करोड़ रुपये का एक-चौथाई हिस्सा करीब 1.73 करोड़ रुपये बैठता था. लेकिन महिला के खाते में सिर्फ 71.99 लाख रुपये पहुंचे. यानी करीब 1.01 करोड़ रुपये की रकम बाकी रह गई. खास बात यह थी कि महिला को जमीन की बिक्री की पूरी जानकारी पहले से नहीं थी. उन्हें तब पता चला जब उनके खाते में करीब 72 लाख रुपये ट्रांसफर किए गए.

मह‍िला पहुंच गई कोर्ट

महिला ने अपने हिस्से की बाकी रकम के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की. लेकिन इस बीच उनकी मौत हो गई. उन्होंने कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी. इसके बाद उनकी तीन बेटियों ने उनकी जगह यह कानूनी लड़ाई जारी रखी. मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या GPA के आधार पर जीजा खुद जमीन का मालिक बन गया था या वह सिर्फ महिला की तरफ से काम करने वाला एजेंट था?

जीजा की तरफ से दावा किया गया कि असल में जमीन उन्होंने और उनकी पत्नी ने अपने पैसों से खरीदी थी. महिलाओं के नाम सिर्फ सुविधा के लिए रखे गए थे. उन्होंने GPA में मौजूद जमीन को गिफ्ट करने की शक्ति का भी हवाला दिया और यह तर्क देने की कोशिश की कि इससे उनका जमीन पर अधिकार साबित होता है. लेकिन हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया.

कोर्ट ने क‍िन दस्‍तावेजों को महत्‍वपूर्ण माना

कोर्ट ने पुराने रजिस्टर्ड दस्तावेजों को सबसे महत्वपूर्ण माना. सेल डीड में चारों महिलाओं को जमीन का मालिक और भूमिधर बताया गया था. वहीं जीजा को साफ तौर पर GPA धारक के रूप में दर्ज किया गया था. कोर्ट ने कहा कि रजिस्टर्ड दस्तावेजों में जो दर्ज है, उसे सिर्फ सामान्य दावों के आधार पर पलटा नहीं जा सकता. जीजा यह साबित करने के लिए भी पर्याप्त सबूत नहीं दे सके कि जमीन खरीदने का पूरा पैसा उन्होंने और उनकी पत्नी ने लगाया था.

आयकर रिटर्न भी इस मामले में महत्वपूर्ण साबित हुआ. कोर्ट ने पाया कि जमीन की बिक्री से मिले 6.95 करोड़ रुपये पर बनने वाला पूरा कैपिटल गेन जीजा के ITR में नहीं दिखाया गया था. कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि अगर वास्तव में पूरा पैसा जीजा ने लगाया था, तो किसी दूसरे के नाम जमीन खरीदने की बात को साबित करने के लिए ठोस दस्तावेज होने चाहिए थे. सिर्फ यह कहना कि पैसा उन्होंने दिया था, पर्याप्त नहीं माना गया.

अब आता है 71.99 लाख रुपये का दूसरा पेच. जीजा ने दावा किया कि यह रकम महिला को जमीन बेचने के बदले नहीं दी गई थी, बल्कि उन्होंने उसे ब्याज मुक्त दोस्ताना कर्ज के रूप में पैसा दिया था. लेकिन इस दलील को भी कोर्ट ने नहीं माना. एक पुलिस शिकायत के जवाब में जीजा ने खुद लिखा था कि उन्होंने करीब 72 लाख रुपये की रकम तीनों बहनों के खातों में लगभग उसी समय जमा की थी. वहां उन्होंने इसे कर्ज के तौर पर पेश नहीं किया था.

आईटीआर में कहां से आया ज‍िक्र

दूसरी तरफ महिला ने अपने ITR में 71.99 लाख रुपये को जमीन की बिक्री से मिले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन के रूप में दिखाया था और उस पर टैक्स भी चुकाया था. अगर यह वास्तव में कर्ज होता, तो उसके समर्थन में कोई प्रॉमिसरी नोट या दूसरा दस्तावेज भी नहीं मिला. पैसे के ट्रांसफर को लेकर भी अलग-अलग बातें सामने आईं. इन सब कारणों से कोर्ट ने कर्ज वाली दलील को टिकाऊ नहीं माना.

दिल्ली हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2012 के सूरज लैंप एंड इंडस्‍ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम स्‍टेट ऑफ हरियाणा फैसले का भी सहारा लिया. इसमें साफ किया गया था कि GPA अपने आप जमीन का मालिकाना हक ट्रांसफर नहीं करता. GPA किसी व्यक्ति को मालिक की तरफ से काम करने का अधिकार देता है. यानी यहां जीजा जमीन के मालिक नहीं, बल्कि अपनी भाभी की तरफ से काम करने वाले एजेंट थे.

इसके बाद भारतीय कॉन्ट्रैक्ट एक्ट की धारा 218 भी महत्वपूर्ण हो गई. इस प्रावधान के मुताबिक एजेंट को अपने प्रिंसिपल यानी मालिक की ओर से मिली रकम का हिसाब देना होता है और मालिक को उसका हिस्सा देना होता है. चूंकि जीजा ने महिला की ओर से जमीन की बिक्री में भूमिका निभाई थी, इसलिए कोर्ट ने माना कि उन्हें महिला के हिस्से की पूरी रकम देनी होगी.

अदालत ने क्‍या फैसला सुनाया

अदालत ने हिसाब भी साफ कर दिया. 6.95 करोड़ रुपये की बिक्री में महिला का एक-चौथाई हिस्सा करीब 1.73 करोड़ रुपये था. इसमें से 71.99 लाख रुपये पहले ही मिल चुके थे. इसलिए 1,01,78,074 रुपये की रकम अभी बाकी थी. दिल्ली हाई कोर्ट ने अब यही रकम उनकी बेटियों को देने का आदेश दिया है. इसके साथ 11 अप्रैल 2011 यानी जमीन की बिक्री की तारीख से भुगतान होने तक 8 फीसदी सालाना ब्याज भी देना होगा.

इस मामले की सबसे अहम बात यह है कि सिर्फ GPA हाथ में होने से कोई व्यक्ति जमीन का मालिक नहीं बन जाता. GPA किसी को मालिक की ओर से काम करने का अधिकार दे सकती है, लेकिन बिक्री से मिली रकम का हिसाब देना उसकी जिम्मेदारी बनी रहती है. इस मामले में रजिस्टर्ड सेल डीड, GPA, बैंक ट्रांजैक्शन, ITR और पहले दिए गए जवाब जैसे दस्तावेजों ने कोर्ट को यह तय करने में मदद की कि 26 बीघा जमीन की बिक्री की रकम में किसका कितना हिस्सा था.



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