नई दिल्ली. भारत में सोना और चांदी की कीमतों में हाल के दिनों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. इस हफ्ते दोनों कीमती धातुओं में गिरावट दर्ज की गई है, जिससे निवेशकों में असमंजस की स्थिति बन गई है. हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह गिरावट अस्थायी हो सकती है और आगे बाजार में नई तेजी देखने को मिल सकती है.
घरेलू बाजार में सोना-चांदी का हाल
Indian Bullion and Jewellers Association के आंकड़ों के मुताबिक, 24 कैरेट सोने की कीमत 1,51,479 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास बंद हुई. वहीं Multi Commodity Exchange पर सोना मामूली बढ़त के साथ 1,52,799 रुपये पर पहुंच गया. चांदी की बात करें तो MCX पर इसकी कीमत 2,44,877 रुपये तक दर्ज की गई, जिसमें हल्की तेजी देखने को मिली.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में दबाव
वैश्विक बाजार में भी सोना और चांदी पर दबाव बना हुआ है. सोना हल्की रिकवरी के बावजूद पूरे हफ्ते गिरावट में रहा, जबकि चांदी में भी कमजोरी देखने को मिली. अमेरिका- ईरान जंग के चलते बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है, जिसका असर निवेशकों के फैसलों पर साफ दिख रहा है.
गिरावट के पीछे क्या हैं कारण
सोना-चांदी की कीमतों में कमजोरी का सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और मजबूत डॉलर माना जा रहा है. तेल की कीमत बढ़ने से महंगाई बढ़ती है, जिससे ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं. इसका सीधा असर गोल्ड और सिल्वर जैसे निवेश विकल्पों पर पड़ता है, क्योंकि इन पर रिटर्न अपेक्षाकृत कम हो जाता है.
बाजार में अनिश्चितता का माहौल
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव, साथ ही अन्य देशों के बीच चल रही कूटनीतिक गतिविधियों ने बाजार को अस्थिर बना रखा है. निवेशक फिलहाल सतर्क नजर आ रहे हैं और बड़े फैसले लेने से बच रहे हैं. यही वजह है कि सोना-चांदी की कीमतें एक सीमित दायरे में घूम रही हैं.
क्या यह खरीदारी का सही समय है?
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा गिरावट के बावजूद लंबी अवधि में सोना-चांदी मजबूत बने रह सकते हैं. कीमतों में गिरावट को कई निवेशक खरीदारी के मौके के रूप में देख रहे हैं. सोने के लिए 1,50,000 रुपये के आसपास सपोर्ट और 1,55,000 रुपये से ऊपर रेजिस्टेंस माना जा रहा है, जबकि चांदी 2,40,000 से 2,50,000 रुपये के बीच रह सकती है.
आगे का ट्रेंड क्या कहता है
आने वाले समय में सोना-चांदी की दिशा काफी हद तक वैश्विक घटनाओं और आर्थिक नीतियों पर निर्भर करेगी. अगर जियोपॉलिटिकल तनाव बढ़ता है, तो इनकी कीमतों में तेजी आ सकती है. वहीं अगर हालात सामान्य होते हैं, तो बाजार में स्थिरता देखने को मिल सकती है. ऐसे में निवेशकों को सोच-समझकर और लंबी अवधि के नजरिए से निर्णय लेना जरूरी है.

