घर में बच्चे की किलकारी गूंजती है तो परिवार के लोग भविष्य के सपने देखने लगते हैं. कोई नन्हे मेहमान के लिए कपड़े खरीदता है, कोई खिलौने लाता है और कोई उसके नाम पर सोने-चांदी का सामान रख देता है. भारत में भी इसी दौरान बच्चे की पढ़ाई और शादी के लिए बचत शुरू करने की बातें होने लगती हैं. लेकिन साउथ कोरिया में कुछ माता-पिता इससे भी आगे निकल गए हैं. वहां बच्चे ने अभी दुनिया देखना शुरू भी नहीं किया और उसके नाम पर इन्वेस्टमेंट अकाउंट खुल रहा है. यानी बच्चा चलना बाद में सीखेगा, उसके पैसे को शेयर बाजार में चलाने की तैयारी पहले हो रही है.
साउथ कोरिया की सबसे बड़ी ब्रोकरेज कंपनियों में से एक मिराए एसेट सिक्योरिटीज के आंकड़े इस बदलती सोच की कहानी बताते हैं. जून तक एक साल से कम उम्र के बच्चों के करीब 15,000 ब्रोकरेज अकाउंट खुल चुके थे. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सिर्फ एक साल में ऐसे अकाउंट की संख्या करीब तीन गुना हो गई. यानी माता-पिता अब बच्चे के नाम पर सिर्फ बैंक में पैसा जमा करने के बजाय शेयर, ETF और दूसरे बाजार से जुड़े निवेश के बारे में भी सोच रहे हैं. और यह मामला सिर्फ नवजात बच्चों तक नहीं है. 9 साल से कम उम्र के बच्चों के नए अकाउंट भी करीब 60 फीसदी बढ़कर लगभग 1.85 लाख हो गए हैं. कंपनी ने डुप्लीकेट अकाउंट को अलग रखते हुए ये आंकड़े जारी किए हैं.
आखिर इतनी जल्दी किस बात की है?
अब सवाल यही है कि जब बच्चे को अभी स्कूल भी नहीं जाना, तो उसके नाम पर शेयर बाजार में पैसा लगाने की इतनी जल्दी क्यों? जवाब है- समय. साउथ कोरिया के कई माता-पिता मानते हैं कि बच्चों के भविष्य के लिए सिर्फ बड़ी रकम जमा करना जरूरी नहीं है. अगर निवेश जल्दी शुरू कर दिया जाए तो छोटी रकम को भी लंबे समय तक बढ़ने का मौका मिल सकता है. नर्स के तौर पर काम करने वाली ली ह्ये-वोन और उनके पति इसका उदाहरण हैं. उन्होंने अपने पहले बच्चे के लिए निवेश अकाउंट तब खोला था, जब वह चार साल का हो चुका था. लेकिन दूसरे बच्चे के जन्म तक उनकी सोच बदल चुकी थी. इस बार बच्चे के पैदा होते ही अकाउंट खोल दिया गया.
पहले बच्चे से मिली सीख, दूसरे के लिए जन्म के साथ निवेश
इस परिवार की रणनीति भी दिलचस्प है. माता-पिता बच्चों के लिए हर महीने करीब 3 लाख से 4 लाख कोरियन वॉन निवेश कर रहे हैं. भारतीय रुपये में यह रकम मोटे तौर पर करीब 20 हजार से ज्यादा बैठती है, हालांकि विनिमय दर के हिसाब से रकम बदलती रहती है. परिवार का निवेश मुख्य रूप से अमेरिका के ETF में जा रहा है, खासकर ऐसे ETF में जो S&P 500 को ट्रैक करते हैं. यानी उनका लक्ष्य किसी एक कंपनी के शेयर पर दांव लगाने के बजाय अमेरिकी बाजार की बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन से लंबे समय में फायदा लेने का है. सोच बिल्कुल सीधी है- बच्चे के बड़े होने का इंतजार क्यों किया जाए, जब निवेश आज से शुरू किया जा सकता है?
ETF को ऐसे समझिए, मामला बिल्कुल आसान है
ETF का नाम सुनते ही अगर आपको लगे कि अब कोई भारी-भरकम फाइनेंस की क्लास शुरू होने वाली है, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है. इसे ऐसे समझिए कि आपको अमेरिका की बड़ी कंपनियों में निवेश करना है, लेकिन आप यह तय नहीं कर पा रहे कि Apple खरीदें, Microsoft खरीदें या किसी और कंपनी का शेयर. ETF आपको एक ऐसा रास्ता देता है, जिसमें एक साथ कई कंपनियां शामिल हो सकती हैं. S&P 500 अमेरिका की करीब 500 बड़ी कंपनियों से जुड़ा प्रमुख इंडेक्स है. उसे ट्रैक करने वाले ETF में पैसा लगाने का मतलब है कि आपका निवेश एक ही कंपनी पर निर्भर नहीं रहता. हालांकि इसका मतलब जोखिम खत्म होना नहीं है. बाजार गिर सकता है और निवेश का मूल्य भी घट सकता है.
असली जादू रकम का नहीं, ‘कितने साल’ का है
मान लीजिए आपने 100 रुपये लगाए और उस पर 10 रुपये का फायदा हुआ. अब रकम 110 रुपये हो गई. अगर आगे मिलने वाला रिटर्न उस बढ़ी हुई रकम पर भी जुड़ता जाए तो पहले कमाया गया पैसा भी आगे पैसा बनाने लगता है. यही प्रक्रिया लंबे समय तक चलती रहे तो रकम तेजी से बढ़ सकती है. लेकिन कम्पाउंडिंग का सबसे बड़ा साथी है- समय. जन्म के समय शुरू किया गया निवेश बच्चे को 18 साल तक बढ़ने का मौका दे सकता है. वही निवेश अगर 10 साल की उम्र में शुरू हुआ तो उसके पास सिर्फ 8 साल होंगे. इसलिए साउथ कोरिया के इन माता-पिता के लिए असली सवाल यह नहीं है कि आज कितने पैसे लगाए जाएं, बल्कि यह है कि निवेश को कितने साल दिए जाएं.
बेटी पैदा हुई और पिता ने दिया ‘टाइम का तोहफा’
ऑफिस में काम करने वाले ली जुन-ह्योक ने भी अपनी बेटी के जन्म के तुरंत बाद उसका निवेश अकाउंट खोल दिया. उनकी सोच है कि बेटी को सिर्फ पैसा देना काफी नहीं है, उसे समय और कम्पाउंडिंग का फायदा भी दिया जाना चाहिए. वह नियमित रूप से छोटी-छोटी रकम निवेश कर रहे हैं. उनके निवेश का कुछ हिस्सा दक्षिण कोरिया के सेमीकंडक्टर सेक्टर में है, जबकि कुछ पैसा अमेरिका की फिजिकल एआई से जुड़ी कंपनियों में लगाया जा रहा है. उन्हें उम्मीद है कि भविष्य में इन क्षेत्रों में अच्छी संभावनाएं हो सकती हैं. लेकिन यहां सावधानी वाली घंटी भी बजती है- किसी सेक्टर को भविष्य का सितारा मान लेना और उसमें पैसा लगाने से मुनाफा मिलना दो अलग बातें हैं. शेयर बाजार में रिटर्न की कोई गारंटी नहीं होती.
बाजार कल गिरा तो बच्चों का पैसा भी गिरेगा?
यही वह सवाल है जो इस ट्रेंड के साथ सबसे जरूरी है. अभी बाजार में तेजी है, इसलिए बच्चों के नाम पर निवेश बढ़ रहा है. लेकिन अगर शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आ गई तो क्या माता-पिता अपना पैसा निकाल लेंगे? DePaul University के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर जे-जून वू का मानना है कि ऐसा जरूरी नहीं है. उनका तर्क है कि अगर माता-पिता शेयर बाजार को लंबे समय में संपत्ति बनाने का माध्यम मानते रहे, तो बाजार के उतार-चढ़ाव के बावजूद बच्चों के लिए निवेश खाते खुलते रह सकते हैं. आखिर बच्चे के नाम पर किया गया निवेश आमतौर पर अगले महीने या अगले साल खर्च करने के लिए नहीं है. इसका लक्ष्य कई साल दूर है. यही लंबी अवधि बाजार की छोटी अवधि की हलचल को नजरअंदाज करने का मौका देती है.
बच्चे की पढ़ाई के लिए बचत से आगे निकल रही पैरेंटिंग
साउथ कोरिया की यह कहानी सिर्फ शेयर बाजार में पैसा लगाने की नहीं है. यह बताती है कि कुछ माता-पिता अब बच्चों की आर्थिक योजना को जन्म से ही शुरू करने लगे हैं. पहले बचत का मतलब बैंक में पैसा जमा करना था, फिर म्यूचुअल फंड और इंश्योरेंस जैसे विकल्प आए और अब शेयर बाजार व ETF भी बच्चों के भविष्य की प्लानिंग का हिस्सा बन रहे हैं. लेकिन यहां एक बात याद रखना जरूरी है- जल्दी निवेश का मतलब पक्का मुनाफा नहीं है. बाजार में जोखिम रहेगा, निवेश की कीमत घट भी सकती है और बढ़ भी सकती है. फिर भी साउथ कोरिया में चल रहा यह ट्रेंड एक दिलचस्प सवाल जरूर छोड़ता है- क्या आने वाले समय में बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र के साथ उसका बैंक अकाउंट ही नहीं, इन्वेस्टमेंट अकाउंट भी खोलना सामान्य बात बन जाएगा?














