अगर आप अपना पैसा सिर्फ FD या सेविंग्स अकाउंट में रखते हैं क्योंकि शेयर बाजार में उतरने से डर लगता है, तो रुकिये… आने वाले समय में कॉरपोरेट बॉन्ड आपके लिए निवेश का एक और विकल्प बन सकता है. बाजार नियामक SEBI ने कॉरपोरेट बॉन्ड और दूसरे तय आय वाले इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए नया फ्रेमवर्क पेश किया है. इसका मॉडल काफी हद तक Mutual Fund डिस्ट्रीब्यूटर की तरह होगा.
SEBI के प्रस्ताव के मुताबिक फिक्स्ड इनकम चैनल पार्टनर्स यानी FICP बनाए जाएंगे. इन्हें स्टॉक एक्सचेंज में रजिस्टर किया जाएगा और फिर ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफार्म प्रोवाइडर्स यानी OBPPs इनकी नियुक्ति कर सकेंगे. इनका काम निवेशकों को फिक्स्ड इनकम सिक्योरिटीज की जानकारी देना, उनके फीचर और जोखिम समझाना, जरूरी दस्तावेज पूरे कराने और प्लेटफॉर्म के जरिए निवेश की प्रक्रिया में मदद करना होगा. यानी जिस तरह MFD आपको Mutual Fund समझाकर निवेश में मदद करता है, उसी तरह इस मामले में काम कर सकता है.
Corporate Bond है क्या?
मान लीजिए किसी बड़ी कंपनी को कारोबार बढ़ाने के लिए 1,000 करोड़ की जरूरत है. कंपनी बैंक से पूरा कर्ज लेने के बजाय निवेशकों से भी पैसा जुटा सकती है. इसके लिए वह कॉरपोरेट बॉन्ड जारी करती है. आप उस बॉन्ड को खरीदकर कंपनी को एक तय अवधि के लिए पैसा देते हैं. बदले में कंपनी तय शर्तों के मुताबिक आपको ब्याज देती है और अवधि पूरी होने पर मूल रकम लौटाती है.
FD में आप बैंक को पैसा देते हैं, जबकि कॉरपोरेट बॉन्ड में कंपनी को पैसा उधार देते हैं. हालांकि दोनों की सुरक्षा, ब्याज और जोखिम अलग-अलग होते हैं. इसलिए कॉरपोरेट बॉन्ड को FD का दूसरा नाम समझना सही नहीं होगा.
60 लाख करोड़ का बाजार
- SEBI के मुताबिक देश का कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट पिछले एक दशक में तेजी से बड़ा हुआ है. FY15 के अंत में बकाया कॉरपोरेट बॉन्ड करीब 17.5 लाख करोड़ के थे. 31 जुलाई 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर 60 लाख करोड़ से ज्यादा हो गया है. इनमें लिस्टेड कॉरपोरेट बॉन्ड करीब 46 लाख करोड़ के हैं, जो कुल बाजार का लगभग 76.6 फीसदी है.
- यानी बाजार बहुत बड़ा हो चुका है, लेकिन इसमें आम निवेशक की हिस्सेदारी अभी भी उतनी नहीं है. कॉरपोरेट डेब्ट सिक्योरिटीज का इस्तेमाल अब भी मुख्य तौर पर बड़े संस्थागत निवेशक करते हैं. SEBI अब इसे बदलना चाहता है.
- रिटेल निवेशकों के लिए कॉरपोरेट बॉन्ड तक पहुंच पहले से आसान हुई है. ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफार्म प्रोवाइडर्स यानी OBPPs ऐसे प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा रहे हैं जहां निवेशक अलग-अलग लिस्टेड डेब्ट सिक्योरिटीज को देख और उनकी तुलना कर सकते हैं और ऑनलाइन लेनदेन कर सकते हैं.
- इसका असर रिक्वेस्ट ऑन कोट यानी RFQ प्लेटफॉर्म पर भी दिखाई दिया है. SEBI के मुताबिक FY25 में RFQ पर करीब 2.76 लाख ट्रेड हुए थे, जो FY26 में बढ़कर 17.84 लाख हो गए. यानी एक साल में करीब 546 फीसदी की जबरदस्त बढ़ोतरी हुई. नियामक के मुताबिक OBPPs के जरिए बढ़ी रिटेल भागीदारी ने भी इस तेजी में भूमिका निभाई है.
अब छोटे शहरों की बारी
ऑनलाइन प्लेटफार्म होने के बावजूद टीयर टू, टीयर थ्री शहरों और ग्रामीण इलाकों में कॉरपोरेट बॉन्ड की पहुंच सीमित है. बहुत से निवेशकों को यह तक पता नहीं होता कि Bond खरीदा कैसे जाता है, किस कंपनी का Bond है, कितना ब्याज मिलेगा और इसमें क्या जोखिम हो सकता है.
SEBI इसी कमी को दूर करना चाहता है. अगर FICP का प्रस्ताव लागू होता है तो छोटे शहरों में मौजूद ऐसे लोग या संस्थाएं निवेशकों को कॉरपोरेट बॉन्ड और फिक्स्ड इनकम प्रोडक्ट के बारे में समझाने में मदद कर सकेंगे. यानी निवेश सिर्फ बड़े शहरों और बड़े निवेशकों तक सीमित रखने के बजाय इसे ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश होगी.
आम आदमी के लिए क्या बदलेगा?
SEBI का पूरा प्लान सिर्फ Bond बेचने का नहीं, बल्कि Bond Investment को समझने और उस तक पहुंच आसान बनाने का है. मसलन, अगर किसी व्यक्ति के पास 1 लाख है और वह उसे शेयर बाजार में नहीं लगाना चाहता, लेकिन FD के अलावा Fixed Income का कोई विकल्प तलाश रहा है, तो वह Corporate Bond के बारे में जानकारी ले सकता है.
लेकिन यहां सावधानी जरूरी है. Corporate Bond में निवेश का मतलब यह नहीं है कि पैसा पूरी तरह सुरक्षित हो गया. कंपनी की वित्तीय स्थिति खराब होने पर Credit Risk हो सकता है. इसके अलावा Bond को समय से पहले बेचने पर Liquidity Risk भी हो सकता है. इसलिए सिर्फ ज्यादा ब्याज देखकर निवेश करना ठीक नहीं है. निवेशक को कंपनी, Bond की Rating, अवधि और जोखिम को समझना जरूरी है. SEBI की Investor वेबसाइट भी निवेशकों को अलग-अलग Investment Avenues और उनसे जुड़े जोखिमों को समझने की सलाह देती है.





















