Friday, April 10, 2026
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Wow Momo: 30 हजार से शुरू किया काम, अब नजर 1200 करोड़ के रेवेन्यू पर!


Wow Momo success story: कोलकाता के एक छोटे से गैरेज से शुरू हुआ सफर अब देश के कोने-कोने में अपनी खुशबू फैला रहा है. 2008 से पहले शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि 30 हजार रुपये से शुरू हुई एक छोटी-सी कोशिश एक दिन 1200 करोड़ रुपये के टर्नओवर का सपना देखेगी. यह कहानी सिर्फ मोमो बेचने की नहीं है, बल्कि उस भरोसे की है, जिसने एक साधारण से तिब्बती स्नैक को भारत का सबसे पसंदीदा फास्ट फूड ब्रांड बना दिया. सागर दरयानी (Sagar Daryani) और उनके दोस्त विनोद होमगई (Binod Kumar Homagai) ने जब अपनी पढ़ाई पूरी की, तो उनके पास कोई बड़ा बैंक बैलेंस नहीं था. थी तो केवल एक जिद्द कि कुछ अपना करना है. आज वही जिद्द वाओ मोमो के रूप में देश के 90 से ज्यादा शहरों में अपनी पहचान बना चुकी है. दिल्ली में तो लोग मोमोज़ के दीवाने हैं. अब कंपनी ने जो नया लक्ष्य रखा है, वह न केवल हैरान करने वाला है बल्कि यह भी बताता है कि अभी तो शुरुआत है.

सागर दरयानी की शुरुआती जिंदगी बहुत चमक-धमक वाली नहीं थी. कोलकाता में पले-बढ़े सागर ने सेंट जेवियर्स कॉलेज से पढ़ाई की. उनके पिता का कपड़ों का छोटा सा कारोबार था, लेकिन सागर का मन कुछ नया तलाश रहा था. कॉलेज के दिनों में ही उन्हें समझ आ गया था कि भारत में बर्गर और पिज्जा के बड़े-बड़े विदेशी ब्रांड्स तो हैं, लेकिन भारतीय स्ट्रीट फूड को अभी तक वह सम्मान नहीं मिला है. उन्होंने देखा कि हर गली-नुक्कड़ पर मोमो बिक रहे हैं, लोग उन्हें पसंद भी कर रहे हैं, लेकिन हाइजीन और ब्रांडिंग के नाम पर वहां कुछ भी नहीं था. यहीं से एक विचार ने जन्म लिया. उन्होंने अपने दोस्त विनोद से बात की और तय किया कि वे मोमो को एक ब्रांड बनाएंगे.

फाउंडर हाथ में प्लेट लेकर लोगों को चखाते थे मोमोज़

शुरुआत कठिन थी. पॉकेट मनी से बचाए गए मात्र 30 हजार रुपये लेकर उन्होंने कोलकाता के स्प्रिंगडेल स्कूल के बाहर एक छोटा सा स्टॉल लगाया. उस वक्त उनके पास न तो कोई बड़ी दुकान थी और न ही बहुत बड़ा मेन्यू. उनके पास सिर्फ दो शेफ थे, जिन्हें उन्होंने साइकल पर साथ लेकर काम शुरू किया था. सागर खुद हाथ में मोमो की प्लेट लेकर लोगों को चखने के लिए बुलाते थे. लोग शुरुआत में हिचकिचाते थे, क्योंकि वे सड़क किनारे मिलने वाले सस्ते मोमो के आदी थे. लेकिन जैसे ही उन्होंने वाओ मोमो का स्वाद चखा, कहानी बदलने लगी. सागर को आज भी याद है कि कैसे शुरुआती दिनों में वह खुद इन्वेंट्री मैनेज करते थे और शाम को हिसाब लेकर बैठते थे, ताकि अगले दिन का कच्चा माल खरीदा जा सके.

बनना था मैकडॉनल्ड्स या KFC जैसा

2008 से 2015 तक का सफर बहुत धीमा था. उन्होंने बहुत तेजी से भागने की जगह अपनी क्वालिटी पर ध्यान दिया. उनकी तरकीब थी कि ऐसी जगह चुनो, जहां फुटफॉल ज्यादा हो और वहां मोमो की ऐसी वैरायटी परोसो, जो किसी ने कभी सोची न हो. उन्होंने मोमो के साथ एक्सपेरिमेंट करना शुरू किया. चॉकलेट मोमो, मोमो बर्गर (मोबुर) और तंदूरी मोमो जैसे नए आइडियाज ने युवाओं को अपनी ओर खींच लिया. यही वजह है कि आज भी दिल्ली में भीड़-भाड़ वाले मेट्रो स्टेशनों पर वाओ मोमो का आउटलेट मिल जाता है. सागर जानते थे कि अगर उन्हें मैकडॉनल्ड्स या केएफसी जैसा बनना है, तो उन्हें अपनी सर्विस और स्वाद में एकरूपता लानी होगी. उन्होंने धीरे-धीरे कोलकाता के मॉल्स और टेक पार्क्स में अपनी जगह बनाना शुरू कर दिया.

फंडिंग मिली तो फुल स्पीड दौड़ी कंपनी

बिजनेस को असली रफ्तार तब मिली, जब कंपनी को पहली बड़ी फंडिंग मिली. बड़े इन्वेस्टर संजीव बिकचंदानी (Sanjeev Bikhchandani) ने उनकी मेहनत को पहचाना और वहां से विस्तार का दौर शुरू हुआ. संजीव बिकचंदानी इंफोएज़ के फाउंडर हैं. उन्होंने जोमैटो और पॉलिसीबाजार में भी शुरुआती तौर पर निवेश किया था. इसके बाद टाइगर ग्लोबल जैसे बड़े नाम भी साथ जुड़े.

आज यह कंपनी सिर्फ एक मोमो ब्रांड नहीं रह गई है, बल्कि इन्होंने ‘वाओ चाइना’ और ‘वाओ चिकन’ जैसे नए वर्टिकल भी शुरू कर दिए हैं. हाल ही में कंपनी ने जो आंकड़े पेश किए हैं, वे किसी को भी चौका सकते हैं. वित्त वर्ष 2026 में कंपनी ने रिकॉर्ड 200 नए आउटलेट्स खोले हैं, जो उनके अब तक के इतिहास में एक साल में सबसे ज्यादा विस्तार है. अब उनके पास देशभर में 850 से ज्यादा स्टोर हैं.

इस बार 1200 करोड़ के रेवेन्यू का टारगेट

सागर दरयानी का कहना है कि अब उनकी नजर सिर्फ महानगरों पर नहीं है. वह जानते हैं कि भारत की असली ताकत टियर-2 और टियर-3 शहरों में छिपी है. इंदौर, जयपुर, लखनऊ और पटना जैसे शहरों के लोग अब ब्रांडेड और सुरक्षित खाने की तलाश में हैं. इसी रणनीति के तहत कंपनी अगले वित्तीय वर्ष यानी 2026-27 में 150 से 200 और नए स्टोर खोलने की तैयारी कर रही है. उनका टारगेट वित्त वर्ष 2027 तक 1200 करोड़ रुपये का राजस्व (रेवेन्यू) हासिल करना है.

ग्राहकों को पेट नहीं भरना, चाहिए बढ़िया अनुभव

इस ग्रोथ के पीछे की सबसे बड़ी वजह है ग्राहकों का बदलता मिजाज. आज का युवा सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं खाता, वह अनुभव के लिए खाता है. वाओ मोमो ने इसे बखूबी समझा. उन्होंने टेक्नोलॉजी का सहारा लिया, अपनी सप्लाई चेन को मजबूत किया और यह सुनिश्चित किया कि दिल्ली में मिलने वाले मोमो का स्वाद वैसा ही हो जैसा कोलकाता या बेंगलुरु में मिलता है. हालांकि, यह इतना आसान भी नहीं था. कहते हैं कोस-कोस पर वाणी बदले, ढाई कोस पर पानी. तो पानी के बदलने पर भी स्वाद अलग हो जाता है. इसलिए, पूरे भारत में एक जैसा स्वाद देने के लिए कड़ी मेहनत और टेक्नोलॉजी की जरूरत थी. फिलहाल कंपनी उसे अचीव करने में सक्षम रही है. बीच में कोरोना जैसी महामारी आई, जिसने पूरे रेस्टोरेंट इंडस्ट्री को हिलाकर रख दिया. उस वक्त सागर और उनकी टीम ने हार मानने की जगह होम डिलीवरी मॉडल पर पूरा जोर दिया. उन्होंने क्लाउड किचन के कॉन्सेप्ट को अपनाया और मुश्किल समय में भी खुद को बचाए रखा.

विवादों में भी रही वाओ मोमो

पिछले कुछ वर्षों में वाओ मोमो कई कानूनी और ऑपरेशन संबंधी विवादों के कारण चर्चा में रही है. इन घटनाओं ने ब्रांड की साख और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने का काम किया है.

  1. ट्रेडमार्क विवाद
    2025 में वाओ मोमो ने Wow Burger के खिलाफ ट्रेडमार्क उल्लंघन का मुकदमा दायर किया. शुरुआत में दिल्ली हाई कोर्ट ने यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया था कि WOW एक सामान्य शब्द है. हालांकि, बाद में अपील करने पर अदालत ने उस नाम के इस्तेमाल पर रोक लगा दी. इस दौरान कोर्ट ने Idea Infringement का विशेष उल्लेख किया. Idea Infringement का अर्थ है ‘विचार का उल्लंघन’ या ‘धारणा की चोरी’. कानून में इसका मतलब है कि जब कोई व्यक्ति या कंपनी किसी दूसरे के मौलिक विचार, कॉन्सेप्ट या विशिष्ट व्यावसायिक शैली की नकल करती है.
  2. धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप
    उसी वर्ष मुंबई में दो शाकाहारी ग्राहकों ने कंपनी पर गंभीर आरोप लगाए. उनका दावा था कि उन्हें शाकाहारी के स्थान पर चिकन मोमो परोसे गए, जिससे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुईं. ग्राहकों ने 6 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की थी, लेकिन कंज्यूमर कोर्ट ने बिल के पुख्ता सबूत न होने के कारण इस केस को खारिज कर दिया.
  3. सेफ्टी नॉर्म्स पर उठे सवाल
    2026 में कोलकाता स्थित कंपनी के वेयरहाउस में एक भीषण आग लग गई, जिसमें कुछ लोगों की जान जाने की खबरें सामने आईं. फायर डिपार्टमेंट की जांच में सामने आया कि वेयरहाउस के पास जरूरी फायर लाइसेंस नहीं थे और सुरक्षा मानकों (Safety Norms) की अनदेखी की गई थी. हालांकि कंपनी ने इन आरोपों को नकारा, लेकिन इस घटना ने कंपनी के कॉर्पोरेट गवर्नेंस और कार्यस्थल की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा दिए.
  4. हाइजीन का मसला
    इन प्रमुख घटनाओं के अलावा, गुवाहाटी और लखनऊ जैसे शहरों से भी ग्राहकों ने स्वच्छता को लेकर कई शिकायतें कीं. इनमें गंदी प्लेटें, खाने में मक्खियां और एक्सपायर्ड (पुराना) सामान मिलने जैसे फूड सेफ्टी उल्लंघन शामिल थे. इन लगातार आती शिकायतों के कारण बाजार में ब्रांड की विश्वसनीयता (Credibility) पर नकारात्मक असर पड़ा.



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