Indian Deligation to Taiwan: भारत ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में कूटनीतिक सरगर्मी तेज कर दी है. चीन के कड़े विरोध और ‘वन चाइना पॉलिसी’ की धमकियों के बीच, भारत के युवा राजनेताओं का एक उच्च-स्तरीय सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल इस समय ताइवान की यात्रा पर है. यह दौरा न केवल व्यापारिक और तकनीकी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसके राजनीतिक निहितार्थ बीजिंग की नींद उड़ाने के लिए काफी हैं. बता दें कि ये दौरा इस मामले में भी खास है कि क्योंकि 27 साल पहले 1999 में नरेंद्र मोदी (पीएम मोदी) ताइवान के दौरे पर गए थे. भारतीय डेलिगेशन से पहले साल 2022 में नेन्सी पेलोसी के नेतृत्व में अमेरिकी डेलिगेशन ताइवान के यात्रा पर पहुंचा था. जिसका चीन ने जमकर विरोध किया था. साथ ही उसने ताइवान की खाड़ी में अपने सैन्य पेट्रोलिंग बढ़ा दिए थे.
ताइवान के विदेश मंत्रालय (MOFA) द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, भारत का यह प्रतिनिधिमंडल 4 मई से 9 मई 2026 तक ताइवान के दौरे पर रहेगा. इस डेलिगेशन की सबसे बड़ी खासियत इसकी विविधता है. इसमें सत्तापक्ष और विपक्ष के कई प्रमुख दलों के युवा चेहरे शामिल हैं, जिसमें भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, राष्ट्रीय पीपल्स पार्टी और शिवसेना (यूबीटी) शामिल है. प्रतिनिधिमंडल के सदस्य अपने प्रवास के दौरान ताइवान की विभिन्न सरकारी एजेंसियों के अधिकारियों से मुलाकात करेंगे और द्विपक्षीय हितों पर चर्चा करेंगे.
भारत और ताइवान दोस्ती की नई इबारत लिख रहे हैं.
सिर्फ राजनीति नहीं, तकनीक पर समझौता
प्रतिनिधिमंडल का यह दौरा काफी खास है. ताइवान के बयान के अनुसार, भारतीय नेता मुख्य रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करेंगे:
- आर्थिक और व्यापारिक टेक्नोलॉजी: ताइवान सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स का वैश्विक केंद्र है.
- शिक्षा और संस्कृति: दोनों देशों के बीच अकादमिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना.
- लोकतंत्र और मानवाधिकार: एक लोकतांत्रिक देश के रूप में ताइवान की कार्यप्रणाली को समझना.
ताइवान सरकार ने भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक ‘अहम साझेदार’ बताया है और विस्तृत कूटनीति के तहत सहयोग जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई है.
1999 का वो दौरा
इस दौरे की चर्चा के बीच साल 1999 का वह वाकया भी ताजा हो गया है. जब वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (तब वे भाजपा के महासचिव थे) ताइवान के दौरे पर गए थे. उस समय भी चीन ने भारतीय नेताओं के ताइवान जाने का पुरजोर विरोध किया था. हालांकि, मोदी ने उस दौर में भी भारत-ताइवान संबंधों की संभावनाओं को भांप लिया था. आज, जब भारत ‘एक्ट ईस्ट’ नीति पर काम कर रहा है, तो युवा नेताओं का यह दौरा उसी कड़ी का विस्तार माना जा रहा है.
चीन की तिलमिलाहट; भारत की कूटनीति
चीन हमेशा से ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है. दुनिया के किसी भी देश के प्रतिनिधिमंडल के वहां जाने को अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करार देता है. पहले भी कई बार भारतीय सांसदों के ताइवान दौरे पर चीन ने आधिकारिक विरोध दर्ज कराया है. लेकिन भारत ने ‘सामरिक स्वायत्तता’ का परिचय देते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी कूटनीतिक यात्राओं और व्यापारिक संबंधों के लिए स्वतंत्र है.
अमेरिका के डेलिगेशन पर भी बिलबिलाया था चीन
अगस्त 2022 में तत्कालीन अमेरिकी हाउस स्पीकर नैन्सी पेलोसी के नेतृत्व में जब अमेरिकी डेलिगेशन ताइवान पहुंचा, तो बीजिंग की प्रतिक्रिया ने पूरी दुनिया को युद्ध की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया था. चीन ने इसे अपनी ‘वन चाइना पॉलिसी’ का सीधा उल्लंघन और संप्रभुता पर हमला करार दिया. जवाब में चीनी सेना (PLA) ने ताइवान को छह तरफ से घेरकर अब तक का सबसे बड़ा और आक्रामक सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया, जिसमें पहली बार ताइवान के ऊपर से मिसाइलें दागी गईं. इस तनाव के कारण न केवल वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई, बल्कि वाशिंगटन और बीजिंग के बीच कूटनीतिक रिश्ते अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँच गए.
संबंध खराब हो गए थे
इस ऐतिहासिक यात्रा के बाद अमेरिका और चीन के बीच सैन्य संवाद और जलवायु परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत पूरी तरह ठप हो गई थी. चीन ने ताइवान पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए और अपने युद्धपोतों व लड़ाकू विमानों की घुसपैठ को एक ‘न्यू नॉर्मल’ (नया सामान्य) बना दिया, जो आज भी जारी है. वहीं, अमेरिका ने पीछे हटने के बजाय ताइवान के साथ अपने ‘अनौपचारिक’ संबंधों को और मजबूत किया और क्षेत्र में अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ा दी.
भारतीय प्रतिनिधिमंडल ताइवान के दौरे पर कब से कब तक है?
ताइवान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह प्रतिनिधिमंडल 4 मई से 9 मई 2026 तक के दौरे पर है.
इस प्रतिनिधिमंडल में कौन-कौन से भारतीय राजनीतिक दल शामिल हैं?
इस डेलिगेशन में भारतीय जनता पार्टी (BJP), राष्ट्रीय पीपल्स पार्टी (NPP), कांग्रेस, और शिवसेना (यूबीटी) समेत कई अन्य दलों के युवा राजनेता शामिल हैं.
प्रतिनिधिमंडल के सदस्य ताइवान में किन विषयों पर चर्चा करेंगे?
सदस्य मुख्य रूप से आर्थिक और व्यापारिक टेक्नोलॉजी, शिक्षा, संस्कृति, लोकतंत्र और मानवाधिकारों से जुड़े विषयों को समझने और सहयोग बढ़ाने पर चर्चा करेंगे.
नरेंद्र मोदी ने ताइवान का दौरा कब किया था?
नरेंद्र मोदी ने साल 1999 में ताइवान का दौरा किया था, जब वे भाजपा के पदाधिकारी थे.
ताइवान के विदेश मंत्रालय ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की क्या भूमिका बताई है?
ताइवान के आधिकारिक बयान में भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक ‘अहम साझेदार’ बताया गया है.



















