सुरेश चंद्र अग्रवाल और उनके बेटे नरेश अग्रवाल को 4 अक्टूबर से 16 अक्टूबर तक हुई रामलीला के दौरान रामलीला कमेटी के पदाधिकारियों ने 6 अक्टूबर को सम्मानित किया था
मथुरा के वृंदावन में बेटे ने कारोबारी पिता की हत्या कर दी थी। इसके बाद खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। शनिवार देर शाम मोक्ष धाम पर दोनों का अंतिम संस्कार कर दिया गया। सुरेश अग्रवाल को उनके बड़े बेटे दिनेश ने और नरेश अग्रवाल को उनके बेटे शौर्य ने म
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बीड़ी का कारोबार कर प्रतिष्ठा हासिल करने वाले कारोबारी सुरेश चंद्र अग्रवाल को 2 वर्ष पहले कैंसर की शिकायत हुई। शुरुआती स्टेज में जानकारी होने पर उन्होंने इसका ट्रीटमेंट कराया। नतीजा 6 महीने में ही उन्होंने कैंसर को हराकर जिंदगी की जंग जीत ली। लेकिन कैंसर से जीतने वाले सुरेश चंद्र अग्रवाल अपने बेटे से हार गए।
सुरेश चंद्र अग्रवाल को 2 वर्ष पहले कैंसर की शिकायत हुई थी।
जरा सी जिद ने उजाड़ दी दो मांग
अंतिम संस्कार में शामिल होने पहुंचे लोग चर्चा कर रहे थे कि हंसता खेलता परिवार कैसे बिखर गया। जरा सी बेटे की जिद और सनक ने दो मांग उजाड़ दी। नरेश अगर जिद न करते और शराब के नशे में पिता से न झगड़ते तो पिता भी जिंदा होते और वह खुद भी।
अंतिम संस्कार में शामिल लोगों का कहना था सुरेश अग्रवाल ने जीवन में बहुत संघर्ष किया। उन्होंने कैंसर जैसी बीमारी को हरा दिया, लेकिन बेटे के हाथों लिखी मौत को नहीं हरा सके।

बेटे नरेश की जिद और सनक ने दो मांग उजाड़ दी
आटा पिसाई का किया काम
सुरेश चंद्र अग्रवाल के मित्र भीमसेन अग्रवाल ने बताया कि सुरेश आज कामयाबी की जिस ऊंचाई पर पहुंचे वह उसकी मेहनत और ईमानदारी का नतीजा था। सुरेश चंद्र अग्रवाल सवा मन शालिग्राम मंदिर के नीचे दुकान में आटा चक्की चलाते थे। यहां उनकी मुलाकात पश्चिम बंगाल के एक व्यक्ति से हुई। उसने सुरेश को बीड़ी का काम करने की सलाह दी। यह सुरेश चंद्र अग्रवाल के जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया।

सुरेश चंद्र अग्रवाल के घर पर सन्नाटा पसरा हुआ है,घर से केवल रोने बिलखने की आवाज आ रही हैं
मेहनत और लगन ने दिलाई कामयाबी
सुरेश चंद्र अग्रवाल ने जब बीड़ी का काम शुरू किया तो खुद शिवपुरी जाकर जंगल में रहकर पत्ते तलाशते थे। उसके बाद एक कमरे में खुद और बेटों के साथ बीड़ी बनाते थे। धीरे धीरे काम ने रफ़्तार पकड़ी और 35 साल में वह बड़े कारोबारी बन गए। सुरेश चंद्र अग्रवाल ने बड़े बेटे दिनेश के नाम से फर्म बनाई और नाम रखा दिनेश बीड़ी। इस फर्म में तीनों बेटों और खुद की बराबर की हिस्सेदारी रखी जिससे कभी कोई विवाद न हो। इसी फर्म के नाम से जमीन खरीदी।

