लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने अंडरवर्ल्ड डॉन ओमप्रकाश श्रीवास्तव उर्फ बबलू श्रीवास्तव को रंगदारी मांगने के मामले में दोषमुक्त कर दिया है। आरोप था कि प्रयागराज की नैनी जेल में बंद रहने के दौरान उसने दूसरे व्यक्ति के सिम कार्ड का इस्तेमाल कर कोलकाता के होटल व्यवसायी से 5 करोड़ रुपए की रंगदारी मांगी थी। शुक्रवार को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रतिभा सिंह ने साक्ष्यों के अभाव में उसे बरी करने का आदेश दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। अभियोजन का पूरा कथानक भी विश्वसनीयता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। कोर्ट ने बबलू श्रीवास्तव को 20 हजार रुपए का जमानत बांड दाखिल करने का निर्देश दिया। साथ ही कहा कि फैसले के खिलाफ अपील होने पर वह अपीलीय अदालत के नोटिस पर उपस्थित होगा। ‘जेल में कैसे पहुंचा सिंह एजेंसी नहीं बता पाई’ बचाव पक्ष के अधिवक्ता जीशान अल्वी ने कोर्ट में दलील दी कि सीबीआई यह साबित नहीं कर सकी कि नैनी जेल में बंद रहने के दौरान बबलू श्रीवास्तव ने किसी दूसरे व्यक्ति के मोबाइल से फोन कर धमकी दी या रंगदारी वसूलने की कोशिश की। जांच एजेंसी यह भी पता नहीं लगा सकी कि उसके पास इस्तेमाल किए जा रहे सिम कार्ड जेल के अंदर कैसे पहुंचे।अधिवक्ता ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं है, जिससे बबलू श्रीवास्तव के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित हो सकें। हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने दर्ज किया था केस मामले की शुरुआत 14 दिसंबर 1998 को हुई थी। धीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कैंट थाने में शिकायत दर्ज कराई थी कि उन्होंने अपना सिम कार्ड संतोष शर्मा, मुदित श्रीवास्तव और गौरव श्रीवास्तव को बेच दिया था। कुछ समय बाद मोबाइल के करीब 9 हजार रुपए का बिल आने पर उन्होंने एस्सार कंपनी से संपर्क किया। आरोप है कि कंपनी के कर्मचारियों ने उन्हें बताया कि उनके सिम का इस्तेमाल एक प्रभावशाली व्यक्ति कर रहा है। इसके बाद शिकायतकर्ता को धमकी मिलने लगी। आरोप लगाया गया कि उसका सिम नैनी जेल में बंद बबलू श्रीवास्तव इस्तेमाल कर रहा है। शिकायत में परिवार को खत्म करने की धमकी देने की बात भी कही गई थी। जेल से गैंग चलाने और रंगदारी वसूलने का था आरोप हाईकोर्ट ने 1 फरवरी 1999 को नैनी जेल से मोबाइल के जरिए गैंग के सदस्यों से संपर्क करने और बाहर अपराध कराने के आरोपों की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। इसके बाद सीबीआई ने 24 फरवरी 1999 को मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की।सीबीआई के मुताबिक, बबलू श्रीवास्तव 31 जनवरी 1997 से 11 जून 1999 तक नैनी जेल में बंद था। आरोप था कि वह जेल के अंदर मोबाइल और अलग-अलग सिम कार्ड का इस्तेमाल कर कृष्णा शेट्टी समेत अपने साथियों से संपर्क करता था। उसके सहयोगियों पर जेल कर्मचारियों को रिश्वत देकर मोबाइल और सिम पहुंचाने का भी आरोप था।
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लखनऊ CBI कि विशेष अदालत ने बबलू को किया बरी: 20 साल पुराने मामले में मिली राहत , धमकी – रंगदारी के थे आरोप – Lucknow News
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