Last Updated:
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें लंबे समय से स्थिर हैं, लेकिन अब इनमें बढ़ोतरी के संकेत मिल रहे हैं. सरकारी तेल कंपनियां बढ़ती लागत और निगेटिव मार्जिन के चलते कीमतें बढ़ाने की मांग कर रही हैं. रिपोर्ट के अनुसार ₹2 से ₹4 प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी संभव है. कच्चे तेल की ऊंची कीमत, सरकारी राजस्व दबाव और LPG पर बढ़ती लागत इस फैसले को और करीब ला रही है.
अतंरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थीं.
नई दिल्ली. जो डर लंबे समय से बना हुआ था, वह अब हकीकत में बदल सकता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं, लेकिन भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम लंबे समय से स्थिर हैं. अब संकेत मिल रहे हैं कि यह स्थिति ज्यादा दिन नहीं चलेगी और जल्द ही ग्राहकों पर महंगाई का असर दिख सकता है.
रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी तेल कंपनियां अब बढ़ती लागत का बोझ खुद उठाने की स्थिति में नहीं हैं. ऐसे में आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹2 से ₹4 प्रति लीटर तक बढ़ोतरी हो सकती है. यह फैसला कभी भी लिया जा सकता है, क्योंकि कंपनियां लगातार सरकार के साथ बातचीत कर रही हैं.
कंपनियों पर बढ़ता दबाव, नुकसान का दावा
सरकारी तेल कंपनियां लगातार यह कह रही हैं कि मौजूदा कीमतों पर पेट्रोल, डीजल और LPG बेचना उनके लिए घाटे का सौदा बन गया है. पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी (Hardeep Singh Puri) के मुताबिक, एक समय कंपनियां पेट्रोल पर करीब ₹24 प्रति लीटर और डीजल पर ₹30 प्रति लीटर तक का नुकसान झेल रही थीं. इसके अलावा रेटिंग एजेंसी ICRA का अनुमान है कि मौजूदा हालात में कंपनियों का मार्केटिंग मार्जिन भी निगेटिव चल रहा है. पेट्रोल पर करीब ₹14 प्रति लीटर और डीजल पर ₹18 प्रति लीटर तक का दबाव बताया गया है.
सरकार का रुख, घाटा उतना बड़ा नहीं
हालांकि सरकार इस ‘भारी नुकसान’ के दावे से पूरी तरह सहमत नहीं दिख रही है. अधिकारियों का कहना है कि कंपनियां जिस नुकसान की बात कर रही हैं, वह पूरी तरह वास्तविक घाटा नहीं है. असल में इसमें ‘अंडर-रिकवरी’ और ‘वास्तविक नुकसान’ का फर्क समझना जरूरी है. अंडर-रिकवरी का मतलब है कि कंपनियों को जितना मुनाफा उम्मीद था, उतना नहीं मिल रहा. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे पूरी तरह घाटे में ही हैं.
क्रैक स्प्रेड का खेल क्या है
कीमतों की गणना में एक अहम फैक्टर होता है ‘क्रैक स्प्रेड’. यह कच्चे तेल और उससे बने फ्यूल के दाम के बीच का अंतर दिखाता है. जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार चढ़ाव ज्यादा होता है, तो यह मार्जिन बढ़ जाता है. सरकार का मानना है कि इसी क्रैक स्प्रेड को ज्यादा महत्व देने से नुकसान का आंकड़ा बड़ा दिखता है, जबकि असल लागत उतनी तेजी से नहीं बढ़ती.
सरकार पर भी दबाव, टैक्स में बड़ी कमी
तेल की कीमतों को स्थिर रखने के लिए सरकार पहले ही एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर चुकी है. अधिकारियों के मुताबिक, अगर ₹10 प्रति लीटर की कटौती की जाए तो साल भर में करीब ₹1.7 लाख करोड़ का राजस्व नुकसान होता है. इसका असर बजट पर भी पड़ रहा है. तेल से मिलने वाला राजस्व, जो GDP का करीब 0.8 प्रतिशत माना गया था, अब दबाव में आ गया है.
LPG और खाद पर बढ़ती चिंता
मामला सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है. LPG और खाद की लागत भी तेजी से बढ़ रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर मौजूदा ट्रेंड जारी रहता है तो FY27 तक LPG पर अंडर-रिकवरी ₹80,000 करोड़ तक पहुंच सकती है. कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतें पहले ही करीब ₹993 तक बढ़ चुकी हैं. वहीं आयातित यूरिया की कीमत भी लगभग दोगुनी हो गई है, जिससे सरकार पर खर्च का दबाव और बढ़ रहा है.
क्यों नहीं बढ़े अब तक दाम
एक बड़ा सवाल यह है कि जब कच्चा तेल इतना महंगा है तो अब तक कीमतें क्यों नहीं बढ़ीं. इसकी एक वजह चुनाव और महंगाई को नियंत्रित रखना भी मानी जा रही है. हालांकि, अब हालात बदल रहे हैं. वेस्ट एशिया में जारी तनाव के कारण सप्लाई पर असर पड़ रहा है और कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं.
About the Author

मैं जय ठाकुर, न्यूज18 हिंदी में सीनियर सब-एडिटर के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहा हूं. मेरा मुख्य काम बिजनेस की पेचीदा खबरों को आसान भाषा में लोगों तक पहुंचाना है. फिर चाहे वह शेयर बाजार की हलचल हो, देश की इकोनॉमी क…और पढ़ें

