नई दिल्ली3 घंटे पहले
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तस्वीर कल्याण-डोंबिवली नगर निगम (KDMC) के शास्त्री नगर अस्पताल की है।
सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों और सरकारी कर्मचारियों पर बढ़ते हमलों को लेकर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि कानून का सम्मान करने की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा जनता के चुने हुए नेता की होती है। उनके पद की ताकत कभी भी कानून से ऊपर नहीं हो सकती।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह टिप्पणी शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे और तीन अन्य की जमानत रद्द करते हुए की।
इन तीनों पर ठाणे के एक म्युनिसिपल हॉस्पिटल के डॉक्टरों से मारपीट और गाली-गलौज का आरोप है।
28 सितंबर के आदेश में कोर्ट ने सभी आरोपियों को 5 अक्टूबर तक सरेंडर करने का निर्देश दिया है।
पहले देखें जुलाई में हुई घटना की 4 तस्वीरें…

पार्षद रमेश ने पहले हॉस्पिटल में मौजूद स्टाफ से बहस की, फिर गला पकड़कर मारने लगे।

पार्षद के साथ आए तीन लोगों ने स्टाफ को थप्पड़ और घूसे मारे।

पार्षद थप्पड़ और घूसे मारते रहे, बाकी लोग उन्हें रोक रहे थे।

महिला डॉक्टर किसी को फोन करने लगी तो पार्षद ने फोन छीन लिया।
कोर्ट बोला- ऐसे मामलों से समाज की शांति भंग होती है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निर्वाचित प्रतिनिधि पर कानून का सम्मान करने और संस्थाओं में लोगों का भरोसा मजबूत करने की ज्यादा जिम्मेदारी होती है। निर्वाचित पदों पर बैठे लोगों में आम जनता और सरकारी कर्मचारियों से निपटने में बल, धमकी या गैरकानूनी तरीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। देश के कई हिस्सों से ऐसे मामले सामने आए हैं।
बेंच ने कहा कि मौजूदा घटना को अकेली घटना मानकर नहीं देखा जा सकता। ऐसे मामलों से समाज की शांति और स्थिरता पर बुरा असर पड़ता है। कोर्ट ने बताया कि म्हात्रे के केस के बाद महाराष्ट्र के पालघर में भी शिवसेना नेताओं से जुड़ी ऐसी ही घटना सामने आई थी।

सुप्रीम कोर्ट की 6 टिप्पणियां…
- ड्यूटी कर रहे डॉक्टरों को डराने या उन पर हमला करने की कोई कोशिश बर्दाश्त नहीं की जा सकती। खासकर तब, जब आरोपी, जनता का चुना हुआ कोई नेता हो।
- सार्वजनिक पद की वैधता आदेश देने की ताकत से नहीं, बल्कि कानून की सीमा में रहने और देश की सेवा करने की जिम्मेदारी से तय होती है।
- संवैधानिक लोकतंत्र में यह अंतर हमेशा कायम रहना चाहिए। लोकतंत्र चुनाव के जरिए ताकत देता है, लेकिन उसका इस्तेमाल कानून के अनुशासन के तहत ही होना चाहिए।
- जनता के स्वास्थ्य के हित में अपनी ड्यूटी निभा रहे मेडिकल प्रोफेशनल्स को डराना या उन पर हमला करना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। चाहे वह कोई नेता हो, या न हो।”
- निर्वाचित प्रतिनिधि का काम जनता की सेवा करना और शिकायतों व न्याय से जुड़ी संस्थाओं को मजबूत करना है। वह पुलिस, प्रशासन या अदालत की भूमिका खुद नहीं निभा सकता।
- डर या धमकी के जरिए अपनी निजी पहुंच से किसी से काम कराने की कोशिश का असर केवल पीड़ित तक सीमित नहीं रहता। इससे कानून के शासन में लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है।

डॉक्टरों पर हमले चिंताजनक और गंभीर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह चिंता तब और गंभीर हो जाती है, जब ऐसे व्यवहार का सामना मेडिकल प्रोफेशनल्स को करना पड़ता है। ये डॉक्टर लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की देखभाल की जिम्मेदारी निभाते हैं। ऐसे काम में संयम और तत्काल सही निर्णय जरूरी होता है।
बेंच ने कहा कि अस्पताल में डर-असुरक्षा का माहौल केवल संबंधित डॉक्टर को प्रभावित नहीं करता। इससे मरीजों के इलाज की व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। जो लोग दूसरों के स्वास्थ्य की रक्षा की जिम्मेदारी निभाते हैं, उन्हें खुद डर, धमकी या आशंका के माहौल में काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी हिंसा सार्वजनिक पद से जुड़ी उस जिम्मेदारी को भी कमजोर करती है, जिसके तहत कानून के शासन को मजबूत करना होता है।
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