दही, इडली और कांजी जैसे कई पारंपरिक भारतीय खाद्य पदार्थ हमारी डाइट का हिस्सा हैं. इनकी खासियत सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि इन्हें बनाने का तरीका भी है. इन खाद्य पदार्थों को तैयार करने में फर्मेंटेशन यानी किण्वन की प्रक्रिया का इस्तेमाल होता है. इस दौरान कुछ सूक्ष्मजीव भोजन में मौजूद शुगर और दूसरे तत्वों को बदलते हैं, जिससे उसके स्वाद, बनावट और पोषण में बदलाव आ सकता है. लेकिन क्या फर्मेंटेशन से हर खाना ज्यादा हेल्दी हो जाता है? आइए समझते हैं.
फर्मेंटेशन एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें बैक्टीरिया और यीस्ट जैसे सूक्ष्मजीव भोजन में मौजूद कुछ पोषक तत्वों, खासकर शुगर, को बदलते हैं. इस प्रक्रिया से लैक्टिक एसिड जैसे पदार्थ बन सकते हैं, जो खाने का स्वाद और उसकी अम्लता बदल देते हैं. कई खाद्य पदार्थों में इससे उनकी शेल्फ लाइफ बढ़ाने में भी मदद मिलती है. फर्मेंटेशन का असर इस बात पर निर्भर करता है कि कौन-सा खाद्य पदार्थ इस्तेमाल किया गया है, उसमें कौन-से सूक्ष्मजीव मौजूद हैं और उसे कितनी देर तक किस तापमान पर रखा गया है.
दही बनाने के लिए दूध में खास तरह के बैक्टीरिया मिलाए जाते हैं. ये दूध में मौजूद लैक्टोज यानी प्राकृतिक शुगर के एक हिस्से को लैक्टिक एसिड में बदल देते हैं. इसी वजह से दूध गाढ़ा होता है और दही में हल्का खट्टापन आता है. दही प्रोटीन और कैल्शियम का अच्छा स्रोत है. फर्मेंटेशन के दौरान लैक्टोज की कुछ मात्रा टूटने के कारण कुछ लोगों को दूध के मुकाबले दही पचाना आसान लग सकता है. दही में जीवित और सक्रिय बैक्टीरिया भी हो सकते हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी और मात्रा बनाने के तरीके और उत्पाद पर निर्भर करती है.
इडली का बैटर फर्मेंट करने से क्या होता है?
इडली चावल और उड़द दाल के बैटर से बनाई जाती है, जिसे पकाने से पहले कुछ समय तक फर्मेंट होने दिया जाता है. इस दौरान सूक्ष्मजीव एसिड और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी चीजें बनाते हैं. इससे बैटर फूलता है और इडली नरम व स्पंजी बनती है. शोध बताते हैं कि इडली के बैटर में फर्मेंटेशन से कुछ बी-विटामिन और प्रोटीन के पाचन से जुड़े गुणों में बदलाव आ सकता है. अनाज और दालों में मौजूद फाइटेट जैसे कुछ तत्वों की मात्रा भी घट सकती है, जिससे कुछ मिनरल्स की उपलब्धता बढ़ने में मदद मिल सकती है. हालांकि, इडली को भाप में पकाने से फर्मेंटेशन के दौरान मौजूद कई जीवित सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं.
कांजी में क्या खास है?
काली गाजर या चुकंदर, पानी, नमक और मसालों से बनाई जाने वाली कांजी उत्तर भारत का पारंपरिक फर्मेंटेड पेय है. इसके फर्मेंटेशन में लैक्टिक एसिड बनाने वाले बैक्टीरिया भूमिका निभा सकते हैं. इससे पेय में खट्टापन विकसित होता है और उसमें मौजूद सूक्ष्मजीवों की संरचना बदलती है. काली गाजर में एंथोसायनिन जैसे एंटीऑक्सिडेंट यौगिक पाए जाते हैं. कांजी पर हुई कुछ रिसर्च में लाभकारी बैक्टीरिया और एंटीऑक्सिडेंट गतिविधि के संकेत मिले हैं. हालांकि, घर पर बनी हर कांजी में बैक्टीरिया की मात्रा और प्रकार एक जैसे नहीं होते.
क्या फर्मेंटेड खाना हमेशा ज्यादा हेल्दी होता है?
जरूरी नहीं. फर्मेंटेशन कुछ खाद्य पदार्थों के पाचन और पोषक तत्वों की उपलब्धता को बेहतर बना सकता है, लेकिन इसके फायदे हर भोजन में अलग होते हैं. हर फर्मेंटेड चीज में प्रोबायोटिक्स होने या उससे किसी बीमारी का इलाज होने का दावा भी सही नहीं है.

