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Traditional Wooden Pestle: तेलंगाना की पारंपरिक रसोई में इस्तेमाल होने वाला लकड़ी का मूसल एक बार फिर लोगों का ध्यान खींच रहा है. हैदराबाद के आधुनिक घरों में भी हाथ से कुटी चटनियों और मसालों के स्वाद को पसंद किया जा रहा है. कारीगर बताते हैं कि पच्चड़ी बंडा बनाने के लिए सघन और टिकाऊ लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है. पत्थर की ओखली में इस मूसल से गोंगुरा, टमाटर, मिर्च, तिल और मूंगफली कूटकर पारंपरिक रोटी पच्चड़ी तैयार की जाती है. हाथ से कूटने पर सामग्री पूरी तरह महीन पेस्ट बनने के बजाय दरदरी रहती है, जिससे चटनी की बनावट अलग होती है. स्थानीय मान्यताओं में इस लकड़ी को स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है, हालांकि इसके औषधीय प्रभावों के वैज्ञानिक प्रमाण स्पष्ट नहीं हैं. अलग-अलग जरूरतों के लिए 15, 18 और 24 इंच के मूसल बनाए जाते हैं.
हैदराबाद: मिक्सी और इलेक्ट्रॉनिक ग्राइंडर के दौर में भले ही खाना जल्दी बन जाता हो, लेकिन तेलंगाना की पारंपरिक रसोई का असली जायका आज भी हाथ से कुटे मसालों और देशी चटनियों में ही बसता है. तेलंगाना के ग्रामीण इलाकों से लेकर हैदराबाद के आधुनिक घरों तक, पारंपरिक रोटी पच्चड़ी का स्वाद वापस अपनी जगह बना रहा है. इसी परंपरा और सेहत को ध्यान में रखते हुए रसोई में चंद्र लकड़ी से बने पारंपरिक मूसल यानी पच्चड़ी बंडा का चलन एक बार फिर तेजी से बढ़ रहा है.
रसोई उपकरण के पारंपरिक कारीगरों के मुताबिक, यह मूसल किसी सामान्य लकड़ी से नहीं, बल्कि मजबूत और ठोस नल्ला मानु यानी खैर प्रजाति से गढ़ा जाता है. यह लकड़ी प्राकृतिक रूप से बेहद भारी, सघन और टिकाऊ होती है. भारी होने के कारण पत्थर की ओखली में टमाटर, गोंगुरा, हरी मिर्च, भुनी मूंगफली या तिल कूटते समय ज्यादा ताकत नहीं लगानी पड़ती. सामग्री को कूटते वक्त उसका प्राकृतिक तेल और रस उड़ता नहीं, बल्कि बरकरार रहता है, जिससे चटनी का दरदरापन और असली टेक्सचर मिलता है.
चंद्र लकड़ी में पाए जाते हैं प्राकृतिक औषधीय तत्व
बुजुर्गों और पारंपरिक जानकारों का मानना है कि चंद्र लकड़ी में प्राकृतिक औषधीय तत्व समाहित होते हैं. जब इसमें खड़े मसाले या चटनियां कुटी जाती हैं, तो इसके बारीक प्राकृतिक गुण भोजन में मिलकर पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में मददगार माने जाते हैं। वहीं, बिजली वाले मिक्सी में तेज ब्लेड की गर्माहट से मसालों के पोषक तत्व और मूल महक नष्ट हो जाती है, जबकि इस लकड़ी के मूसल से तैयार भोजन पूरी तरह शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक रहता है.
अलग-अलग आकारों में मिल जाता है मूसल
महिलाओं और पारंपरिक कुकिंग के शौकीनों की सुविधा के लिए यह मूसल 15 इंच, 18 इंच और 24 इंच के तीन अलग-अलग आकारों में तैयार किया जाता है. छोटे आकार का मूसल रोजमर्रा की चटनी और अदरक-लहसुन कूटने के लिए मुफीद है, जबकि बड़े आकार का उपयोग भारी सामग्री और त्योहारों पर बनने वाले पकवानों के लिए किया जाता है। तेलंगाना की संस्कृति में यह सिर्फ एक रसोई उपकरण नहीं, बल्कि पुरानी विरासत और सेहतमंद जीवनशैली का प्रतीक बनता जा रहा है।
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दीपरंजन सिंह लगभग एक दशक से पत्रकारिता के फिल्ड से जुड़े हुए हैं. वह अभी न्यूज18 हिंदी के राजस्थान डिजिटल डेस्क से जुड़े हैं, जहां वे बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले लगभग एक दशक से सक्रिय पत…







