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New Vande Bharat Express : बेंगलुरु-मंगलुरु रेलवे रूट पर पड़ने वाला सकलेशपुर-सुब्रह्मण्य रोड घाट सेक्शन को भारत के खतरनाक रेलवे टैक्स में माना जाता है. अब इस रूट पर भी वंदे भारत एक्सप्रेस चलाने की तैयारी है. 11 अगस्त से वंदे भारत के ट्रायल शुरू होंगे.
इस रूट पर चलाने के लिए वंदे भारत में कुछ बदलाव किए गए हैं.
नई दिल्ली. जंगल, घाटियों, बहते झरनों और गहरी खाइयों के बीच से गुजरने वाला बेंगलुरु-मंगलुरु रेल सेक्शन सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि रोमांच से भरा एक अनूठा अनुभव है. पश्चिमी घाट की सुहानी वादियों के बीच स्थित सकलेशपुर-सुब्रह्मण्य रोड घाट सेक्शन को देश के सबसे कठिन रेल ट्रैक्स में गिना जाता है. अब इसी जादुई रूट पर वंदे भारत एक्सप्रेस दौड़ने वाली है. दक्षिण पश्चिम रेलवे 11 अगस्त से यहां सेमी-हाई-स्पीड वंदे भारत का ट्रायल रन शुरू करने जा रहा है.
यह रेल मार्ग जितना खूबसूरत है, उतना ही खतरनाक और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण भी है. सकलेशपुर से सुब्रह्मण्य रोड के बीच का यह 55 किलोमीटर लंबा पैच रेलवे इंजीनियरों की हमेशा परीक्षा लेता आया है. इस रूट पर पहाड़ों को काटकर बनाई गई 57 सुरंगें हैं, जिनमें से गुजरना एक रोमांचक अनुभव होता है.
108 तीखे मोड़ और 250 से ज्यादा पुल
सकलेशपुर-सुब्रह्मण्य रोड घाट सेक्शन 108 खतरनाक मोड़ हैं. पहाड़ी ढलाओं पर बने ये मोड़ ट्रेन की राइड को किसी रोलर-कोस्टर जैसा रोमांच देते हैं. इस रूट पर 250 से अधिक ऊंचे पुल गहरी खाइयों और बरसाती नदियों के ऊपर बनें हैं. 1:50 की सीधी खड़ी ढलान (Gradient) पर ट्रेन को संतुलित रखना सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती है.
वंदे भारत मे लगाए गए हैं ऑटो इमरजेंसी ब्रेक
पहाड़ी ढलानों और तीखे मोड़ों पर एक स्व-चालित (Self-Propelled) ट्रेनसेट को संभालना आसान नहीं होता. इसी को ध्यान में रखते हुए रेलवे ने इस रूट पर चलाने के लिए 8-कोच वाली विशेष वंदे भारत ट्रेन तैयार की है. इसमें ऑटो इमरजेंसी ब्रेक (AEB) सिस्टम लगाया है.
कैसे काम करेगा यह सिस्टम?
जब ट्रेन नीचे की ओर ढलान पर उतरेगी और अगर उसकी स्पीड तय सीमा से थोड़ी भी ज्यादा होगी, तो इमरजेंसी ब्रेक सिस्टम अपने आप ब्रेक लगा देगा. 11 अगस्त को होने वाले ट्रायल के दौरान रेलवे अधिकारी इसी सिस्टम, ट्रेन की ब्रेकिंग क्षमता और क्रू हैंडलिंग का गहराई से परीक्षण करेंगे.
इस कठिन मार्ग पर वंदे भारत जैसी हाई-स्पीड इलेक्ट्रिक ट्रेन चलाना आसान नहीं था. लगभग दो साल की कड़ी मेहनत और 93.5 करोड़ रुपये की लागत से इस पूरे घाट सेक्शन का इलेक्ट्रिफिकेशन किया गया है. घने जंगलों और भूस्खलन संभावित इलाकों में ओवरहेड वायर लगाना रेलवे के बड़ी चुनौती थी.

