सत्ता के काम में हर पग पर मतभेद होने ही होते हैं। यह नई बात नहीं है। शहरों के वार्डों को काट छांटकर सत्ताधारी पार्टी के जीतने की राह बनाने के काम में जुटे नेताओं में भी मतभेद हो गए।
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राजधानी की चर्चित सीट पर वार्डों की कांट-छांट पर सत्ताधारी विधायक नाराज हो गए। कांट-छांट के प्रस्ताव बनाने वाले नेताजी भी पहले उस सीट से विधायक रहे हैं, इसलिए वे अपने हिसाब से शहरी निकाय के वार्ड बनाना चाह रहे थे।
मौजूदा सत्ताधारी विधायक इस पर सहमत नहीं हुए। मतभेद इतने गहराए कि बात झगड़े तक पहुंच गई। दोनों के बीच खूब गर्मागर्म बहस हुई। बीच बचाव तो हुआ लेकिन बातें बाहर आ गईं। झगड़े वाली बात मुखिया तक भी पहुंचाई गई है।
राजधानी में संवैधानिक मुखिया का घर भी पानी-पानी
बारिश खुशहाली के साथ शहरों के बदहाल पानी निकासी सिस्टम को भी उजागर कर जाती है। हाल ही राजधानी में हुई तेज बारिश ने सिविल लाइंस में रहने वाले कर्ताधर्ताओं के घरों तक भी तालाब जैसे हालात बना दिए।
संवैधानिक पद वाले नेताजी के बंगले में भी बारिश का पानी के साथ सीवर लाइन तक का पानी उफन गया। तुरंत अफसरों को तलब किया गया। हाथों हाथ पानी निकालने की व्यवस्था की गई, लेकिन काम में समय तो लगता ही है।
रात के वक्त संवैधानिक पद वाले नेताजी को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। अब सिविल लाइंस में ये हालत हैं तो बाकी जगह क्या हुए होंगे, आप समझ सकते हैं।

मंत्री के घर गुप्त डिनर से ऑल इज वेल का मैसेज
सियासत में साथ मिल बैठ कर ऑल इज वेल का मैसेज देने के लिए कोई न कोई बहाना चाहिए होता है। साथ मिलकर दावत करने से बढ़िया कुछ नहीं हो सकता। पिछले दिनों मारवाड़ से पहली बार मंत्री बने नेताजी के घर डिनर रखा गया।
प्रदेश के मुखिया से लेकर सब सीनियर-जूनियर मंत्री शामिल हुए। इस डिनर में बाबा के नाम से मशहूर मंत्रीजी नहीं आए। प्रदेश के मुखिया भी देश की राजधानी से लौटकर आए थे।
मंत्री के घर रखे गए इस गुप्त डिनर का कोई फोटो-वीडियो बाहर नहीं आया, जबकि इससे पहले उपमुखिया के घर डिनर को अच्छी तरह फिल्माया गया था। सुना है, डिनर का मकसद ऑल इज वेल का मैसेज देना था।
सत्ताधारी विधायकों में जन्मदिन पर मुखिया को बुलाकर शक्ति प्रदर्शन का ट्रेंड
सियासत में ताकत दिखाने का सबसे बड़ा जरिया जनता का जमावड़ा ही है। जो सबसे ज्यादा जनता को जुटा ले वही सियासी ताकत का पैरामीटर माना जाता है।
पिछले दिनों सत्ताधारी विधायकों ने जन्मदिन पर बड़े आयोजन कर खूब भीड़ जुटाई। प्रदेश के मुखिया को बुलाकर खुद की लोकप्रियता दिखाने का प्रयास किया।
चित्तौड़गढ़ और अजमेर जिले के चर्चित विधायकों के बाद कई और विधायक भी अब यही फाॅर्मूला अपना रहे हैं। अब पूर्वी राजस्थान में भी सत्ताधारी विधायक ऐसा ही आयोजन करने वाले हैं।
मंत्रिमंडल फेरबदल और राजनीतिक नियुक्तियों से पहले किए जा रहे ये शक्ति प्रदर्शन यूं ही नहीं है। अब शक्त प्रदर्शन में कौन पास होता है, इसके रिजल्ट का इंतजार है।

उपराष्ट्रपति से इस्तीफे के बाद एकांतवास, शुभचिंतकों की नो एंट्री
उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के बाद देश से लेकर प्रदेश की राजधानी तक चर्चाओं का बाजार गर्म है। संवैधानिक पद संभाल चुके नेताजी राजस्थान के हैं तो हलचल स्वाभाविक है।
इस्तीफे के बाद प्रदेश के कुछ नेताओं शुभचिंतकों ने देश की राजधानी का रुख किया, लेकिन कोई भी मुलाकात करने में सफल नहीं हो सका। जिसने भी मिलने का वक्त मांगा, उन्हें फिलहाल रेड सिग्नल दे दिया।
इस्तीफे के बाद से एकांतवास ही चल रहा है। मिलने में नाकाम कुछ शुभचिंतकों को कुरेदा तो शिष्टाचार के लिए मिलने आने की ही बात कही, हालांकि इनमें कुछ ऐसे भी मिले जिन्होंने राजनीतिक तौर पर सहानुभूति जताने से इनकार किया।
विपक्षी संगठन मुखिया को पूर्व मुखिया ने क्यों नहीं दी सार्वजनिक बधाई?
विपक्षी संगठन मुखिया को पिछले दिनों पद पर पांच साल का कार्यकाल पूरा हो गया। पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले नेताओं के क्लब में शामिल होने पर नेताओं ने अलग अलग तरह से बधाई दी।
कुछ ने सोशल मीडिया पर तो किसी ने फोन पर तो कुछ ने मिलकर बधाई दी। प्रदेश के पूर्व मुखिया ने सार्वजनिक रूप से बधाई नहीं दी, भले ही फोन पर दे दी होगी।
विपक्षी नेताओं में सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा सक्रिय रहने वाला नेता अगर सार्वजनिक बधाई नहीं दे तो कुछ कारण तो होगा। सियासी जानकार इसे नए समीकरणों से जोड़कर देख रहे हैं।
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