नई दिल्ली. पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच सिंगापुर के प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग (Lawrence Wong) का बयान पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी माना जा रहा है. उनका कहना है कि अभी दुनिया ने आर्थिक संकट का सबसे बुरा दौर देखा ही नहीं है. होर्मुज स्ट्रेट पिछले दो महीनों से बंद है और इसका असर अब केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं रह गया है. ग्लोबल सप्लाई चेन टूटने लगी है, ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है और एशियाई देशों के सामने सबसे बड़ा खतरा खड़ा हो गया है. इसी दौरान उन्होंने 1970 के दशक के उस ऐतिहासिक आर्थिक ग्रहण का जिक्र किया जिसे दुनिया आज भी डर के साथ याद करती है.
लॉरेंस वोंग ने खास तौर पर स्टैगफ्लेशन शब्द का इस्तेमाल किया. यह अर्थशास्त्र का ऐसा शब्द है जिसे किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे खतरनाक स्थिति माना जाता है. सामान्य तौर पर जब महंगाई बढ़ती है तो अर्थव्यवस्था भी बढ़ती है और रोजगार के अवसर पैदा होते हैं. लेकिन स्टैगफ्लेशन बिल्कुल उल्टा होता है. इसमें अर्थव्यवस्था रुक जाती है, बेरोजगारी बढ़ती जाती है और दूसरी तरफ जरूरी सामानों के दाम तेजी से ऊपर जाते रहते हैं. यानी लोगों की आमदनी घटती है लेकिन खर्च लगातार बढ़ता रहता है. यही वजह है कि इसे आर्थिक दुनिया का सबसे बड़ा डर माना जाता है.
1970 में कैसे शुरू हुआ था आर्थिक संकट?
1970 के दशक में दुनिया ने पहली बार इतने बड़े स्तर पर स्टैगफ्लेशन का सामना किया था. इसकी शुरुआत 1973 के अरब इजरायल युद्ध के बाद हुई. उस समय तेल उत्पादक अरब देशों के संगठन ओपेक (OPEC) ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को तेल सप्लाई रोक दी थी क्योंकि वे इजरायल का समर्थन कर रहे थे. देखते ही देखते कच्चे तेल की कीमतें 300 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गईं. उस दौर में दुनिया की लगभग हर फैक्ट्री, ट्रांसपोर्ट सिस्टम और इंडस्ट्री तेल पर निर्भर थी. जैसे ही तेल महंगा हुआ, हर चीज की लागत बढ़ गई. कंपनियों का प्रोडक्शन धीमा पड़ गया, रोजगार खत्म होने लगे और महंगाई बेकाबू हो गई.
सिर्फ तेल नहीं, डॉलर संकट ने भी बढ़ाई थी तबाही
केवल तेल संकट ही इस आर्थिक तबाही की वजह नहीं था. उसी समय अमेरिका ने एक और बड़ा फैसला लिया जिसने पूरी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को हिला दिया. 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन (Richard Nixon) ने डॉलर का सोने से संबंध खत्म कर दिया. इससे पहले पूरी दुनिया की करेंसी अप्रत्यक्ष रूप से सोने से जुड़ी हुई थी. जैसे ही डॉलर गोल्ड स्टैंडर्ड से अलग हुआ, दुनियाभर की करेंसी में भारी अस्थिरता आ गई. डॉलर कमजोर होने लगा और आयात महंगा होता चला गया. इसके साथ ही कई देशों की सरकारों ने बेरोजगारी कम करने के लिए बाजार में जरूरत से ज्यादा पैसा डाल दिया. नतीजा यह हुआ कि महंगाई और तेज हो गई लेकिन रोजगार नहीं बढ़ा.
खेती और सप्लाई चेन संकट ने बिगाड़े हालात
उसी दौर में खेती और सप्लाई चेन संकट ने हालात और खराब कर दिए. कई देशों में खराब मौसम और फसल बर्बाद होने की वजह से अनाज की कमी हो गई. खाने पीने की चीजों के दाम तेजी से बढ़ने लगे. तेल पहले से महंगा था और अब खाद्य संकट ने आम लोगों की जिंदगी और मुश्किल बना दी. अमेरिका समेत कई देशों में लोग दूध, ब्रेड और पेट्रोल जैसी बेसिक चीजों के लिए परेशान होने लगे थे.
शेयर बाजार से लेकर नौकरियों तक सब पर पड़ा असर
1970 के दशक का आर्थिक संकट केवल महंगाई तक सीमित नहीं रहा. शेयर बाजारों में भारी गिरावट आई. अमेरिकी शेयर बाजार 1973 से 1974 के बीच लगभग 45 प्रतिशत तक टूट गया था. निवेशकों का भरोसा खत्म होने लगा था. बैंकिंग सिस्टम दबाव में आ गया था और कंपनियां बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी करने लगी थीं. मध्यम वर्ग की खरीदने की ताकत तेजी से खत्म हो रही थी क्योंकि सैलरी उतनी नहीं बढ़ रही थी जितनी तेजी से महंगाई बढ़ रही थी.
दुनिया को संकट से बाहर आने में लग गए 10 साल
दुनिया को इस संकट से बाहर निकलने में करीब एक दशक लग गया. अमेरिका और यूरोप के केंद्रीय बैंकों ने महंगाई रोकने के लिए ब्याज दरों को रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ा दिया था. कई जगहों पर ब्याज दरें 20 प्रतिशत तक पहुंच गई थीं. इसका असर यह हुआ कि लोन लेना बेहद महंगा हो गया. बिजनेस ठप पड़ने लगे, घर खरीदना मुश्किल हो गया और लाखों लोग बेरोजगार हो गए. 1980 के दशक के मध्य तक जाकर दुनिया धीरे धीरे सामान्य स्थिति में लौट पाई.
आज का संकट क्यों ज्यादा खतरनाक माना जा रहा है?
अब लॉरेंस वोंग का डर इसलिए ज्यादा गंभीर माना जा रहा है क्योंकि आज की दुनिया 1970 के मुकाबले कहीं ज्यादा आपस में जुड़ी हुई है. उस समय सप्लाई चेन सीमित थीं लेकिन आज पूरी दुनिया एक दूसरे पर निर्भर है. अगर होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक बंद रहता है तो एशिया के देशों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा क्योंकि चीन, भारत, जापान और सिंगापुर जैसे देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर हैं. तेल सप्लाई रुकने का मतलब केवल पेट्रोल और डीजल महंगा होना नहीं है बल्कि फैक्ट्री प्रोडक्शन, एयरलाइन, शिपिंग, बिजली उत्पादन और खाद्य सप्लाई तक सब प्रभावित होना है.
अगर फिर आया स्टैगफ्लेशन तो क्या होगा?
अगर मौजूदा हालात लंबे समय तक जारी रहते हैं तो दुनिया फिर स्टैगफ्लेशन जैसे दौर में पहुंच सकती है. इसका मतलब होगा कि लोगों की नौकरियां जाएंगी, महंगाई तेजी से बढ़ेगी और जरूरी सामानों की किल्लत शुरू हो सकती है. विकासशील देशों के लिए यह संकट और ज्यादा खतरनाक होगा क्योंकि उन पर पहले से भारी विदेशी कर्ज है. अगर डॉलर मजबूत हुआ और तेल महंगा बना रहा तो कई देशों के विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से खत्म हो सकते हैं. श्रीलंका जैसा आर्थिक संकट दूसरे देशों में भी देखने को मिल सकता है.
सरकारों के लिए क्यों मुश्किल होता है इससे लड़ना?
विशेषज्ञ मानते हैं कि स्टैगफ्लेशन से लड़ना किसी भी सरकार के लिए सबसे मुश्किल चुनौती होती है. अगर सरकार महंगाई रोकने के लिए ब्याज दरें बढ़ाती है तो बिजनेस और रोजगार पर दबाव बढ़ जाता है. दूसरी तरफ अगर अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए बाजार में ज्यादा पैसा डाला जाए तो महंगाई और बढ़ जाती है. यही वजह है कि 1970 का संकट आर्थिक इतिहास का सबसे जटिल दौर माना जाता है.
लॉरेंस वोंग की चेतावनी का मतलब क्या है?
सिंगापुर के प्रधानमंत्री का यह बयान केवल चेतावनी नहीं बल्कि दुनिया के लिए एक बड़ा संकेत है कि मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव केवल युद्ध का मुद्दा नहीं रह गया है. यह धीरे-धीरे वैश्विक आर्थिक संकट में बदल सकता है. अगर ऊर्जा सप्लाई, सप्लाई चेन और वैश्विक व्यापार पर दबाव बढ़ता रहा तो दुनिया को एक बार फिर उसी आर्थिक अंधेरे का सामना करना पड़ सकता है जिसने 1970 के दशक में पूरी वैश्विक व्यवस्था को हिला दिया था.