नई दिल्ली: रूस और भारत की दोस्ती बड़ी पुरानी है. दोनों के रिश्ते सिर्फ राजनयिक ही नहीं, बल्कि इसकी जड़े सिनेमा तक भी फैली हुई हैं. साल 1950 के दशक में जब सोवियत संघ के लोग पहली बार राज कपूर की फिल्मों से परिचित हुए, तब से 1991 तक भारतीय फिल्मों ने वहां की सिनेमाई कल्चर में खास जगह बनाई. बॉलीवुड की कई फिल्में रूस में खूब देखीं गईं. लोग फिल्मों की टिकटें खरीदने के लिए बॉक्स ऑफिस के बाहर घंटों कतार में खड़े रहते थे. आइए, रूस की पॉपुलर फिल्मों के बारे में जानते हैं.
आवारा (1950)- राज कपूर की ‘आवारा’ सोवियत लोगों के लिए एक क्रांति जैसी थी. राज कपूर ने इसमें अच्छाई और बुराई के बीच के अंतर को दिखाया. यह फिल्म रूस में चार साल देरी से आई और 63.7 मिलियन टिकट बिके. सोवियत लोग इसे केवल फिल्म नहीं बल्कि एक संस्कृति के रूप में अपनाते थे.
बॉबी (1973)- राज कपूर के बेटे रणधीर कपूर की ‘बॉबी’ रूस में जबरदस्त हिट साबित हुई. गरीब लड़की और अमीर लड़के की प्रेम कहानी को देखने के लिए 62.6 मिलियन लोगों ने टिकट खरीदी. सोवियत दर्शक इस फिल्म की नई कहानी और स्टाइल से काफी प्रभावित हुए.
डिस्को डांसर (1982)– सोवियत लड़कों के बीच ‘डिस्को डांसर’ सबसे खास थी. इसमें जिमी और एंटरटेनिंग म्यूजिक ने सबको झूमने पर मजबूर कर दिया. 60.9 मिलियन लोगों ने इसे देखा. ‘जिम्मी जिम्मी, आजा आजा’ गाने और फिल्म में दिखाए गए स्टाइल ने लोगों को प्रभावित किया.
बारूद (1976)- ‘बारूद’ एक्शन और रोमांस का मेल था. इसमें अनूप नाम के लड़के ने अपने पिता की हत्या का बदला लेने का फैसला किया, लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब उसे अपने दुश्मन की बेटी से प्यार हो जाता है. सोवियत दर्शकों ने इसकी 60 मिलियन टिकटों की बिक्री के साथ इसे सराहा.
सीता और गीता (1972)- हेमा मालिनी की फिल्म ‘सीता और गीता’ को देखने के लिए 55.2 मिलियन लोगों ने टिकट खरीदे. दो जुड़वां बहनों की कहानी सोवियत दर्शकों के दिलों को छू गई. यह फिल्म इतनी लोकप्रिय हुई कि किर्गिस्तान में एक माता-पिता ने अपनी जुड़वां बच्चियों का नाम सीता और गीता रख दिया.
ममता (1966)- सुचित्रा सेन की ‘ममता’ को 52.1 मिलियन लोगों ने देखा. कहानी एक महिला देवयानी की थी, जो बिना प्यार के शादी करती है और फिर अपनी बेटी से अलग हो जाती है. सोवियत लोग इसकी भावनाओं और मातृत्व की कहानी को बेहद पसंद करते थे.
फूल और पत्थर (1966)- मीना कुमारी और धर्मेंद्र की फिल्म ‘फूल और पत्थर’ के 45.4 मिलियन टिकट बिके. एक बीमार लड़की और चोर की कहानी ने दर्शकों के दिलों को छू लिया.
सोवियत दर्शकों ने भारतीय फिल्मों को सिर्फ मनोरंजन के रूप में नहीं देखा, बल्कि इनमें दिखाए गए अच्छाई और बुराई, प्यार और परिवार, हार और जीत जैसी भावनाओं को अपने जीवन से जोड़ा. रूस में आज भी बॉलीवुड फिल्म फेस्टिवल और रेट्रो शो बड़े उत्साह से आयोजित होते हैं.

