Friday, September 18, 2026
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2 कंपनियां बनाएंगी 80 वंदे भारत स्लीपर ट्रेन, 35 साल तक संभालेंगी मेंटेनेंस का भी काम


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Vande Bharat Sleeper Train : भारतीय रेलवे ने 2 सरकारी कंपनियों को वंदे भारत स्लीपर ट्रेन बनाने का ठेका दिया है. यह कंपनियां 80 स्लीपर ट्रेनें बनाने के साथ ही 35 साल तक उसके रखरखाव की जिम्मेदारी भी संभालेंगी. यह पूरा प्रोजेक्ट करीब 24 हजार करोड़ रुपये का होगा.

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भेल और टीटागढ़ रेल को वंदे भारत स्लीपर ट्रेन बनाने का जिम्मा मिला है.

नई दिल्ली. देश में जबसे वंदे भारत ट्रेन चलनी शुरू हुई है, हर कोई इसका कायल है. खासकर वंदे भारत की स्लीपर ट्रेनों का एहसास तो फ्लाइट में बैठने जैसा होता है. वैसे तो अभी वंदे भारत की स्लीपर ट्रेनें काफी कम हैं, लेकिन जल्द ही देश में हर बड़े शहर के बीच वंदे भारत की स्लीपर ट्रेनें दौड़ती नजर आएंगी. इन स्लीपर ट्रेनों को बनाने के लिए दो सरकारी कंपनियों ने हाथ मिलाया है. इन दोनों कंपनियों ने एक ज्वाइंट वेंचर तैयार किया है, जो 80 वंदे भारत स्लीपर ट्रेनसेट तैयार करेगा और 35 साल तक इनके रखरखाव की भी जिम्मेदारी संभालेगा.

दरअसल, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) और टीटागढ़ रेल सिस्टम्स लिमिटेड (TRSL) ने एक ज्वाइंट वेंचर तैयार किया है. यह दोनों कंपनियां मिलकर 80 वंदे भारत स्लीपर ट्रेनें तैयार करेंगी और 35 साल तक उनके रखरखाव की भी जिम्मेदारी निभाएंगी. इस काम के लिए दोनों कंपनियों ने 15 सितंबर को समझौता किया है, जिसके तहत जल्द ही नई कंपनी बनाने का काम शुरू हो जाएगा.

24 हजार करोड़ का होगा प्रोजेक्ट
भेल और टीटागढ़ कंसोर्टियम को दिया गया प्रोजेक्ट करीब 24 हजार करोड़ रुपये का होगा. इसमें 80 वंदे भारत स्लीपर ट्रेनों का निर्माण और उनका 35 साल तक रखरखाव शामिल है. इसका मतलब है कि इन ट्रेनों का मेंटेनेंस साल 2061 तक करना होगा. नया ज्वाइंट वेंचर दोनों कंपनियों का बराबर हिस्सेदारी वाला होगा. इसका मतलब है कि रेलवे ने इन दोनों कंपनियों को सिर्फ नई ट्रेनें बनाने की ही जिम्मेदारी नहीं सौंपी है, बल्कि उसके मेंटनेंस का जिम्मा भी दिया है. इससे रेलवे को लंबे समय तक इन ट्रेनों के रखरखाव आदि की चिंता नहीं करनी होगी.

कई हिस्सों में बंटा है कॉन्ट्रैक्ट
भेल और टीटागढ़ कंसोर्टियम का यह कॉन्ट्रैक्ट कई हिस्सों में बंटा हुआ है. 24 हजार करोड़ के इस प्रोजेक्ट में सरकारी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट और ट्रेनसेट डिपो को अपग्रेड करने का काम भी शामिल है. इसका मकसद सिर्फ ट्रेनें बनाना नहीं है, बल्कि इन ट्रेनों के ऑपरेशन से लेकर इन्फ्रा तक सभी चीजों को लंबे समय तक सपोर्ट करने का काम भी इसका ही होता है.

लंबे मेंटेनेंस से क्या होगा फायदा
प्रोजेक्ट की सबसे जरूरी चीज इसका लंबे समय तक मेंटेनेंस प्लान है. दरअसल, किसी भी नए ट्रेनसेट को लंबे समय तक रखरखाव की जरूरत होती है. अमूमन ट्रेनसेट बनाने और उसके रखरखाव का काम अलग-अलग कंपनियों को सौंपा जाता है, जिससे काम उतना बेहतर तरीके से नहीं हो पाता. इसे ध्यान में रखते हुए दोनों काम एक ही कंपनी को सौंपा गया है, ताकि निर्माण के समय ही यह ध्यान रखा जा सके कि उसका मेंटेनेंस भी उसी कंपनी को लंबे समय तक करना है. ऐसे में ट्रेनसेट बनाने वाली कंपनी क्वालिटी का खास ध्यान रखेगी.

लंबी दूरी के लिए डिजाइन है ट्रेन
वंदे भारत स्लीपर ट्रेन को खास तौर से लंबी दूरी की यात्रा के लिए डिजाइन किया गया है. यही वजह है कि इन ट्रेनों की क्वालिटी को खास बनाया जाता है. इसमें आराम, आधुनिक डिजाइन और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी जैसी चीजों पर जोर दिया जाता है. इस साल जनवरी में ही पहली स्लीपर वंदे भारत ट्रेन चलनी शुरू हुई है, जबकि अब इसे देश के कई प्रमुख शहरों को जोड़ने के लिए चलाने का लक्ष्य है. देश की पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन को इंटीग्रल कोच फैक्ट्री, चेन्नई में बनाया गया था.

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Pramod Kumar Tiwari

प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्‍वेस्‍टमेंट टिप्‍स, टैक्‍स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि…

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