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Bihar Famous Mithai Peedukiya: बिहार की रसोई में जब पारंपरिक मिठाइयों की बात होती है, तो पीड़ुकिया का नाम खास तौर पर लिया जाता है. त्योहार हो, शादी-विवाह का अवसर हो या फिर थावे वाली माता रानी का दरबार, इस मिठाई की मौजूदगी स्वाद के साथ परंपरा का भी अहसास कराती है. इस मिठाई की कहानी महज एक पारंपरिक व्यंजन तक सीमित नहीं है. इतिहास और पुरातत्व से जुड़े कुछ संदर्भ इस मिठाई की जड़ों को सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ने का दावा करते हैं.
खास बात यह है कि लखीसराय संग्रहालय में संरक्षित 12वीं शताब्दी की एक मूर्ति में अर्धचंद्राकार मिठाई जैसी आकृति दिखाई देने की बात कही जाती है. इसे पीड़ुकिया या गुजिया से मिलता-जुलता माना जाता है. हाथ में मौजूद उस मिठाई को देखकर पहला ख्याल पीड़ुकिया का ही आता है.
बिहार के गोपालगंज जिले में स्थित थावे मंदिर में पीड़ुकिया का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व देखने को मिलता है. यहां थावे वाली माता को पीड़ुकिया प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती है. मंदिर के आसपास पीड़ुकिया की बिक्री से जुड़ा बाजार भी लंबे समय से अपनी पहचान बनाए हुए है.
स्थानीय परंपरा और लोगों की पसंद ने इस मिठाई को बिहार की सीमाओं से बाहर भी पहचान दिलाई है. देश-विदेश में रहने वाले बिहार के लोग भी पीड़ुकिया को अपने पारंपरिक स्वाद और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़कर देखते हैं. इस तरह यह मिठाई सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि अपनेपन और लोकपरंपरा का प्रतीक भी बन गई है.
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आज आमतौर पर पीड़ुकिया बनाने के लिए मैदे या सूजी का इस्तेमाल किया जाता है. इसके भीतर खोया, चीनी और सूखे मेवों का मिश्रण भरा जाता है. हालांकि, पीड़ुकिया की पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया में समय के साथ बदलाव भी आया है. इस व्यंजन के इतिहास पर चर्चा करते हुए पटना के चर्चित साहित्यकार और ‘बिहार के व्यंजन’ पुस्तक के लेखक रविशंकर उपाध्याय बताते है कि पहले इसकी बाहरी परत बनाने के लिए जौ के आटे का इस्तेमाल किया जाता था. अंदर की भराई सूजी या खोये से तैयार की जाती थी. यानी आज जिस मिठाई को लोग मैदे की कुरकुरी परत और मीठी भराई के लिए पसंद करते हैं, उसके पुराने स्वरूप में स्थानीय अनाज की भी अहम भूमिका रही होगी.
पीड़ुकिया की ऐतिहासिक विरासत को लेकर सबसे दिलचस्प संदर्भ लखीसराय संग्रहालय में रखी एक प्राचीन मूर्ति से जुड़ा है. बिहार के व्यंजन पर काम करने वाले रविशंकर उपाध्याय बताते हैं कि यह काले पत्थर की मूर्ति 12वीं शताब्दी की है और इसमें जंभल नामक पात्र है. मूर्ति में एक हाथ में अर्धचंद्राकार आकृति दिखाई देती है, जो देखने में गुजिया या पीड़ुकिया जैसी मिठाई से मिलती-जुलती है. दूसरे हाथ में आम जैसे फल की आकृति दिखाई देती है.
रविशंकर उपाध्याय बताते हैं कि प्राचीन भारतीय मूर्तिकला में देवी-देवताओं, फलों, वृक्षों और दैनिक जीवन से जुड़ी वस्तुओं को देखा जाता है. बिहार की मूर्तिकला परंपरा में भी ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं. गणेश जी की मूर्तियों में मोदक का चित्रण इसका एक परिचित उदाहरण है. उन्होंने बताया कि पटना संग्रहालय, बिहार संग्रहालय, नालंदा संग्रहालय, बिहारशरीफ और बक्सर जैसे स्थानों के संग्रह में प्राचीन मूर्तियों और कलाकृतियों के माध्यम से बिहार की सांस्कृतिक विरासत के कई पहलू सामने आते हैं. इनमें फल, वृक्ष और धार्मिक प्रतीकों से जुड़ी कलाकृतियां अतीत के जीवन को समझने का अवसर देती हैं.

