बीजिंग32 मिनट पहले
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अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने रूस की बड़ी तेल कंपनियों और उनके कुछ ग्राहकों पर पाबंदियां लगाई हैं, जिसके बाद अब चीन की तेल कंपनियां रूसी तेल खरीदने से पीछे हट रही हैं।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक चीन की सरकारी कंपनियां जैसे सिनोपेक और पेट्रोचाइना ने हाल ही में रूस से तेल की कई खेपें रद्द कर दी हैं। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि अमेरिका ने पिछले महीने रूस की दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों, रॉसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध लगाए थे।
चीन की कुछ निजी छोटी रिफाइनरियां, जिन्हें टीपॉट्स कहा जाता है, भी रूसी तेल खरीदने से डर रही हैं। उन्हें डर है कि अगर उन्होंने रूस से सौदा किया तो उन पर भी वैसी ही सजा लग सकती है जैसी ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने हाल ही में शानडोंग युलोंग पेट्रोकेमिकल कंपनी पर लगाई थी।
इससे पहले रॉयटर्स की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारतीय रिफाइनिंग कंपनी रिलायंस सरकार की गाइडलाइंस के हिसाब से अपनी रूसी तेल की खरीदारी एडजस्ट कर रही है। सरकारी कंपनियां भी शिपमेंट चेक कर रही है। पूरी खबर पढ़ें…

जापान सागर के किनारे बसा रूस का कोजमिनो पोर्ट।
बैन की वजह से रूसी तेल की कीमतें गिरीं
ब्लूमबर्ग ने रिस्टैड एनर्जी के हवाले से बताया है कि चीन में खरीदारों की हड़ताल के चलते रूस से चीन को होने वाले तेल निर्यात का करीब 45% हिस्सा प्रभावित हुआ है।
इसका सबसे ज्यादा असर ESPO क्रूड ऑयल पर पड़ा है। यह रूस का वो तेल मिश्रण है जो एशियाई देशों को सबसे ज्यादा बेचा जाता है। अब इसकी कीमतें गिर गई हैं, क्योंकि रूसी विक्रेताओं को खरीदारों को आकर्षित करने के लिए तेल सस्ता बेचना पड़ रहा है।
पहले ESPO तेल की कीमत ब्रेंट क्रूड से 1 डॉलर ज्यादा थी, लेकिन अब यह सिर्फ 0.50 डॉलर ज्यादा रह गई है। नए अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से कई भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से तेल खरीदना रोक दिया है।
हालांकि, भारत की सबसे बड़ी कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) ने उन आपूर्तिकर्ताओं से यूराल क्रूड की खरीद फिर से शुरू की है, जो नए अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में नहीं आते।
अमेरिकी प्रतिबंधों का असर तुर्किये पर भी
प्रतिबंधों का असर तुर्किये पर भी दिख रहा है। वहां की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी, जो पहले लगभग पूरी तरह रूसी तेल पर निर्भर थी, अब दिसंबर की डिलीवरी के लिए इराक और कजाखिस्तान से तेल खरीद रही है।
एक और बड़ी कंपनी टुप्रास ने भी अपने एक रिफाइनरी प्लांट में रूसी तेल का इस्तेमाल बंद कर दिया है, ताकि वह अपने ईंधन निर्यात को यूरोपीय बाजारों में बेचने में दिक्कतों से बच सके।
रूस अब तक चीन का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह से उसका तेल बहुत सस्ता मिल रहा था।
लेकिन अब अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने रूस के तेल उत्पादकों और उनके खरीदारों दोनों पर पाबंदियां बढ़ा दी हैं, ताकि रूस की तेल से होने वाली कमाई को रोका जा सके और उस पर युद्ध खत्म करने का दबाव बनाया जा सके।
ब्लैकलिस्टेड कंपनियों को तेल बेच रहा रूस
हालांकि रूस के लिए यह पूरी तरह नुकसान का सौदा नहीं है। जिस युलोंग कंपनी को पश्चिमी देशों ने ब्लैकलिस्ट किया था और जिससे कई देशों ने तेल सौदे रद्द कर दिए थे, वह अब मजबूरी में रूस से ही तेल खरीद रही है क्योंकि उसके पास और कोई विकल्प नहीं बचा।
दूसरी निजी चीनी रिफाइनरियां स्थिति देख रही हैं और फिलहाल कोई ऐसा कदम नहीं उठा रहीं जिससे उन पर भी प्रतिबंध लग सकें। इसके अलावा, चीन में इन निजी रिफाइनरियों के पास इस साल के लिए तेल आयात का कोटा लगभग खत्म हो चुका है।
टैक्स नीतियों में हाल के बदलावों के कारण भी वे अन्य स्रोतों से तेल नहीं खरीद पा रही हैं। इसका मतलब है कि भले वे रूस से सस्ता तेल खरीदना चाहें, फिर भी वे ऐसा नहीं कर पाएंगी।
ट्रम्प-जिनपिंग की मुलाकात से हालात उलझे
रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रम्प और शी जिनपिंग की मुलाकात से हालात और उलझ गए हैं। दोनों नेताओं ने सेमीकंडक्टर, रेयर अर्थ मेटल्स और सोयाबीन जैसे व्यापारिक मसलों पर तो कुछ नए समझौते किए, लेकिन रूसी तेल पर कोई चर्चा नहीं हुई।
इसी बीच अमेरिका ने घोषणा की है कि चीन अपने रेयर अर्थ मेटल्स पर लगाए गए नए निर्यात नियंत्रणों को स्थगित करेगा और अमेरिकी सेमीकंडक्टर कंपनियों पर चल रही जांचें खत्म करेगा।
इसके अलावा, क्लीन एनर्जी कंपनियों के शेयरों में उछाल देखने को मिला है, जिससे हरे-ऊर्जा में निवेशकों को उम्मीद जगी है कि लंबे समय से चल रही मंदी अब खत्म हो सकती है।
वहीं, चीन ने सोने पर मिलने वाली कर छूट भी खत्म करने का फैसला किया है, जो दुनिया के सबसे बड़े सोना बाजारों में से एक के लिए झटका माना जा रहा है।

