Monday, October 19, 2026
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सुप्रीम कोर्ट बोला- प्रॉपर्टी खरीदने-बेचने का सिस्टम 300 साल पुराना: इससे प्रापर्टी खरीदना सदमे जैसा, हमें नए ढंग से सोचना होगा, विकल्प तलाशने होंगे


दिल्ली1 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने जमीन रजिस्ट्रेशन सुधार की जरूरत बताई।

सुप्रीम कोर्ट ने जमीन की रजिस्ट्री और जमीन के मालिकाने के ढांचे में बुनियादी सुधार की जरूरत बताई है। कोर्ट ने कहा कि ब्रिटिश राज के समय के कानूनों पर टिके मौजूदा ढांचे ने भ्रम, अकुशलता और बड़े स्तर पर मुकदमे पैदा किए हैं।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सुझाव दिया कि ये समस्याएं खत्म करने के लिए सरकार ब्लॉकचेन जैसी टेक्नॉलॉजी इस्तेमाल करने पर विचार करे। साथ ही, विधि आयोग को इस पर विस्तृत अध्ययन करने को कहा। आयोग से केंद्र, राज्य सरकारों, विशेषज्ञों और अन्य संबंधित पक्षों से रायशुमारी करके रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है।

प्रॉपर्टी खरीदने-बेचने का सिस्टम तीन सौ साल पुराने कानूनों से संचालित है। ये अलग दौर में बने थे। लेकिन, आज भी रीढ़ बने हुए हैं। इन कानूनों ने स्वामित्व और ​रजिस्ट्रेशन के बीच असमानता बना रखी है। कोर्ट ने बिहार रजिस्ट्रेशन रूल्स, 2008 का नियम 19 रद्द करते हुए ये टिप्पणियां कीं।

जमीन रजिस्ट्रेशन मुश्किल, डिजिटल सुधार जरूरी

कोर्ट ने कहा

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जमीन रजिस्ट्रेशन का पुराना तरीका संपत्ति खरीदने-बेचने को मुश्किल और उलझा हुआ बनाता है। संपत्ति खरीदना कभी आसान नहीं, बल्कि सदमे जैसा है।

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दीवानी मामलों में करीब 66% विवाद संपत्ति से जुड़े हैं। भारी मात्रा में भूमि विवादों के लिए मौजूदा सिस्टम मुख्य जिम्मेदार है। पुराना कानूनी ढांचा नकली दस्तावेज, अतिक्रमण, देरी, बिचौलियों की भूमिका और राज्यों में बिखरे नियमों जैसी खामियों से भरा है। उप-पंजीयक दफ्तरों में प्रशासनिक प्रक्रिया बोझिल और समय लेने वाली है।

कोर्ट ने डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम और नेशनल जेनरिक डॉक्यूमेंट रजिस्ट्रेशन सिस्टम की सराहना की। कहा- सिर्फ डिजिटलीकरण से समस्या हल नहीं होगी। रिकॉर्ड गलत है तो डिजिटल संस्करण भी वही गलती बढ़ाएगा।

सुझाव… टेक्नॉलॉजी अपनाएं, पुराने कानून बदलें

कोर्ट ने सुझाव दिया कि केंद्र, राज्यों के साथ पहल करे। ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882; रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908; इंडियन स्टैम्प एक्ट, 1899; एविडेंस एक्ट, 1872; सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000; और डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 की समीक्षा और संशोधन करें।

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