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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बावजूद कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज ने भारतीय शेयर बाजार को लेकर सकारात्मक तस्वीर पेश की है. ब्रोकरेज का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में निफ्टी 50 कंपनियों की कमाई 18 फीसदी और अगले वित्त वर्ष में 14 फीसदी बढ़ सकती है. रिपोर्ट में चेतावनी भी दी गई है कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित हुई तो भारत के चालू खाता घाटे, महंगाई और राजकोषीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है. इसके बावजूद बैंकिंग, फाइनेंशियल, ग्लोबल सर्विसेज और यूटिलिटीज सेक्टर भारतीय बाजार को मजबूती देने की स्थिति में हैं.
रिपोर्ट में भारतीय शेयर बाजार के वैल्यूएशन को लेकर भी अहम टिप्पणी की गई है. (AI)
नई दिल्ली. पश्चिम एशिया में जारी सैन्य संघर्ष, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर एक अहम रिपोर्ट सामने आई है. दिग्गज ब्रोकरेज फर्म कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज ने अपनी ताजा स्ट्रेटेजी रिपोर्ट में कहा है कि तेल की ऊंची कीमतों के कारण भारत का व्यापक आर्थिक परिदृश्य पहले की तुलना में कमजोर हुआ है. इसके बावजूद भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर और शेयर बाजार की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनियों की कमाई आने वाले दो वित्त वर्षों में तेज रफ्तार से बढ़ सकती है, जो बाजार को सहारा देने का काम करेगी.
कोटक के संजीव प्रसाद और उनकी टीम द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2025-26 में निफ्टी-50 पर लिस्टेड कंपनियों की आय में केवल 8 फीसदी की वृद्धि रहने का अनुमान है. लेकिन इसके बाद तस्वीर तेजी से बदल सकती है. ब्रोकरेज का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में निफ्टी 50 कंपनियों की कमाई 18 फीसदी और वित्त वर्ष 2027-28 में 14 फीसदी बढ़ सकती है. हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर पश्चिम एशिया का संकट लंबा खिंचता है और तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो भारत के लिए महंगाई, चालू खाता घाटा और राजकोषीय घाटा जैसी चुनौतियां बढ़ सकती हैं.
बाजार वैल्यूएशन में दिख रहा बड़ा अंतर
रिपोर्ट में भारतीय शेयर बाजार के वैल्यूएशन को लेकर भी अहम टिप्पणी की गई है. कोटक का मानना है कि कंजम्पशन और इन्वेस्टमेंट आधारित कई सेक्टर इस समय महंगे वैल्यूएशन पर कारोबार कर रहे हैं. आईटी और फार्मा सेक्टर उचित से लेकर महंगे स्तर पर दिखाई दे रहे हैं, जबकि बैंकिंग और फाइनेंशियल शेयर अभी भी आकर्षक वैल्यूएशन पर उपलब्ध हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्मॉलकैप, मिडकैप और कुछ सरकारी कंपनियों के शेयरों में जरूरत से ज्यादा तेजी देखने को मिली है. ऐसे शेयरों में निवेशकों को सावधानी बरतने की जरूरत हो सकती है क्योंकि मौजूदा वैल्यूएशन उनके वास्तविक प्रदर्शन से काफी आगे निकल चुका है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम
कोटक की रिपोर्ट में सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा सुरक्षा को लेकर जताई गई है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पश्चिम एशिया पर काफी निर्भर है. वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान देश का लगभग 42 फीसदी कच्चा तेल आयात, 55 फीसदी एलएनजी आयात और करीब 88 फीसदी एलपीजी आयात सीधे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और उससे जुड़े क्षेत्रों के रास्ते हुआ है.
रिपोर्ट के अनुसार यदि पश्चिम एशिया का तनाव सीमित समय में कम हो जाता है और कच्चे तेल की औसत कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है, तो भारत का चालू खाता घाटा जीडीपी के 2.5 फीसदी के आसपास रह सकता है. लेकिन यदि संघर्ष लंबा खिंचता है और तेल की कीमतें और बढ़ती हैं, तो चालू खाता घाटा 3 फीसदी तक पहुंच सकता है, जिससे अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बनेगा.
महंगाई और कमजोर मानसून बढ़ा सकते हैं मुश्किलें
कोटक ने वित्त वर्ष 2026-27 में महंगाई को लेकर भी चेतावनी दी है. रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले वित्त वर्ष में जहां औसत खुदरा महंगाई दर करीब 2.5 फीसदी रही थी, वहीं नए वित्त वर्ष में यह बढ़कर 5 फीसदी तक पहुंच सकती है. इसके पीछे कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, बढ़ती उत्पादन लागत और खाद्य महंगाई प्रमुख कारण होंगे.
स्थिति इसलिए और चुनौतीपूर्ण हो सकती है क्योंकि भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने इस साल सामान्य से कमजोर मानसून का अनुमान जताया है. कमजोर बारिश से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है और खाद्यान्न व सब्जियों की कीमतों में तेजी आ सकती है. अगर सरकार को पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ानी पड़ीं, तो परिवहन लागत बढ़ने से महंगाई का असर पूरे बाजार में फैल सकता है.
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए क्या है बड़ा संदेश
कोटक की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि पश्चिम एशिया संकट के कारण भारत के मैक्रोइकोनॉमिक संकेतकों पर दबाव बढ़ सकता है, लेकिन कॉरपोरेट सेक्टर की कमाई फिलहाल मजबूत बनी हुई है. यही वजह है कि बाजार को निकट भविष्य में कंपनियों के बेहतर नतीजों से सहारा मिलने की उम्मीद है. हालांकि तेल की कीमतों और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिति पर निवेशकों की नजर लगातार बनी रहेगी क्योंकि यही आने वाले महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा फैक्टर साबित हो सकता है.
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मैं जय ठाकुर, न्यूज18 हिंदी में सीनियर सब-एडिटर के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहा हूं. मेरा मुख्य काम बिजनेस की पेचीदा खबरों को आसान भाषा में लोगों तक पहुंचाना है. फिर चाहे वह शेयर बाजार की हलचल हो, देश की इकोनॉमी क…और पढ़ें



