Sunday, November 8, 2026
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एमपी सरकार ₹100 कमा रही खर्च कर रही ₹124: लाड़ली बहना का खर्च ₹22000 करोड़, विकास कार्यों पर पहले चार महीने में केवल 23% खर्च – Madhya Pradesh News




दीपावली पर प्रदेश के बाजार रोशनी से जगमगा रहे हैं, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार का खजाना वित्तीय दबाव से जूझ रहा है। सरकार की कमाई और खर्च के बीच बड़ा अंतर है। सरकार 100 रुपए कमा रही है तो करीब 124 रुपए खर्च कर रही है। इस अंतर को पूरा करने के लिए उसे लगातार बाजार से कर्ज लेना पड़ रहा है। त्योहार से ठीक पहले 3 नवंबर को सरकार ने बाजार से 4 हजार करोड़ रुपए का नया कर्ज लिया। अप्रैल से अक्टूबर के बीच वह 45 हजार करोड़ रुपए का कर्ज ले चुकी थी। सरकार का कहना है कि बाजार से लिए गए कर्ज का इस्तेमाल विकास परियोजनाओं और स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण में किया जाता है। हालांकि, वित्त विभाग के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष के शुरुआती चार महीनों में पूंजीगत व्यय के बजट का केवल 23% ही खर्च हो सका। ऐसे में सवाल है कि जब सरकार लगातार कर्ज ले रही है, तो विकास परियोजनाओं पर खर्च की रफ्तार धीमी क्यों है? दिवाली पर पढ़िए, मध्यप्रदेश सरकार के बजट में कर्ज, नियमित खर्च और विकास कार्यों की क्या स्थिति है। कमाई के हर ₹100 में से ₹45 वेतन, पेंशन और ब्याज पर सरकार के बजट पर वेतन, पेंशन और पुराने कर्ज के ब्याज का बड़ा बोझ है। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट अनुमानों के मुताबिक यह राशि सरकार की अनुमानित राजस्व प्राप्तियों ₹3,08,703 करोड़ का करीब 44.7% है। इसका सीधा मतलब यह है कि सरकार राज्य के खजाने में आने वाले हर 100 रुपए में से करीब 45 रुपए सिर्फ अधिकारियों-कर्मचारियों की सैलरी, पेंशन और पुराने कर्जों का ब्याज भरने में ही खर्च कर देती है। हर महीने ₹4,100 करोड़ सिर्फ सब्सिडी और फ्री योजनाओं के लिए वेतन और ब्याज के अलावा, आम लोगों और किसानों से जुड़ी कल्याणकारी योजनाओं और सब्सिडी का मासिक बोझ भी बेहद भारी है। सरकार को हर महीने लाड़ली बहना, बिजली सब्सिडी और अन्य सहायता योजनाओं के लिए करीब ₹4,100 करोड़ यानी सालाना लगभग ₹49,200 करोड़ का बंदोबस्त करना पड़ रहा है। चुनाव से पहले लागू 4 बड़ी योजनाओं का ₹24,537 करोड़ का भार तत्कालीन शिवराज सरकार द्वारा चुनाव से ठीक पहले लागू की गई चार प्रमुख योजनाओं से खजाने पर इस साल ₹24,537 करोड़ का वित्तीय भार आ रहा है। विकास बजट का 77% अब भी खर्च होना बाकी सब्सिडी, वेतन, पेंशन और ब्याज के खर्च के बीच बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर बजट खर्च की रफ्तार धीमी है। सरकार ने सड़क, पुल, सिंचाई, बिजली और पेयजल जैसी परियोजनाओं के लिए ₹78,920 करोड़ का पूंजीगत व्यय बजट रखा था। लेकिन जुलाई तक इसमें से ₹17,836 करोड़ ही खर्च हुए। यानी शुरुआती चार महीनों में पूंजीगत व्यय बजट का करीब 23% खर्च हुआ, जबकि ₹61,084 करोड़ यानी 77% राशि खर्च होना बाकी थी। पिछले साल की समान अवधि की तुलना में पूंजीगत भुगतान की रफ्तार 21% कम बताई गई है। विभागवार आंकड़ों के मुताबिक, आर्थिक सेवाओं के लिए तय बजट का 31% और सामान्य सेवाओं का केवल 5.3% खर्च हुआ। एक्सपर्ट बोले- कमाई हो रही लेकिन खर्च कहीं और हो रहा अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, सरकार के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, अपने संसाधनों से कर राजस्व बढ़ाना। दूसरी, लाड़ली बहना और बिजली सब्सिडी जैसी योजनाओं के लिए हर महीने करीब ₹4,100 करोड़ का इंतजाम करना। तीसरी, विकास परियोजनाओं पर पूंजीगत खर्च की रफ्तार बढ़ाना, ताकि रोजगार और कारोबार को गति मिले। आर्थिक मामलों के जानकार राजेश जैन कहते हैं कि हाल ही में देश का GST कलेक्शन ₹2.3 लाख करोड़ रहा। इसमें मध्यप्रदेश का भी योगदान है। यानी राजस्व संग्रह हो रहा है, लेकिन सवाल यह है कि सरकार इस राशि का इस्तेमाल किन मदों में कर रही है। जैन के मुताबिक, कुछ योजनाओं का लाभ सीधे व्यक्तियों को मिलता है। ऐसी योजनाओं को आमतौर पर फ्रीबीज कहा जाता है। चुनावी वादों को पूरा करने के लिए सरकार इन योजनाओं पर बड़ी राशि खर्च कर रही है। सरकार की आमदनी का अधिक हिस्सा सड़क, बिजली, सिंचाई और अन्य बुनियादी ढांचे पर खर्च होना चाहिए। इससे प्रदेश की विकास क्षमता बढ़ सकती है। FRBM एक्ट क्या है? FRBM (राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन) अधिनियम, 2003 भारत में एक महत्वपूर्ण कानून है, जिसे सरकार के वित्तीय अनुशासन को मजबूत करने और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य सरकारी खर्चों में पारदर्शिता लाना, कर्ज के बोझ को कम करना और देश की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करना है। राज्यों के लिए कर्ज लेने की सीमा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 293(3) के तहत, केंद्र सरकार राज्यों के लिए कर्ज लेने की सीमा (नेट बॉरोइंग सीलिंग) निर्धारित करती है। सामान्य तौर पर, राज्यों को अपनी सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 3% तक कर्ज लेने की अनुमति होती है। हालांकि, विशेष परिस्थितियों या नीतिगत बदलावों के आधार पर केंद्र सरकार इसमें समय-समय पर बदलाव कर सकती है।



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