बरसात के मौसम खत्म होने को है और विंध्य-बघेलखंड के गांवों में खेतों की मेड़, खाली जमीन, नमी वाली जगहों और रास्तों के किनारे अपने आप उगने वाली रानभाजियां अब लोगों की रसोई में पहुंचने लगी हैं. इन्हीं पारंपरिक भाजियों में कनकौआ भी शामिल है. गांवों में इसे आज भी बड़े चाव से खाया जाता है. खास बात यह है कि इसे उगाने के लिए न तो खेत तैयार करना पड़ता है और न ही अलग से बीज बोने की जरूरत होती है. बारिश के दिनों में यह प्राकृतिक रूप से बहुतायत में दिखाई देती है.
न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।

