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कभी राहुल गांधी को अपना ‘भाई’ बताने वाले एमके स्टालिन अब कांग्रेस से राजनीतिक दूरी बनाते नजर आ रहे हैं. 8 जून की इंडिया गठबंधन बैठक से डीएमके की गैरमौजूदगी ने विपक्षी एकता पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं. कांग्रेस और डीएमके का तीन दशक पुराना रिश्ता आखिर किस वजह से कमजोर पड़ता दिख रहा है? क्या यह सिर्फ राजनीतिक रणनीति है या फिर विपक्षी गठबंधन के भीतर बढ़ते मतभेदों का संकेत? जानिए राहुल गांधी, स्टालिन, डीएमके और कांग्रेस के रिश्तों में आई दरार की पूरी कहानी और इसके 2029 की राजनीति पर संभावित असर.
क्यों बढ़ी राहुल-स्टालिन की दूरियां.
भाई से ‘बेवफाई’ तक राहुल-स्टालिन के रिश्ते: भारतीय राजनीति में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो सिर्फ चुनावी फायदे के लिए नहीं बनते, बल्कि वर्षों के भरोसे और राजनीतिक साझेदारी पर टिके होते हैं. कांग्रेस और डीएमके का रिश्ता भी ऐसा ही माना जाता रहा है. तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय तक दोनों दल एक-दूसरे के मजबूत सहयोगी रहे. करुणानिधि के दौर से लेकर एमके स्टालिन तक, डीएमके को गांधी परिवार का सबसे भरोसेमंद साथी माना जाता था.
कई मौकों पर स्टालिन ने सार्वजनिक मंचों से राहुल गांधी को अपना ‘भाई’ बताया और उन्हें राष्ट्रीय राजनीति का अहम चेहरा कहा. लेकिन अब हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं. INDIA गठबंधन की 8 जून को होने वाली बैठक से डीएमके का दूरी बनाना राजनीतिक गलियारों में बड़ी चर्चा का विषय बन गया है. इसे सिर्फ एक बैठक में शामिल न होने का फैसला नहीं माना जा रहा, बल्कि कांग्रेस और डीएमके के बीच बढ़ रही राजनीतिक असहजता का संकेत समझा जा रहा है.
- कांग्रेस और डीएमके का रिश्ता कितना पुराना है?
कांग्रेस और डीएमके का साथ करीब तीन दशक से भी ज्यादा पुराना है. दोनों दलों ने कई लोकसभा और विधानसभा चुनाव मिलकर लड़े हैं. खासकर यूपीए सरकार के दौर में डीएमके कांग्रेस की सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी पार्टियों में शामिल रही. साल 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में दोनों दलों की साझेदारी ने शानदार प्रदर्शन किया था. उस समय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और डीएमके प्रमुख करुणानिधि के बीच मजबूत राजनीतिक विश्वास था. - तमिलनाडु चुनाव तक बनी रही दोनों की एकता
यही भरोसा आगे चलकर राहुल गांधी और एमके स्टालिन के रिश्तों में भी दिखाई दिया. 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी डीएमके ने राहुल गांधी और विपक्षी एकता का खुलकर समर्थन किया था. इतना ही नहीं, तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 ने दोनों एक साथ मिलकर चुनाव भी लड़ा. चुनावी जनसभा में स्लालिन ने खुलकर राहुल को अपना भाई बताते रहे. इसलिए आज दोनों दलों के बीच दिखाई दे रही दूरी कई लोगों को हैरान कर रही है. - क्या सत्ता की महत्वाकांक्षा बनी दरार की वजह?
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक असली संकट तब शुरू हुआ जब तमिलनाडु की राजनीति में कांग्रेस ने डीएमके से अलग रास्ता चुन लिया. कांग्रेस का विजय थलापति की टीवीके के साथ जाना और राज्य सरकार में शामिल होना डीएमके को रास नहीं आया. डीएमके को लगा कि जिस कांग्रेस को उसने वर्षों तक राजनीतिक आधार दिया, वही पार्टी अब तमिलनाडु में उसके राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करने की कोशिश कर रही है. दक्षिण भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दल अपने राजनीतिक क्षेत्र को लेकर बेहद संवेदनशील रहते हैं. ऐसे में कांग्रेस का यह कदम डीएमके नेतृत्व को असहज कर गया. यहीं से दोनों दलों के रिश्तों में तनाव खुलकर सामने आने लगा. - इंडिया गठबंधन के लिए कितना बड़ा झटका?
डीएमके सिर्फ एक क्षेत्रीय पार्टी नहीं है. लोकसभा में उसके सांसदों की संख्या विपक्षी राजनीति में उसे महत्वपूर्ण बनाती है. दक्षिण भारत में कांग्रेस के पास वैसे भी सीमित प्रभाव बचा है. ऐसे में डीएमके जैसी सहयोगी पार्टी का नाराज होना कांग्रेस के लिए चिंता की बात है. इंडिया गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता रही है. लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बनती दिख रही है. - डीएमके का फैसला तो सिर्फ शुरूआत है
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, पंजाब में आम आदमी पार्टी, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और तमिलनाडु में डीएमके इन सभी दलों की अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं हैं. जब तक लक्ष्य भाजपा को चुनौती देना था, तब तक यह एकता कायम रही. लेकिन जैसे-जैसे 2029 का चुनाव करीब आएगा, नेतृत्व और राजनीतिक हिस्सेदारी के सवाल सामने आने लगेंगे. डीएमके का यह फैसला उसी प्रक्रिया की शुरुआत माना जा सकता है.
क्या स्टालिन राहुल गांधी से नाराज हैं?
यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है. लेकिन इसका जवाब इतना सीधा नहीं है. स्टालिन और राहुल गांधी के व्यक्तिगत संबंधों में सार्वजनिक तौर पर कोई कटुता दिखाई नहीं देती. समस्या राजनीतिक हितों की है. राजनीति में व्यक्तिगत रिश्ते अक्सर संगठनात्मक हितों के सामने पीछे छूट जाते हैं. स्टालिन जानते हैं कि तमिलनाडु में उनकी सबसे बड़ी ताकत डीएमके की स्वतंत्र पहचान है. अगर कांग्रेस राज्य में अलग राजनीतिक विस्तार करने लगेगी, तो डीएमके के लिए यह भविष्य का खतरा बन सकता है. इसलिए यह लड़ाई राहुल गांधी बनाम स्टालिन नहीं, बल्कि कांग्रेस बनाम डीएमके के राजनीतिक हितों की लड़ाई ज्यादा दिखाई देती है.
ममता की मौजूदगी और डीएमके की गैरमौजूदगी क्या संदेश देती है?
दिलचस्प बात यह है कि जिस ममता बनर्जी को अक्सर इंडिया गठबंधन से दूरी बनाकर रखने वाला नेता माना जाता था, उनके बैठक में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है. वहीं डीएमके दूर रहती दिख रही है. यह स्थिति बताती है कि विपक्षी राजनीति में समीकरण तेजी से बदल रहे हैं. आज का सहयोगी कल आलोचक बन सकता है और आज का आलोचक कल रणनीतिक साझेदार. यानी विपक्ष के भीतर भी राजनीतिक पुनर्संरचना का दौर शुरू हो चुका है.
2029 की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा?
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि डीएमके पूरी तरह कांग्रेस से अलग रास्ता चुन रही है. लेकिन इतना जरूर है कि उसने कांग्रेस को एक राजनीतिक संदेश दिया है. स्टालिन यह दिखाना चाहते हैं कि डीएमके को हल्के में नहीं लिया जा सकता. तमिलनाडु में उसकी राजनीतिक ताकत को नजरअंदाज कर कोई राष्ट्रीय रणनीति नहीं बनाई जा सकती. दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह क्षेत्रीय दलों को साथ भी रखे और अपनी राजनीतिक जमीन भी मजबूत करे. यही संतुलन भविष्य में इंडिया गठबंधन की सफलता या विफलता तय करेगा.
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Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at News18 Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international security affairs…और पढ़ें












